गंगा बढ़ीं तो बदल जाती है काशी की रफ्तार:नाविकों की रोजी पर संकट, नाविक बोले- रात में रहना पड़ता है अलर्ट

गंगा बढ़ीं तो बदल जाती है काशी की रफ्तार:नाविकों की रोजी पर संकट, नाविक बोले- रात में रहना पड़ता है अलर्ट

वाराणसी में जब गंगा का जलस्तर बढ़ने लगता है तो हम सभी नविको को दिन से ज्यादा रात में एक्टिव रहना पड़ता है क्योंकि कभी-कभी अचानक पानी तेजी से बढ़ जाता है उसमें नाव बहने का खतरा होता है यह कहना है वाराणसी के नाविक आकाश निषाद का जिनकी अस्सी घाट पर पांच नाव और एक देसी क्रूज है। दैनिक भास्कर की टीम ने बनारस में बढ़ रहे गंगा की जलस्तर के बीच यहां के नाविकों, दुकानदारों और शव दाह करने वाले डोम समाज से बात की पेश है रिपोर्ट.… गंगा के घाट पर हमारी मुलाकात नाव संचालन करने वाले आकाश से हुई। उन्होंने बताया कि कुछ दिन पहले गंगा का जलस्तर बढ़ने के कारण नावों का संचालन बंद कर दिया गया था। बाद में जब पानी कम हुआ तो नावें दोबारा चलने लगीं, लेकिन अब जलस्तर एक बार फिर बढ़ने लगा है। इससे नाविकों की चिंता बढ़ गई है। आकाश बताते हैं कि नाविकों के लिए सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ नाव चलाना नहीं, बल्कि बाढ़ के दौरान नाव को सुरक्षित रखना भी है। दिन के समय घाट पर काफी लोग मौजूद रहते हैं। ऐसे में अगर किसी नाव के बहने या खिसकने की आशंका होती है तो आसपास मौजूद लोग तुरंत देख लेते हैं। लेकिन रात होते ही स्थिति बदल जाती है। उनके मुताबिक रात में नावों की सुरक्षा के लिए घाट पर नाविकों को जागकर पहरा देना पड़ता है। हर घाट पर तीन से चार लोग रात में नावों की रखवाली करते हैं। पानी बढ़ने के दौरान नाव को किनारे पर बांधना और उसकी रस्सियों की लगातार निगरानी करना जरूरी हो जाता है। जरा सी लापरवाही नाव को गंगा की तेज धारा में बहा सकती है। आकाश के अनुसार वाराणसी में करीब पांच हजार नावों का संचालन होता है और इससे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से 40 हजार से अधिक परिवार जुड़े हैं। गंगा का जलस्तर खतरे के करीब पहुंचने या परिस्थितियां असुरक्षित होने पर नाविक खुद संचालन बंद कर देते हैं। उनके लिए आमदनी से पहले यात्रियों और नाविकों की सुरक्षा जरूरी है। लेकिन संचालन बंद होने का मतलब इन परिवारों की आय भी बंद होना है आकाश कहते हैं कि नाविकों के पास ऐसा कोई नियमित विकल्प नहीं है, जिससे वे इन महीनों में परिवार का खर्च चला सकें। नाव चलने पर रोज कमाई होती है और उसी से घर का खर्च चलता है। जैसे ही गंगा का जलस्तर बढ़ता है, यह कमाई पूरी तरह रुक जाती है। उन्होंने बताया कि ऐसे समय में नाविक अपने पुराने बचाए हुए पैसों के सहारे करीब तीन महीने तक परिवार चलाने की कोशिश करते हैं। यह अवधि उनके लिए बेहद मुश्किल होती है, क्योंकि घर में एक रुपये की आमदनी भी नहीं होती। गंगा शांत रहती है तो नाविकों की जिंदगी चलती है और गंगा उफान पर आती है तो उनके चूल्हे की चिंता बढ़ जाती है। बाढ़ सिर्फ नाव नहीं रोकती, घर का चूल्हा भी रोक देती है नाविकों की समस्या को सिर्फ एक पेशे से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। काशी के घाटों की अर्थव्यवस्था में नाविकों की अहम भूमिका है। उनके साथ नाव से जुड़े कर्मचारी, घाटों पर काम करने वाले लोग और पर्यटकों से जुड़े कई छोटे कारोबारी भी प्रभावित होते हैं। जलस्तर बढ़ने के बाद नावों को सुरक्षित स्थान पर बांधना पड़ता है। नाविकों के सामने नाव की सुरक्षा के साथ उसके रखरखाव का भी सवाल होता है। पानी, नमी और लगातार बदलती परिस्थितियों के बीच नाव को सुरक्षित रखना आसान काम नहीं है। नाविकों का कहना है कि गंगा का पानी जितना ऊपर आता है, उतनी ही उनकी चिंता बढ़ती जाती है। उन्हें सिर्फ यह नहीं देखना होता कि नाव चलेगी या नहीं, बल्कि यह भी देखना पड़ता है कि कहीं नाव बह न जाए। अस्सी घाट के दुकानदारों पर भी बाढ़ की मार गंगा के बढ़ते जलस्तर का असर सिर्फ नाविकों तक सीमित नहीं है। घाटों पर छोटी-बड़ी दुकानें लगाने वाले दुकानदारों के सामने भी रोजी-रोटी का संकट पैदा हो जाता है। अस्सी घाट पर करीब 35 साल से दुकान लगाने वाले मुन्ना बताते हैं कि जब उन्होंने शुरुआत की थी, तब घाट पर गिने-चुने लोग ही दुकान लगाते थे। आज स्थिति काफी बदल गई है। वाराणसी के गंगा घाटों पर बड़ी संख्या में छोटी-बड़ी दुकानें हैं। उनके मुताबिक बाढ़ के दौरान इन दुकानों को हटाना पड़ता है। घाट के किनारे दुकान लगाने वाले कई लोग उत्तर प्रदेश के अलावा बिहार और बंगाल से भी आते हैं। पानी बढ़ने के बाद उन्हें अपनी दुकानें बंद करनी पड़ती हैं और कई बार महीनों तक कारोबार ठप रहता है। मुन्ना बताते हैं कि इस बार सावन के दौरान गंगा का जलस्तर उस स्तर तक नहीं पहुंचा था कि दुकानों को तत्काल हटाना पड़े, लेकिन अब पानी फिर बढ़ने लगा है। इससे दुकानदारों की चिंता बढ़ गई है। उनकी चिंता सिर्फ दुकान बचाने की नहीं है। दुकान बंद होने का सीधा असर परिवार की आमदनी पर पड़ता है। हजारों रुपये का नुकसान होता है और कई बार तीन महीने तक दुकान नहीं खुल पाती। दुकानदारों के लिए यह तीन महीने किसी परीक्षा से कम नहीं होते। कारोबार बंद रहता है, लेकिन घर का खर्च बंद नहीं होता। बच्चों की पढ़ाई, भोजन, किराया और दूसरी जरूरतें पहले की तरह बनी रहती हैं। ऐसे में लोग बचत या उधार के सहारे किसी तरह समय काटते हैं। 84 घाटों का संपर्क टूटा, डूब गए छोटे मंदिर गंगा का जलस्तर बढ़ने के साथ काशी के घाटों की भौगोलिक तस्वीर भी बदलने लगी है। पानी लगातार ऊपर चढ़ने के कारण 84 घाटों का आपसी संपर्क टूट गया है। घाटों के आसपास बने 100 से ज्यादा छोटे मंदिर भी पानी की चपेट में आ चुके हैं। घाटों की सीढ़ियां, प्लेटफॉर्म और किनारे के हिस्से पानी में डूबने लगे हैं। जिन जगहों पर सामान्य दिनों में श्रद्धालु बैठते, पूजा करते और अंतिम संस्कार की तैयारियां होती थीं, वहां अब गंगा का पानी दिखाई दे रहा है। लेकिन इन सबके बीच सबसे गंभीर स्थिति अंतिम संस्कार से जुड़े घाटों पर दिखाई दे रही है। हरिश्चंद्र घाट पर प्लेटफॉर्म डूबा, सीढ़ियों पर शवदाह हरिश्चंद्र घाट पर सामान्य दिनों में जिस प्लेटफॉर्म पर अंतिम संस्कार होता था, वह गंगा के बढ़े जलस्तर में डूब चुका है। इसके बाद अंतिम संस्कार की प्रक्रिया सीढ़ियों पर सिमट गई है। घाट पर मौजूद राज बाबू चौधरी बताते हैं कि सीढ़ियों पर शवदाह होने के कारण पर्याप्त जगह नहीं बच रही है। एक साथ कई शव आने पर उनके बीच दूरी बनाए रखना मुश्किल हो जाता है। इससे अंतिम संस्कार की पारंपरिक प्रक्रियाओं को पूरा करने में भी परिवारों को परेशानी होती है। उनका कहना है कि अभी गंगा का जलस्तर कुछ हद तक स्थिर दिखाई दे रहा है, लेकिन अगर पानी तेजी से बढ़ा तो स्थिति और गंभीर हो सकती है। ऐसी स्थिति में अंतिम संस्कार के लिए घाट से लगी गलियों की ओर जाने की नौबत भी आ सकती है। हरिश्चंद्र घाट पर डोम राजा परिवार के सदस्य ओंकार चौधरी बताते हैं कि वाराणसी में भले ही अभी तेज बारिश नहीं हुई हो, लेकिन पहाड़ी क्षेत्रों में हुई बारिश का असर गंगा के जलस्तर पर दिखाई दे रहा है। उनके मुताबिक अगर पानी इसी तरह बढ़ता रहा तो अंतिम संस्कार के लिए घाट से लगी गलियों की ओर जाना पड़ सकता है। यह स्थिति घाट की मौजूदा व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती होगी। आठ-नौ शवों की जगह अब चार का भी इंतजाम मुश्किल शवदाह का काम करने वाले नीलेंद्र चौधरी बताते हैं कि सामान्य दिनों में जिस प्लेटफॉर्म पर एक साथ आठ से नौ शवों के अंतिम संस्कार की व्यवस्था हो जाती थी, वह अब पानी में डूब चुका है। पानी बढ़ने के बाद सीढ़ियों पर ही शवदाह करना पड़ रहा है। जगह कम होने के कारण एक साथ चार से ज्यादा शवों का अंतिम संस्कार कर पाना मुश्किल हो गया है। इसका सीधा असर उन परिवारों पर पड़ रहा है जो अपने प्रियजन का अंतिम संस्कार करने के लिए दूर-दराज से वाराणसी पहुंचते हैं। कई परिवारों को अपनी बारी के लिए तीन से चार घंटे तक इंतजार करना पड़ रहा है। जिस परिवार के लिए अंतिम संस्कार पहले ही भावनात्मक रूप से बेहद कठिन समय होता है, उसके लिए घंटों इंतजार करना स्थिति को और मुश्किल बना देता है। मणिकर्णिका घाट पर ऊंचे प्लेटफॉर्म का सहारा हरिश्चंद्र घाट के साथ मणिकर्णिका घाट पर भी बढ़ते जलस्तर का असर दिखाई दे रहा है। यहां ऊंचे प्लेटफॉर्म पर अंतिम संस्कार कराया जा रहा है। लेकिन पानी बढ़ने के साथ उपलब्ध जगह लगातार कम होती जा रही है। सीमित स्थान के कारण एक समय में कम शवों का अंतिम संस्कार हो पा रहा है। इससे अंतिम संस्कार के लिए आने वाले परिवारों को इंतजार करना पड़ रहा है। मणिकर्णिका घाट काशी की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यहां देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग अंतिम संस्कार के लिए पहुंचते हैं। ऐसे में जलस्तर बढ़ने के साथ बढ़ती परेशानी सिर्फ स्थानीय लोगों की समस्या नहीं है, बल्कि बाहर से आने वाले परिवार भी इसकी चपेट में हैं। दो घंटे इंतजार के बाद मिली अंतिम संस्कार की बारी अंतिम संस्कार के लिए पहुंचे वीरेंद्र नारायण शुक्ला ने घाट की व्यवस्था को लेकर नाराजगी जताई। उन्होंने बताया कि बाढ़ के कारण उन्हें करीब दो घंटे तक इंतजार करना पड़ा। इसके बाद उनके परिजन के अंतिम संस्कार की बारी आई। उनका कहना था कि घाट पर निर्माण कार्य तो चल रहा है, लेकिन निर्माण से पहले आम लोगों की जरूरतों का पर्याप्त ध्यान रखा जाना चाहिए था। उन्होंने शौचालय, बैठने की व्यवस्था और दूसरी बुनियादी सुविधाओं की कमी का भी मुद्दा उठाया। उनका कहना था कि अंतिम संस्कार के लिए आने वाले परिवार पहले ही मानसिक तनाव में होते हैं। ऐसे में उन्हें घंटों इंतजार और जरूरी सुविधाओं की कमी का सामना करना पड़े तो परेशानी और बढ़ जाती है। पानी स्थिर रहा तो राहत, बढ़ा तो संकट गहरा सकता है राकेश कुमार यादव का कहना है कि फिलहाल स्थिति पूरी तरह नियंत्रण से बाहर नहीं हुई है, लेकिन गंगा का जलस्तर अगर और बढ़ता है तो मुश्किलें कई गुना बढ़ सकती हैं। सबसे बड़ी चिंता घाटों से लगी गलियों को लेकर है। अगर पानी लगातार ऊपर चढ़ता रहा तो अंतिम संस्कार की व्यवस्था को घाट से ऊपर की ओर ले जाना पड़ सकता है। ऐसी स्थिति में स्थानीय लोगों, प्रशासन और अंतिम संस्कार के लिए आने वाले परिवारों के सामने बड़ी चुनौती खड़ी होगी।

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