गंगा-गंडक के बीच 15 हजार लोग छतों पर:चूड़ा खाकर चल रहा जीवन, मददगार भी नहीं आ रहे, लोग बोले–बाढ़ का पानी छानकर पी रहे

गंगा-गंडक के बीच 15 हजार लोग छतों पर:चूड़ा खाकर चल रहा जीवन, मददगार भी नहीं आ रहे, लोग बोले–बाढ़ का पानी छानकर पी रहे

‘15 दिन से हम लोग छत पर हैं। रहने का साधन नहीं है। हर तरफ पानी ही पानी है। घर में पानी भरा है। तिरपाल से टेंट लगाकर छत पर किसी तरह जिंदगी काट रहे हैं। यही छत हमारा बिस्तर, रसोई और आशियाना है। बच्चे बीमार पड़ते हैं तो मुसीबत बढ़ जाती है। नाव से उन्हें डॉक्टर के पास ले जाते हैं। बारिश होती है तो छत पर रहना मुश्किल हो जाता है। अपना घर होते हुए भी बेघर हो गई हूं।’ यह कहना है पटना से करीब 20 किलोमीटर दूर सोनपुर के सबलपुर में रहने वाली फूल कुमारी देवी का। इनका घर पानी में डूब गया है। छत पर टेंट बनाकर गुजारा कर रहीं हैं। नीचे आने के लिए बांस की सीढ़ी इस्तेमाल करती हैं। सबलपुर के एक तरफ गंगा तो दूसरी तरफ गंडक नदी है। दोनों में उफान आने के चलते यहां बाढ़ का पानी भर गया है। करीब 15 हजार लोग छतों पर रह रहे हैं। सबलपुर के लोग बाढ़ के चलते किस स्थिति में जी रहे हैं? उनकी क्या परेशानी है? यह जानने के लिए भास्कर की टीम नाव पर सवार होकर उनके बीच पहुंची। पढ़िए ग्राउंड रिपोर्ट…। सड़क और खेतों में 6-7 फीट तक पानी, चल रही नाव हम पटना से जेपी सेतु होते हुए सोनपुर पहुंचे। देखा कि एशिया का सबसे बड़ा पशु मेला (सोनपुर मेला) लगने वाली जगह पूरी तरह पानी से घिरी है। हम सोनपुर मेला क्षेत्र में थिएटर लगने वाली जगह के पीछे वाले रास्ते से आगे बढ़े। देखा कि पानी भरने से रास्ता पूरी तरह से बंद है। आगे जाने का एकमात्र साधन नाव था। वहां 5-6 नाव लगे हुए थे। हम एक नाव पर बैठ गए। आगे बढ़े तो पता चला कि हम किसी नदी के ऊपर नहीं बल्कि रोड और खेत से गुजर रहे हैं। उस इलाके में 6-7 फीट पानी सड़क और खेतों में भर गया था। हमें लोग अपने घरों की छतों पर दिखाई दिए। यहां स्कूल से लेकर अस्पताल तक पानी भरने से बंद हो गए हैं। करीब 27 हजार की आबादी बाढ़ प्रभावित है। यहां के लोगों ने बताया कि न सरकार, न अफसर, न नेता, कोई मदद करने नहीं आ रहे हैं। सबसे बड़ी समस्या पीने के पानी की है। बाढ़ के पानी को कपड़े से छानकर पीना पड़ रहा है। खुद से बनाई थर्मोकोल वाली जुगाड़ नाव सबलपुर में इन दिनों नाव की वैल्यू कार जैसी है। कोई सामान लाने बाहर जाना है तो नाव चाहिए, किसी बीमार को इलाज कराने ले जाना है तो नाव। टैक्सी की तरह नाव रिजर्व में चलते हैं। बहुत से लोग जुगाड़ से बनी नाव से काम चला रहे हैं। एक घर के बाहर हमें थर्मोकोल से बनी जुगाड़ वाली नाव रस्सी से बंधी नजर आई। इसके मालिक दशरथ दास से हमने बात की। उन्होंने कहा, ‘बाढ़ से काफी परेशानी हो रही है। खाने पर भी आफत आ गई है। चूल्हा-चौका सब डूब गया है। खाना बनाने का कोई साधन नहीं है। बाहर से कुछ सामान लाने जाना हो तो नाव वाले मनमाना पैसा लेते हैं। इसलिए मैंने 600 रुपए में थर्मोकोल खरीदी और जुगाड़ नाव बनाई है। अगर परिवार में कोई बीमार होता है तो इसी थर्मोकोल वाली नाव पर बैठाकर ले जाते हैं। इलाज कराकर उसे वापस लाते हैं। सरकार से हमें कोई मदद नहीं मिली है।’ सीने तक पानी से होकर बाहर जाते हैं हमें सोनू सीने तक पानी भरे सड़क पर चलते दिखे। उन्होंने कहा, ‘बाढ़ में जीवन बहुत कठिन हो गई है। अभी सीना तक पानी से होकर हमलोग आते जाते हैं। घरों में पानी घुस गया है। चौकी-पलंग सब डूब गए हैं। बच्चे 10 से ज्यादा दिनों से स्कूल नहीं जा रहे हैं। उनकी पढ़ाई बाधित हो गई है। स्कूल में पानी घुस आया है।’ सुमन शर्मा ने कहा, ‘हम लोग पानी में डूबे हुए हैं। आगे पानी, पीछे पानी है। साग-सब्जी भी नहीं ला पा रहे हैं। सरकारी नाव नहीं आ रही है। मेरे परिवार के एक सदस्य की तबीयत खराब हुई तो डॉक्टर के पास जाने के लिए नाव वाले को 400 रुपए दिए। काफी परेशानी हो रही है। सरकार को इस पर ध्यान देना चाहिए।’ बाढ़ के डर से बच्चों को रिश्तेदार के यहां भेज दिया उमेश मिश्रा के घर में भी पानी घुस आया था। आंगन में रखा उनका खटिया, टोकरी सब कुछ पानी में डूब गया। बाढ़ के डर से उन्होंने अपने बच्चों को रिश्तेदार के यहां भेज दिया है। उन्होंने कहा, ‘बाढ़ में हम लोग खड़े-खड़े ही जीवन व्यतीत कर रहे हैं। खड़े-खड़े ही खाना पीना हो रहा है, क्योंकि बैठने सोने वाली सारी चीज डूब गई है। अगर कहीं बाहर जाना होता है तो नाव बुलाते हैं और रिजर्व करके जाते हैं। ऐसी स्थिति में रहते हुए एक हफ्ते से ज्यादा हो गया है। हम लोग अपने ही घर में कैद हो गए हैं।’ चूड़ा खाकर कट रही जिंदगी, पानी के बीच भी पीने को पानी नहीं लाल परी देवी की जिंदगी भी कई दिनों से मुश्किल में कट रही है। वह बताती हैं कि घर के आसपास इतना पानी भर गया है कि खाने का सामान लाने के लिए भी पानी में उतरना पड़ता है। किसी तरह चूड़ा लेकर घर लौटते हैं और उसी चूड़े को फांककर सो जाते हैं। ‘चारों तरफ पानी है, लेकिन पीने के लिए साफ पानी नहीं मिलता। रिंकू देवी के लिए सबसे बड़ी परेशानी रात है। उनका घर झोपड़ी का है। बाढ़ के पानी के बीच उसमें रहना किसी खतरे से कम नहीं। उन्होंने कहा, ‘रातभर नींद नहीं आती है। कभी पानी बढ़ने की चिंता, कभी झोपड़ी गिरने का डर और बच्चों की फिक्र। बैठे-बैठे सुबह हो जाती है।’ घर के बाहर कमाने नहीं जाएंगे तो परिवार क्या खाएगा सुमित्रा देवी की चिंता पेट से जुड़ी है। वह कहती हैं, ‘अगर घर के बाहर कमाने नहीं जाएंगे तो परिवार के लोग क्या खाएंगे। बाढ़ के बावजूद हमें किसी तरह पानी पार कर बाहर जाना पड़ता है। सामान लाने के लिए भी पानी में उतरना पड़ता है। रोजमर्रा की जरूरतों के लिए यह जोखिम उठाना मजबूरी बन गया है।’ मुश्किल सिर्फ सामान लाने तक सीमित नहीं है। घर लौटने के बाद उसे सुरक्षित रखना भी चुनौती है। सुमित्रा देवी बताती हैं, ‘पहले सामान चौकी के ऊपर रखते थे, ताकि पानी से बचा रहे। अब पानी चौकी तक पहुंच गया है। जो सामान छानकर रखते हैं, वह भी दोबारा भींग जाता है। अनाज, कपड़े और दूसरी जरूरी चीजों को बचाने की कोशिश में पूरा परिवार लगा रहता है।’ ‘15 दिन से हम लोग छत पर हैं। रहने का साधन नहीं है। हर तरफ पानी ही पानी है। घर में पानी भरा है। तिरपाल से टेंट लगाकर छत पर किसी तरह जिंदगी काट रहे हैं। यही छत हमारा बिस्तर, रसोई और आशियाना है। बच्चे बीमार पड़ते हैं तो मुसीबत बढ़ जाती है। नाव से उन्हें डॉक्टर के पास ले जाते हैं। बारिश होती है तो छत पर रहना मुश्किल हो जाता है। अपना घर होते हुए भी बेघर हो गई हूं।’ यह कहना है पटना से करीब 20 किलोमीटर दूर सोनपुर के सबलपुर में रहने वाली फूल कुमारी देवी का। इनका घर पानी में डूब गया है। छत पर टेंट बनाकर गुजारा कर रहीं हैं। नीचे आने के लिए बांस की सीढ़ी इस्तेमाल करती हैं। सबलपुर के एक तरफ गंगा तो दूसरी तरफ गंडक नदी है। दोनों में उफान आने के चलते यहां बाढ़ का पानी भर गया है। करीब 15 हजार लोग छतों पर रह रहे हैं। सबलपुर के लोग बाढ़ के चलते किस स्थिति में जी रहे हैं? उनकी क्या परेशानी है? यह जानने के लिए भास्कर की टीम नाव पर सवार होकर उनके बीच पहुंची। पढ़िए ग्राउंड रिपोर्ट…। सड़क और खेतों में 6-7 फीट तक पानी, चल रही नाव हम पटना से जेपी सेतु होते हुए सोनपुर पहुंचे। देखा कि एशिया का सबसे बड़ा पशु मेला (सोनपुर मेला) लगने वाली जगह पूरी तरह पानी से घिरी है। हम सोनपुर मेला क्षेत्र में थिएटर लगने वाली जगह के पीछे वाले रास्ते से आगे बढ़े। देखा कि पानी भरने से रास्ता पूरी तरह से बंद है। आगे जाने का एकमात्र साधन नाव था। वहां 5-6 नाव लगे हुए थे। हम एक नाव पर बैठ गए। आगे बढ़े तो पता चला कि हम किसी नदी के ऊपर नहीं बल्कि रोड और खेत से गुजर रहे हैं। उस इलाके में 6-7 फीट पानी सड़क और खेतों में भर गया था। हमें लोग अपने घरों की छतों पर दिखाई दिए। यहां स्कूल से लेकर अस्पताल तक पानी भरने से बंद हो गए हैं। करीब 27 हजार की आबादी बाढ़ प्रभावित है। यहां के लोगों ने बताया कि न सरकार, न अफसर, न नेता, कोई मदद करने नहीं आ रहे हैं। सबसे बड़ी समस्या पीने के पानी की है। बाढ़ के पानी को कपड़े से छानकर पीना पड़ रहा है। खुद से बनाई थर्मोकोल वाली जुगाड़ नाव सबलपुर में इन दिनों नाव की वैल्यू कार जैसी है। कोई सामान लाने बाहर जाना है तो नाव चाहिए, किसी बीमार को इलाज कराने ले जाना है तो नाव। टैक्सी की तरह नाव रिजर्व में चलते हैं। बहुत से लोग जुगाड़ से बनी नाव से काम चला रहे हैं। एक घर के बाहर हमें थर्मोकोल से बनी जुगाड़ वाली नाव रस्सी से बंधी नजर आई। इसके मालिक दशरथ दास से हमने बात की। उन्होंने कहा, ‘बाढ़ से काफी परेशानी हो रही है। खाने पर भी आफत आ गई है। चूल्हा-चौका सब डूब गया है। खाना बनाने का कोई साधन नहीं है। बाहर से कुछ सामान लाने जाना हो तो नाव वाले मनमाना पैसा लेते हैं। इसलिए मैंने 600 रुपए में थर्मोकोल खरीदी और जुगाड़ नाव बनाई है। अगर परिवार में कोई बीमार होता है तो इसी थर्मोकोल वाली नाव पर बैठाकर ले जाते हैं। इलाज कराकर उसे वापस लाते हैं। सरकार से हमें कोई मदद नहीं मिली है।’ सीने तक पानी से होकर बाहर जाते हैं हमें सोनू सीने तक पानी भरे सड़क पर चलते दिखे। उन्होंने कहा, ‘बाढ़ में जीवन बहुत कठिन हो गई है। अभी सीना तक पानी से होकर हमलोग आते जाते हैं। घरों में पानी घुस गया है। चौकी-पलंग सब डूब गए हैं। बच्चे 10 से ज्यादा दिनों से स्कूल नहीं जा रहे हैं। उनकी पढ़ाई बाधित हो गई है। स्कूल में पानी घुस आया है।’ सुमन शर्मा ने कहा, ‘हम लोग पानी में डूबे हुए हैं। आगे पानी, पीछे पानी है। साग-सब्जी भी नहीं ला पा रहे हैं। सरकारी नाव नहीं आ रही है। मेरे परिवार के एक सदस्य की तबीयत खराब हुई तो डॉक्टर के पास जाने के लिए नाव वाले को 400 रुपए दिए। काफी परेशानी हो रही है। सरकार को इस पर ध्यान देना चाहिए।’ बाढ़ के डर से बच्चों को रिश्तेदार के यहां भेज दिया उमेश मिश्रा के घर में भी पानी घुस आया था। आंगन में रखा उनका खटिया, टोकरी सब कुछ पानी में डूब गया। बाढ़ के डर से उन्होंने अपने बच्चों को रिश्तेदार के यहां भेज दिया है। उन्होंने कहा, ‘बाढ़ में हम लोग खड़े-खड़े ही जीवन व्यतीत कर रहे हैं। खड़े-खड़े ही खाना पीना हो रहा है, क्योंकि बैठने सोने वाली सारी चीज डूब गई है। अगर कहीं बाहर जाना होता है तो नाव बुलाते हैं और रिजर्व करके जाते हैं। ऐसी स्थिति में रहते हुए एक हफ्ते से ज्यादा हो गया है। हम लोग अपने ही घर में कैद हो गए हैं।’ चूड़ा खाकर कट रही जिंदगी, पानी के बीच भी पीने को पानी नहीं लाल परी देवी की जिंदगी भी कई दिनों से मुश्किल में कट रही है। वह बताती हैं कि घर के आसपास इतना पानी भर गया है कि खाने का सामान लाने के लिए भी पानी में उतरना पड़ता है। किसी तरह चूड़ा लेकर घर लौटते हैं और उसी चूड़े को फांककर सो जाते हैं। ‘चारों तरफ पानी है, लेकिन पीने के लिए साफ पानी नहीं मिलता। रिंकू देवी के लिए सबसे बड़ी परेशानी रात है। उनका घर झोपड़ी का है। बाढ़ के पानी के बीच उसमें रहना किसी खतरे से कम नहीं। उन्होंने कहा, ‘रातभर नींद नहीं आती है। कभी पानी बढ़ने की चिंता, कभी झोपड़ी गिरने का डर और बच्चों की फिक्र। बैठे-बैठे सुबह हो जाती है।’ घर के बाहर कमाने नहीं जाएंगे तो परिवार क्या खाएगा सुमित्रा देवी की चिंता पेट से जुड़ी है। वह कहती हैं, ‘अगर घर के बाहर कमाने नहीं जाएंगे तो परिवार के लोग क्या खाएंगे। बाढ़ के बावजूद हमें किसी तरह पानी पार कर बाहर जाना पड़ता है। सामान लाने के लिए भी पानी में उतरना पड़ता है। रोजमर्रा की जरूरतों के लिए यह जोखिम उठाना मजबूरी बन गया है।’ मुश्किल सिर्फ सामान लाने तक सीमित नहीं है। घर लौटने के बाद उसे सुरक्षित रखना भी चुनौती है। सुमित्रा देवी बताती हैं, ‘पहले सामान चौकी के ऊपर रखते थे, ताकि पानी से बचा रहे। अब पानी चौकी तक पहुंच गया है। जो सामान छानकर रखते हैं, वह भी दोबारा भींग जाता है। अनाज, कपड़े और दूसरी जरूरी चीजों को बचाने की कोशिश में पूरा परिवार लगा रहता है।’  

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