क्षमावाणी महोत्सव में गूंजा आत्मशुद्धि और मैत्री का संदेश:एसपी जैन बोले- हर साल क्षमा मांगने के साथ आत्ममंथन भी जरूरी

क्षमावाणी महोत्सव में गूंजा आत्मशुद्धि और मैत्री का संदेश:एसपी जैन बोले- हर साल क्षमा मांगने के साथ आत्ममंथन भी जरूरी

पर्युषण पर्व की आराधना के समापन मौके पर रविवार को पोरवाड़ दिगंबर जैन समाज ने क्षमावाणी महोत्सव श्रद्धा, भक्ति और आत्मशुद्धि के भाव के साथ मनाया। इस दौरान श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर से श्रीजी की पालकी यात्रा निकाली गई। समाजजन भजन-कीर्तन करते हुए शामिल हुए। बता दें कि, क्षमावाणी जैन धर्म की उस परंपरा का पर्व है, जिसमें वर्षभर में मन, वचन और कर्म से हुई गलतियों के लिए एक-दूसरे से क्षमा मांगी जाती है। साथ ही आपसी मतभेद भुलाकर मैत्री, सद्भाव और आत्मीयता के साथ आगे बढ़ने का संकल्प लिया जाता है। एसपी जैन बोले- हर साल क्षमा मांगने के साथ आत्ममंथन भी जरूरी कार्यक्रम में जिला पुलिस अधीक्षक अगम जैन ने क्षमावाणी पर्व के महत्व पर विचार रखते हुए कहा कि हम हर वर्ष क्षमावाणी मनाते हैं और उन्हीं लोगों से दोबारा क्षमा मांगते हैं। ऐसे में हमें यह आत्ममंथन भी करना चाहिए कि आखिर ऐसी स्थिति बार-बार क्यों बनती है और विवाद या मनमुटाव दोबारा क्यों सामने आते हैं। उन्होंने कहा कि केवल क्षमा मांग लेना ही पर्व का उद्देश्य नहीं होना चाहिए। क्षमावाणी हमें अपनी गलतियों को पहचानने और उनमें सुधार करने का अवसर देती है। दस दिन के दशलक्षण पर्व के बाद यदि व्यक्ति आत्मशुद्धि और आत्मसंयम के अगले स्तर तक नहीं पहुंचता और पिछले वर्ष जैसी ही स्थितियां दोबारा बनती रहती हैं, तो हमें पर्व मनाने के वास्तविक उद्देश्य पर विचार करना चाहिए। एसपी ने कहा कि क्षमावाणी ऐसा अवसर है, जब समाज के सभी लोगों से आत्मीयता के साथ मिलने और संवाद करने का अवसर मिलता है। वर्षभर सभी लोग अपने-अपने कार्यों में व्यस्त रहते हैं। दिवाली और रक्षाबंधन जैसे पर्व अधिकतर पारिवारिक रूप से मनाए जाते हैं, जबकि क्षमावाणी समाज को एक साथ जोड़ने और आपसी संबंधों को मजबूत करने का अवसर देती है। दशलक्षण पर्व से मिलती है आने वाले 355 दिनों के लिए प्रेरणा एसपी अगम जैन ने कहा कि दशलक्षण पर्व शुचिता, तप, संयम और साधना का पर्व है। इस दौरान छोटी-मोटी बात या कटाक्ष हो भी जाए, तो सामूहिक साधना का प्रभाव मन को पवित्रता से भरने वाला होता है। यही साधना आने वाले 355 दिनों के जीवन के लिए आधार तैयार करती है। उन्होंने कहा कि अगले वर्ष जब दशलक्षण पर्व आता है तो व्यक्ति फिर स्वयं को संयमित करता है, समाज के साथ एकजुट होता है और आत्ममंथन करता है। इस तरह यह पर्व केवल कुछ दिनों की धार्मिक गतिविधि नहीं, बल्कि पूरे वर्ष अपने आचरण को बेहतर बनाने की प्रेरणा देने वाला अवसर है। बच्चों को धर्म और महापुरुषों से जोड़ने पर दिया जोर एसपी अगम जैन ने अपने बचपन की स्मृतियां साझा करते हुए कहा कि उनके समय में बच्चे दशलक्षण पर्व का इंतजार सांस्कृतिक कार्यक्रमों के कारण भी करते थे। भजन प्रतियोगिता, अंताक्षरी, वाद-विवाद और प्रश्नमंच जैसे कार्यक्रमों के लिए बच्चे पूरे साल तैयारी करते थे। उन्होंने बताया कि ‘धर्म बड़ा है या धन’, ‘पुण्य बड़ा है या पाप’ और ‘शुभ भाव बड़े हैं या अशुभ भाव’ जैसे विषयों पर वाद-विवाद प्रतियोगिताएं होती थीं। प्रश्नमंच में मुनिराजों, उनके तप, उपसर्ग और साधना से जुड़े प्रश्न पूछे जाते थे। जिनवाणी सजाओ जैसी स्पर्धा भी होती थीं। उन्होंने समाजजनों से कहा कि यदि इस तरह के आयोजन अब कम हो गए हैं तो उन्हें दोबारा शुरू किया जाना चाहिए। बच्चे ही समाज का भविष्य हैं। उन्हें प्रथमानुयोग, महापुरुषों और धर्म के मूल सिद्धांतों की जानकारी देना जरूरी है। धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम बच्चों को अपनी परंपराओं से जोड़ने के साथ उनके व्यक्तित्व निर्माण में भी भूमिका निभाते हैं। मंदिर से निकली श्रीजी की पालकी यात्रा रविवार सुबह 7.30 बजे सराफा स्थित श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर से श्रीजी की पालकी यात्रा शुरू हुई। पालकी यात्रा बुधवारा, केवलराम पेट्रोल पंप, बॉम्बे बाजार और सराफा होते हुए चौधरी जी के कुएं पहुंची। पूजन-अर्चन के बाद पोरवाड़ दिगंबर जैन धर्मशाला में श्रीजी का अभिषेक और शांतिधारा संपन्न हुई। इधर, कार्यक्रम में जैन समाज के ट्रस्टी वीरेंद्र भट्यांण, नितिन जैन, दिनेश जैन, संतोष बॉस, राजेश जैन, अतुल जैन, पंकज जैन, तरुण जैन, संकल्प जैन, सुधांशु चौधरी एवं प्रेमांशु जैन ने सभी अतिथियों का का शाल और श्रीफल के साथ स्मृति चिह्न भेंट कर सम्मान किया।

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