राजस्थान के फलोदी में 1050 फीट गहरे बोरवेल में फंसे 9 साल के भोमाराम को बचाया नहीं जा सका। एसडीआरएफ-एनडीआरएफ की टीमों और देसी जुगाड़ एक्सपर्ट के प्रयासों के बावजूद बच्चे को बचाया नहीं जा सका। रेस्क्यू में सबसे बड़ी रुकावट था 30 फीट ऊपर फंसा पत्थर। आखिरकार देसी जुगाड़ एक्सपर्ट माधाराम सुथार और उनकी टीम ने शुक्रवार की देर रात 3.35 बजे भोमाराम को बाहर निकाला। आखिर क्यों नहीं बचा पाए भोमाराम को, कैसे देसी जुगाड़ से मिली बड़ी मदद और ऐसे हादसों के लिए विदेशों में किन तकनीकों पर चल रहा है काम? यही जानेंगे आज के राजस्थान एक्सप्लेनर में… सवाल – 1: 30 फीट ऊपर वाला पत्थर कैसे बना सबसे बड़ी रुकावट? जवाब: 15 अक्टूबर की दोपहर 12:35 बजे फलोदी जिले में पूनिया की ढाणी में 9 साल का भोमाराम खेलते हुए अचानक फिसलकर पिता पांचाराम भील के सामने 1050 फीट गहरे बोरवेल में गिर गया। 640 फीट की गहराई पर जाकर अटक गया। बचाने के लिए पिता ने शोर मचाया। बच्चे को बचाने के लिए एसडीआरएफ टीम मौके पर पहुंची। लेकिन रेस्क्यू में सबसे बड़ी दिक्कत ये थी कि बच्चे से 30 फीट की ऊंचाई एक बड़ा पत्थर फंसा हुआ था। पत्थर की वजह से NDRF और SDRF जो भी पाइप, कैमरा या क्लैंप नीचे भेज रहे थे, वो पत्थर से टकराकर रुक जा रहे थे। ऑक्सीजन पहुंचाना भी मुश्किल हो गया था। 16 अक्टूबर की सुबह कैमरे में बच्चे का मूवमेंट दिखना बंद हो गया था। सवाल-2: देसी जुगाड़ ने आखिर कैसे काम किया? जवाब: पहले SDRF और बाद में अजमेर से NDRF की टीम बुलाई। दोनों टीमों ने प्रयास किए, लेकिन कामयाबी हाथ नहीं लगी। NDRF के अधिकारियों ने बताया कि उनके उपकरण इतनी नैरो और गहरी जगह में पत्थर को पकड़ नहीं पा रहे थे। इसके बाद जालोर के देसी जुगाड़ एक्सपर्ट माधाराम सुथार और उनकी टीम को बुलाया गया। टीम 15 अक्टूबर की रात करीब 2 बजे पहुंची। माधाराम सुथार की टीम के जगमाल ने बताया- कैमरे में फुटेज देखकर देसी जुगाड़ (उपकरण) में सबसे नीचे एक-एक कर लोहे के सरियों को वेल्डिंग कर उसके ऊपर पत्थर के आकार का ढांचा बनाया। इसके बाद बोरवेल को जुगाड़ में उतारा। जुगाड़ के चिमटेनुमा लॉक ने पत्थर को पकड़ लिया। इसके बाद उसे रस्सी से ऊपर खींचा। इसके बाद सरियों का जाल बनाकर बच्चे को बाहर निकाला। सवाल-3: जुगाड़ एक्सपर्ट की टीम के सामने क्या चुनौतियां आई? जवाब: माधाराम के बेटे भीकाराम सुथार ने बताया कि वे और उनकी टीम अब तक ऐसे 7-8 रेस्क्यू ऑपरेशन कर चुकी है। इसमें 2 बच्चों को जिंदा निकाल लिया था। पहली बार इतनी ज्यादा गहराई में बच्चे के फंसने का मामला सामने आया। बोरवेल में 630 फीट पर पानी मौजूद था। यानी बच्चा करीब 10 फीट तक पानी में भी रहा। इतनी गहराई की वजह से सांस लेने में भी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। सवाल-4: विदेशों में ऐसे हादसों में कौन-सी टेक्नोलॉजी काम में लेते हैं? जवाब: विदेश में इस तरीके के मामले होने पर पैरेलल गड्ढे वाला तरीका भी काम में लिया जाता है। लेकिन साथ में रोबोटिक टेक्नोलॉजी का भी इस्तेमाल होता है। साल 2022 में मोरक्को में 5 साल का रेयान 32 मीटर गहरे कुएं में गिर गया था। वहां 5 बुलडोजर से बगल में गड्ढा खोदकर सुरंग बनाई गई थी। रायन 4-5 दिन तक कुएं में फंसा रहा। बचाव दल बच्चे तक पहुंचा, तब तक उसकी मौत हो गई थी। अब 3 नई टेक्नोलॉजी भी चलन में बलून टेक्निक – रोबोटिक आर्म बच्चे को थोड़ा ?पर उठाता है और नीचे हवा वाला बलून या गुब्बारा फूल जाता है, ताकि बच्चा और ज्यादा नीचे न गिरे। अम्ब्रेला टेक्निक – बच्चे के नीचे छतरी जैसा उपकरण खुल जाता है, जिससे वो वहीं टिक जाता है। रोबोटिक आर्म और ग्रिपर सिस्टम – HD कैमरा, ऑक्सीजन मीटर और एक छोटा रोबोट उसी बोरवेल में जाता है और हार्नेस पहनाकर बच्चे को ऊपर खींच लेता है।
सवाल-5: NDRF और SDRF में क्या फर्क है? जवाब: NDRF केंद्र सरकार की फोर्स है। इसे बाढ़, भूकंप, इमारत गिरने और रासायनिक आपदाओं जैसी स्थितियों के लिए प्रशिक्षित माना जाता है। इसके पास एडवांस बोट, डाइवर और मेडिकल टीम है और ये पूरे देश में कहीं भी जा सकती है। SDRF राज्य सरकार की फोर्स है। इसका सबसे बड़ा फायदा है लोकल नॉलेज – जमीन, भाषा, कलेक्टर से सीधा संपर्क। इसलिए शुरुआती 2-3 घंटे में SDRF ज्यादा तेजी से पहुंचती है। बोरवेल के केस की बात करें तो अगर गहराई 100-150 फीट से कम है तो SDRF बेहतर काम करती है, लेकिन 640 फीट जैसी गहराई में NDRF की टेक्निकल टीम ज्यादा बेहतर मानी जाती है। …. ये खबर भी पढ़िए… बोरवेल में पत्थर-पानी के कारण बच्चे की हुई मौत:शर्ट को निकालते समय आया था पत्थर, 10 फीट गहरे पानी में डूबा था मासूम फलोदी जिले में 1050 फीट गहरे बोरवेल में गिरे 9 साल के बच्चे भोमाराम को नहीं बचाया जा सका। बच्चे का शव करीब 39 घंटे बाद बोरवेल से निकाला गया, लेकिन उसकी मौत पहले ही हो गई थी। पूरी खबर पढ़िए…

