क्यों छात्रों ने शिक्षा मंत्री को मिस्टेक मिनिस्टर कहा:पहले फैसला, फिर बदलाव; जानिए मिथिलेश तिवारी के 5 बड़े ‘करेक्शन’

क्यों छात्रों ने शिक्षा मंत्री को मिस्टेक मिनिस्टर कहा:पहले फैसला, फिर बदलाव; जानिए मिथिलेश तिवारी के 5 बड़े ‘करेक्शन’

“शिक्षा विभाग लेटर-पर-लेटर जारी करता है। अधिकारियों को सुझाव दिया जाएगा कि विभाग में बिना जरूरत पत्र जारी करना रोकें। विभाग का उद्देश्य काम में पारदर्शिता लाना है। बार-बार नए निर्देश जारी करने की जगह जमीनी स्तर पर सुधार करना है।” शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी ने 8 मई 2026 को मंत्री पद संभालने के तुरंत बाद ये बातें कहीं। इससे शिक्षकों को उम्मीद जगी कि शिक्षा विभाग में अब बार-बार आदेश और निर्देश जारी करने के बजाय स्पष्ट नीति के तहत काम होगा। लेकिन 42 दिनों में ही तस्वीर कुछ अलग दिखाई देने लगी है। भास्कर की रिपोर्ट में जानिए, शिक्षा मंत्री ने पद संभालने के बाद कौन से बड़े फैसले लिए। उनमें क्या बदलाव करना पड़ा? पहले जानिए… शिक्षा मंत्री को छात्रों ने कौन सा नया नाम दिया मिथिलेश तिवारी शिक्षा मंत्री बनने के बाद से अपने फैसलों के चलते चर्चा में हैं। 6 लाख से अधिक शिक्षक-कर्मी और करोड़ों छात्रों से जुड़ी जिम्मेदारी मिलने के बाद मंत्री ने कई मुद्दों पर तेजी से निर्णय लेने की कोशिश की। करेक्शन 1: पांच साल की शर्त में राहत ट्रांसफर पॉलिसी में सेवा अवधि को महत्वपूर्ण आधार बनाया गया था। 5 साल की सेवा पूरी करने वालों का तबादला किया जाना था। पहली बार ट्रांसफर प्रोसेस में शामिल होने वाले शिक्षकों के लिए इस शर्त में राहत दी गई। करेक्शन 2: प्रोबेशन वाले शिक्षकों को भी ट्रांसफर का मौका नियमावली की मूल व्यवस्था में प्रोबेशन अवधि के शिक्षकों के तबादले की प्रक्रिया में शामिल होना मुश्किल था। शिक्षकों ने इसका विरोध किया। लगातार मांग उठी कि पहली स्थानांतरण प्रक्रिया में प्रोबेशन पर काम कर रहे शिक्षकों को भी मौका दिया जाए। इसके बाद विभाग ने इस मामले में राहत दी। 28 जुलाई को इससे संबंधित आदेश जारी किया गया। इसके बाद पहली स्थानांतरण प्रक्रिया में प्रोबेशन अवधि वाले शिक्षक भी शामिल हो सके। इसका सीधा फायदा टीआरई-3 से नियुक्त शिक्षकों को हुआ। यानी नई नियमावली लागू होने के बाद दूसरा बड़ा बदलाव भी करना पड़ा। करेक्शन 3: सरप्लस शिक्षक का तबादला सरप्लस का मतलब ऐसे स्कूल से है जहां छात्रों की संख्या के मुकाबले जरूरत से ज्यादा शिक्षक उपलब्ध हैं। नई नीति में स्कूलों में शिक्षकों की संख्या तय करने के लिए छात्र नामांकन को आधार बनाया गया।
करेक्शन 4: गृह पंचायत और गृह प्रखंड पर भी फंसा पेंच स्थानांतरण नीति में एक अहम व्यवस्था उन शिक्षकों से जुड़ी थी जो अपने गृह पंचायत या गृह प्रखंड में तैनात हैं। सरकार का तर्क था कि लंबे समय से एक ही क्षेत्र में तैनात शिक्षकों का संतुलित तरीके से स्थानांतरण किया जाए। इससे एक इलाके में शिक्षकों की अधिकता और दूसरे इलाके में कमी को दूर करने में मदद मिल सकती थी। इस प्रावधान को लेकर भी शिक्षकों की ओर से आपत्ति सामने आई। मामला हाईकोर्ट पहुंच गया। करेक्शन 5: टीआरई-4 की अधियाचना शिक्षा मंत्री के स्तर से टीआरई-4 के तहत शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया को तेजी से आगे बढ़ाने की कोशिश की गई, लेकिन भर्ती की अधियाचना को लेकर सवाल उठे। आलोचकों का कहना है कि शिक्षा मंत्री जल्द से जल्द बड़े फैसले लेने की कोशिश कर रहे हैं। इसी जल्दबाजी में कुछ मामलों में बाद में सुधार की जरूरत पड़ रही है। अधियाचना दो बार भेजना पड़ा। पहली बार में कई विषय छूट गए थे। टीआरई-4 में दो परीक्षा लेने की घोषणा की गई है। छात्र संगठन इसका विरोध कर रहे हैं। मंत्री को खुला हाथ या अनुभव की कमी? शिक्षा विभाग बिहार सरकार के सबसे बड़े और संवेदनशील विभागों में से एक है। इस विभाग का सीधा संबंध लाखों शिक्षकों, कर्मचारियों और करोड़ों विद्यार्थियों से है। मंत्री के सामने चुनौती सिर्फ आदेश जारी करने की नहीं है। उन्हें यह तय करना है कि कोई नियम लागू होने के बाद स्कूलों में उसका असर क्या होगा। शिक्षा मंत्री को सरकार की ओर से काम करने की पर्याप्त स्वतंत्रता मिलने की भी चर्चा रही है। शिक्षा विभाग में सचिव स्तर के आईएएस अधिकारी की तैनाती है। इससे यह संदेश जाता है कि मंत्री को प्रशासनिक स्तर पर काम करने की पर्याप्त गुंजाइश दी गई है। इतनी बड़ी स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी भी बड़ी होती है। किसी भी फैसले का असर सीधे शिक्षकों और विद्यार्थियों पर पड़ता है। इसलिए विभाग के हर फैसले पर अब ज्यादा नजर है। एक तरफ सुधार का दावा, दूसरी तरफ लगातार बदलाव शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी के सामने बिहार की शिक्षा व्यवस्था को बदलने की बड़ी चुनौती है। शिक्षकों की कमी, अतिरिक्त शिक्षकों का समायोजन, स्थानांतरण, भर्ती, स्कूलों में स्टाफ का संतुलन और शिक्षकों की वर्षों पुरानी मांगें। इन सभी पर एक साथ काम करना आसान नहीं है। मंत्री ने कई मुद्दों पर तेजी दिखाई है। लेकिन तेजी के साथ एक और चीज जुड़ गई है-फैसलों में बदलाव। किसी नीति में जरूरत के मुताबिक सुधार होना सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया है। लेकिन जब एक के बाद एक फैसलों में बदलाव होता है तो विपक्ष और कर्मचारी संगठन सवाल उठाते हैं कि क्या सरकार ने फैसला लेने से पहले सभी पक्षों का पर्याप्त आकलन किया था? यही सवाल अब शिक्षा मंत्री के सामने भी है। “शिक्षा विभाग लेटर-पर-लेटर जारी करता है। अधिकारियों को सुझाव दिया जाएगा कि विभाग में बिना जरूरत पत्र जारी करना रोकें। विभाग का उद्देश्य काम में पारदर्शिता लाना है। बार-बार नए निर्देश जारी करने की जगह जमीनी स्तर पर सुधार करना है।” शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी ने 8 मई 2026 को मंत्री पद संभालने के तुरंत बाद ये बातें कहीं। इससे शिक्षकों को उम्मीद जगी कि शिक्षा विभाग में अब बार-बार आदेश और निर्देश जारी करने के बजाय स्पष्ट नीति के तहत काम होगा। लेकिन 42 दिनों में ही तस्वीर कुछ अलग दिखाई देने लगी है। भास्कर की रिपोर्ट में जानिए, शिक्षा मंत्री ने पद संभालने के बाद कौन से बड़े फैसले लिए। उनमें क्या बदलाव करना पड़ा? पहले जानिए… शिक्षा मंत्री को छात्रों ने कौन सा नया नाम दिया मिथिलेश तिवारी शिक्षा मंत्री बनने के बाद से अपने फैसलों के चलते चर्चा में हैं। 6 लाख से अधिक शिक्षक-कर्मी और करोड़ों छात्रों से जुड़ी जिम्मेदारी मिलने के बाद मंत्री ने कई मुद्दों पर तेजी से निर्णय लेने की कोशिश की। करेक्शन 1: पांच साल की शर्त में राहत ट्रांसफर पॉलिसी में सेवा अवधि को महत्वपूर्ण आधार बनाया गया था। 5 साल की सेवा पूरी करने वालों का तबादला किया जाना था। पहली बार ट्रांसफर प्रोसेस में शामिल होने वाले शिक्षकों के लिए इस शर्त में राहत दी गई। करेक्शन 2: प्रोबेशन वाले शिक्षकों को भी ट्रांसफर का मौका नियमावली की मूल व्यवस्था में प्रोबेशन अवधि के शिक्षकों के तबादले की प्रक्रिया में शामिल होना मुश्किल था। शिक्षकों ने इसका विरोध किया। लगातार मांग उठी कि पहली स्थानांतरण प्रक्रिया में प्रोबेशन पर काम कर रहे शिक्षकों को भी मौका दिया जाए। इसके बाद विभाग ने इस मामले में राहत दी। 28 जुलाई को इससे संबंधित आदेश जारी किया गया। इसके बाद पहली स्थानांतरण प्रक्रिया में प्रोबेशन अवधि वाले शिक्षक भी शामिल हो सके। इसका सीधा फायदा टीआरई-3 से नियुक्त शिक्षकों को हुआ। यानी नई नियमावली लागू होने के बाद दूसरा बड़ा बदलाव भी करना पड़ा। करेक्शन 3: सरप्लस शिक्षक का तबादला सरप्लस का मतलब ऐसे स्कूल से है जहां छात्रों की संख्या के मुकाबले जरूरत से ज्यादा शिक्षक उपलब्ध हैं। नई नीति में स्कूलों में शिक्षकों की संख्या तय करने के लिए छात्र नामांकन को आधार बनाया गया।
करेक्शन 4: गृह पंचायत और गृह प्रखंड पर भी फंसा पेंच स्थानांतरण नीति में एक अहम व्यवस्था उन शिक्षकों से जुड़ी थी जो अपने गृह पंचायत या गृह प्रखंड में तैनात हैं। सरकार का तर्क था कि लंबे समय से एक ही क्षेत्र में तैनात शिक्षकों का संतुलित तरीके से स्थानांतरण किया जाए। इससे एक इलाके में शिक्षकों की अधिकता और दूसरे इलाके में कमी को दूर करने में मदद मिल सकती थी। इस प्रावधान को लेकर भी शिक्षकों की ओर से आपत्ति सामने आई। मामला हाईकोर्ट पहुंच गया। करेक्शन 5: टीआरई-4 की अधियाचना शिक्षा मंत्री के स्तर से टीआरई-4 के तहत शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया को तेजी से आगे बढ़ाने की कोशिश की गई, लेकिन भर्ती की अधियाचना को लेकर सवाल उठे। आलोचकों का कहना है कि शिक्षा मंत्री जल्द से जल्द बड़े फैसले लेने की कोशिश कर रहे हैं। इसी जल्दबाजी में कुछ मामलों में बाद में सुधार की जरूरत पड़ रही है। अधियाचना दो बार भेजना पड़ा। पहली बार में कई विषय छूट गए थे। टीआरई-4 में दो परीक्षा लेने की घोषणा की गई है। छात्र संगठन इसका विरोध कर रहे हैं। मंत्री को खुला हाथ या अनुभव की कमी? शिक्षा विभाग बिहार सरकार के सबसे बड़े और संवेदनशील विभागों में से एक है। इस विभाग का सीधा संबंध लाखों शिक्षकों, कर्मचारियों और करोड़ों विद्यार्थियों से है। मंत्री के सामने चुनौती सिर्फ आदेश जारी करने की नहीं है। उन्हें यह तय करना है कि कोई नियम लागू होने के बाद स्कूलों में उसका असर क्या होगा। शिक्षा मंत्री को सरकार की ओर से काम करने की पर्याप्त स्वतंत्रता मिलने की भी चर्चा रही है। शिक्षा विभाग में सचिव स्तर के आईएएस अधिकारी की तैनाती है। इससे यह संदेश जाता है कि मंत्री को प्रशासनिक स्तर पर काम करने की पर्याप्त गुंजाइश दी गई है। इतनी बड़ी स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी भी बड़ी होती है। किसी भी फैसले का असर सीधे शिक्षकों और विद्यार्थियों पर पड़ता है। इसलिए विभाग के हर फैसले पर अब ज्यादा नजर है। एक तरफ सुधार का दावा, दूसरी तरफ लगातार बदलाव शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी के सामने बिहार की शिक्षा व्यवस्था को बदलने की बड़ी चुनौती है। शिक्षकों की कमी, अतिरिक्त शिक्षकों का समायोजन, स्थानांतरण, भर्ती, स्कूलों में स्टाफ का संतुलन और शिक्षकों की वर्षों पुरानी मांगें। इन सभी पर एक साथ काम करना आसान नहीं है। मंत्री ने कई मुद्दों पर तेजी दिखाई है। लेकिन तेजी के साथ एक और चीज जुड़ गई है-फैसलों में बदलाव। किसी नीति में जरूरत के मुताबिक सुधार होना सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया है। लेकिन जब एक के बाद एक फैसलों में बदलाव होता है तो विपक्ष और कर्मचारी संगठन सवाल उठाते हैं कि क्या सरकार ने फैसला लेने से पहले सभी पक्षों का पर्याप्त आकलन किया था? यही सवाल अब शिक्षा मंत्री के सामने भी है।  

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