8 सीटों पर MLC चुनाव के नतीजे के साथ ही बिहार विधान परिषद से लेफ्ट की पार्टी CPI का पूरी तरह सफाया हो गया। कांग्रेस एक सीट पर सिमट गई। JDU के मैनेजमेंट के सामने अनंत सिंह चारो खाने चित्त हो गए। 8 सीटों के चुनाव में एक तरफ जहां BJP ने सबसे बड़ी जीत हासिल की है तो JDU भी अपनी सीट बचाने में सफल रही। हालांकि अभिषेक झा लगातार दूसरी बार हार गए। भास्कर की एक्सक्लूसिव रिपोर्ट में पढिए कैसे अनंत सिंह की भीड़ वोट में कन्वर्ट नहीं हो पाई। कोसी में BJP के कैंडिडेट के सामने कोई क्यों नहीं टिक पाया और इस जीत-हार के तीन बड़े मैसेज क्या हैं। पटना: अनंत सिंह की जिद पर नीरज का मैनेजमेंट भारी
चुनाव भले 8 सीटों पर थी, लेकिन लोगों की निगाहें पटना स्नातक सीट पर थी। यहां सिटिंग MLC नीरज कुमार के खिलाफ उनकी ही पार्टी (24 अक्टूबर से पहले) के मोकामा विधायक अनंत सिंह ने मोर्चा खोल दिया था। कंट्रोवर्सियल बयान से लेकर रोड शो तक की खूब चर्चा रही। अनंत सिंह ने जनसुराज के कैंडिडेट अनुज सिंह को समर्थन दिया था। RJD ने दिलीप पटेल को उम्मीदवार बनाया। इन तीनों के कारण मुकाबला त्रिकोणीय जरूर हुआ, लेकिन बूथ पर समीकरण पूरी तरह बदला दिखा। नीरज लगातार तीन टर्म से MLC हैं। इस इलाके में उनका अपना पॉकेट वोट है। इसका उन्हें लाभ मिला। अनंत सिंह के कारण अनुज सिंह को लाइमलाइट जरूर मिली, लेकिन उनके रोड शो की भीड़ वोट में कन्वर्ट नहीं हुई। निशांत कुमार ने फ्रंट से संभाली जिम्मेदारी नीरज कुमार और अनंत सिंह की लड़ाई JDU के लिए आन की लड़ाई बन गई थी। ऐसे में निशांत कुमार पहली बार किसी चुनाव को फ्रंड से लीड कर रहे थे। उन्होंने पटना स्नातक सीट के तीनों जिलों के नेताओं से अलग-अलग मुलाकात की। जिले में वोट कराने की जिम्मेदारी दी। इसके बाद लगातार दो दिन नालंदा गए और वहां कैंपेनिंग की। इसका सीधा लाभ नीरज कुमार को मिला। मतदान से दो दिन पहले नीरज कुमार की तबीयत बिगड़ी तो बिहार के पूर्व सीएम नीतीश कुमार उन्हें देखने घर पहुंचे। इसके बाद कुर्मी वोटों के बिखराव का जो डर था वो पूरी तरह JDU के साथ गोलबंद हो गया। भूमिहार वोटों के बिखराव को कुर्मी वोट से मैनेज किया RJD के कैंडिडेट दिलीप पटेल का पूरा फोकस नालंदा में कुर्मी वोटर्स पर था। इसके लिए उन्होंने सबसे ज्यादा कैंपेन नालंदा में किया। जनसुराज कैंडिडेट अनुज सिंह खुद भूमिहार थे। उन्हें भूमिहार नेता अनंत सिंह का सपोर्ट मिल रहा था। ऐसे में भूमिहार वोटों में बिखराव तय था। इसके लिए नीरज कुमार ने कुर्मी वोट को मैनेज किया। इसमें उन्हें NDA संगठन खास कर JDU का भरपूर सपोर्ट मिला। तिरहुत: देवेश चंद्र ठाकुर और आनंद मोहन ने JDU का खेल बिगाड़ा अभिषेक झा को यहां टिकट दिलाने में JDU नेता और सीतामढ़ी सांसद देवेश चंद्र ठाकुर का अहम रोल माना जाता है, लेकिन उन्हें हराने में भी उन्हीं की भूमिका बताई जाती है। दरअसल, सांसद बनने के बाद उन्होंने मुस्लिम और कुशवाहा को लेकर कई बयान दिए थे। इसके कारण देवेश चंद्र ठाकुर के खिलाफ इलाके में भारी नाराजगी है। इसका खामियाजा चुनाव में अभिषेक झा को भुगतना पड़ा। वहीं, JDU लीडरशिप से नाराज चल रहे आनंद मोहन ने भी शिवहर और सीतामढ़ी के इलाके में JDU को भारी नुकसान पहुंचाया है। बिना किसी ऐलान के साइलेंटली आनंद मोहन ने अपनी नारजागी जताई। उन्होंने किसी का नाम लिए बिना अपने समर्थकों को इलाके में एक्टिव किया। बंशीधर के एंटी इनकम्बेंसी पर वोटों का बिखराव पड़ा भारी JDU नेता देवेश चंद्र ठाकुर के सांसद बनने के बाद 2024 में तिरहुत स्नातक सीट पर उपचुनाव हुआ था। तब वंशीधर ब्रजवासी ने शिक्षा सचिव केके पाठक से त्रस्त आकर यहां से निर्दलीय चुनाव लड़ा था और JDU के अभिषेक झा को मात दी थी। शिक्षकों के बीच लोकप्रिय वंशीधर ने युवाओं के बीच अपनी लोकप्रियता साबित की थी। इन दो सालों के बीच भी वे शिक्षकों के बीच तो रहे, लेकिन युवाओं से उनका जुड़ाव कटने लगा था। इलाके में बात करने के बाद उनके प्रति नाराजगी तो दिखती थी, लेकिन उनके उनके खिलाफ वोटों के बिखराव ने उनकी जीत का रास्ता आसान बना दिया। यहां JDU के अभिषेक झा के अलावा RJD ने डॉ. रश्मि विनायक गौतम और जन सुराज ने डॉ. विमोहन कुमार को मैदान में उतारा। इससे मुकाबला बहुकोणीय हुआ। सवर्णों के वोट का बिखराव हो गया। बंशीधर ने अगड़ा-पिछड़ा कार्ड खेला मुजफ्फरपुर के सीनियर जर्नलिस्ट विभेष कुमार ने बताया, ‘पिछले चुनाव में युवाओं और शिक्षकों के मुद्दे पर चुनाव लड़ने वाले बंशीधर ब्रजवासी ने इस बार चुनाव में पिछड़ा कार्ड खेला। उनके खिलाफ चुनाव लड़ रहे सभी पार्टियों के कैंडिडेट सवर्ण थे। ऐसे में इलाके के पिछड़ा वोटर्स उनके पक्ष में गोलबंद हो गए। इसका उन्हें चुनाव में लाभ मिला।’ दरभंगा: सर्वेश कुमार की लोकप्रियता विपक्षियों पर भारी पड़ी दरभंगा में बीजेपी टेक्टिकली इस बार स्नातक सीट पर चुनाव लड़ी। अभी तक पार्टी यहां शिक्षक सीट पर लड़ती आ रही थी। सर्वेश कुमार पिछली बार BJP से बागी होकर चुनाव लड़े और जीत गए। सिटिंग MLC होने के बाद भी उनके खिलाफ नाराजगी इस बार नहीं दिखी। BJP में आने के बाद अपने पॉकेट वोट के साथ उन्हें BJP और NDA के सपोर्ट का भी फायदा मिला। संगठन वोटों का बिखराव रोकने में सफल रहा। दरभंगा के सीनियर जर्नलिस्ट प्रशांत झा बताते हैं, ‘इस बार BJP के सर्वेश कुमार और RJD के अनिल झा के बीच सीधी टक्कर थी। ऐसे में दरभंगा के साथ बेगूसराय के भूमिहारों ने एग्रेसिवली सर्वेश के पक्ष में वोट किया।’ RJD के कोर वोटर्स ने अनिल झा को सपोर्ट किया। प्रशांत किशोर ने यहां से मुस्लिम कैंडिडेट डॉ. मो. इम्तियाज को उतारकर मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने की कोशिश जरूर की, लेकिन उनका प्रयोग पूरी तरह फेल रहा। कोसी: जनसुराज का दांव फेल, BJP की एकतरफा जीत 8 सीटों के लिए हुए इस चुनाव में सबसे बड़ी जीत कोसी स्नातक सीट से BJP के कैंडिडेट एनके यादव ने दर्ज की है। इन्होंने RJD के नितेश को 11 हजार से भी ज्यादा वोटों से हराया है। इसका सबसे बड़ा कारण उनके खिलाफ किसी तरह की एंटी इनकम्बेंसी का नहीं होना है। वह लगातार तीसरी बार चुनाव लड़ रहे थे, लेकिन किसी वर्ग में इनके खिलाफ कोई नाराजगी नहीं थी। जनसुराज की तरफ से यहां उलटफेर करने की कोशिश की गई, लेकिन पार्टी औंधे मुंह गिर गई। BJP और RJD की तरफ से यहां यादव कैंडिडेट को मैदान में उतारा गया था। जनसुराज ने राजपूत समाज से आने वाले रजनीश रंजन को मैदान में उतारा, लेकिन वह सहरसा और कुछ हद तक मधेपुरा तक ही सीमित दिखे। एनके यादव को अपना पॉकेट वोट मिलने के साथ संगठन का भी खूब साथ मिला। भौगोलिक दृष्टिकोण से कोसी स्नातक सबसे बड़ा क्षेत्र था। इसमें कोसी, अंग और सीमांचल, तीनों इलाके को मिलाकर 14 जिले आते हैं। इन जिलों में NDA की मजबूत पकड़ थी। यहां की 80 फीसदी से ज्यादा विधानसभा सीटों पर NDA का कब्जा था। विधायक एनके सिंह के पक्ष में ग्राउंड पर उतरे और अपने कैंडिडेट को जीताने में सफल रहे। अब इस जीत-हार के 3 मैसेज जानते हैं शिक्षित लोगों के बीच NDA की स्वीकार्यता बरकरार बांकीपुर उपचुनाव में हार के बाद BJP और खासकर सम्राट सरकार के लिए MLC चुनाव प्रतिष्ठा की बात बन गई थी। सम्राट चौधरी के CM बनने के बाद चुनाव में NDA कैंडिडेट की लगातार हार हो रही थी। ऐसे में पार्टी ने इस चुनाव में अपनी पूरी ताकत लगा दी थी। इस चुनाव परिणाम से सरकार की सेहत पर फर्क नहीं पड़ा, लेकिन इसके दो मैसेज गए। पहला-NDA एकजुट है। शिक्षित वोटर्स अभी भी NDA के साथ है। BJP पटना शिक्षक का अपना 12 साल का किला भले नहीं बचा पाई, लेकिन दो हार के बाद तिरहुत जीतने में जरूर सफल रही। JDU अपनी एक मात्र पटना स्नातक की सिटिंग सीट बचाने में सफल रही। बिखरा विपक्ष NDA के सामने और कमजोर हुआ इस चुनाव में ये भी स्पष्ट हुआ कि NDA से मुकाबले के लिए विपक्ष को एकजुट होना होगा। बिखरा विपक्ष NDA का मुकाबला नहीं कर पाएगा। MLC के इस चुनाव में महागठबंधन पूरी तरह बिखर गया था। RJD ने गठबंधन के साथियों के बिना सहमति के 7 सीटों पर कैंडिडेट उतार दिए। केवल तिरहुत शिक्षक का सीट CPI के लिए छोड़ा। बाद में कांग्रेस भी 5 सीटों पर कैंडिडेट उतार दी। नतीजा महागठबंधन चुनाव में पूरी तरह पिछड़ गया। RJD एक मात्र पटना शिक्षक सीट जीत सकी। विपक्ष को 7 सातों पर हार मिली। पटना शिक्षक सीट की जीत का श्रेय भी RJD से ज्यादा कैंडिडेट डॉ. संजीव को दिया जा रहा है। इस चुनाव के बाद CPI विधान परिषद से पूरी तरह साफ हो गई। कांग्रेस अपनी एक सीट भी नहीं बचा पाई। प्रशांत किशोर बिहार में विपक्ष का बड़ा चेहरा बने विधानसभा चुनाव में 95 फीसदी से ज्यादा सीटों पर जमानत जब्त कराने के बाद ऐसा माना जा रहा है कि जनसुराज बिहार में नहीं टिक पाएगा। अब जनसुराज बिहार की सियासत में विपक्ष का बड़ा चेहरा बन कर उभर रहा है। भले विधानसभा चुनाव में प्रशांत किशोर पिछड़ गए हों, लेकिन अब वह लगातार कमबैक कर रहे हैं। पहले उन्होंने बांकीपुर उपचुनाव में BJP से उनका 30 साल का किला छीना। अब दरभंगा शिक्षक की सीट जीतकर विधान परिषद में भी जनसुराज की एंट्री हो गई। हर सीट पर पार्टी मजबूती से चुनाव लड़ी और लगभग हर सीट पर तीसरे नंबर पर रही। सीट जीतने में पार्टी सफल नहीं रही, लेकिन मैसेज देने में जरूर सफल रही कि प्रशांत विपक्ष का मजबूत चेहरा बन रहे हैं। वह चुनावी कैंपेन के दौरान इस बात को लगातार दोहराते भी रहे। इस रिजल्ट का एक संदेश यह भी है कि शिक्षित वोटर्स प्रशांत किशोर को अपना समर्थन दे रहे हैं। 8 सीटों पर MLC चुनाव के नतीजे के साथ ही बिहार विधान परिषद से लेफ्ट की पार्टी CPI का पूरी तरह सफाया हो गया। कांग्रेस एक सीट पर सिमट गई। JDU के मैनेजमेंट के सामने अनंत सिंह चारो खाने चित्त हो गए। 8 सीटों के चुनाव में एक तरफ जहां BJP ने सबसे बड़ी जीत हासिल की है तो JDU भी अपनी सीट बचाने में सफल रही। हालांकि अभिषेक झा लगातार दूसरी बार हार गए। भास्कर की एक्सक्लूसिव रिपोर्ट में पढिए कैसे अनंत सिंह की भीड़ वोट में कन्वर्ट नहीं हो पाई। कोसी में BJP के कैंडिडेट के सामने कोई क्यों नहीं टिक पाया और इस जीत-हार के तीन बड़े मैसेज क्या हैं। पटना: अनंत सिंह की जिद पर नीरज का मैनेजमेंट भारी
चुनाव भले 8 सीटों पर थी, लेकिन लोगों की निगाहें पटना स्नातक सीट पर थी। यहां सिटिंग MLC नीरज कुमार के खिलाफ उनकी ही पार्टी (24 अक्टूबर से पहले) के मोकामा विधायक अनंत सिंह ने मोर्चा खोल दिया था। कंट्रोवर्सियल बयान से लेकर रोड शो तक की खूब चर्चा रही। अनंत सिंह ने जनसुराज के कैंडिडेट अनुज सिंह को समर्थन दिया था। RJD ने दिलीप पटेल को उम्मीदवार बनाया। इन तीनों के कारण मुकाबला त्रिकोणीय जरूर हुआ, लेकिन बूथ पर समीकरण पूरी तरह बदला दिखा। नीरज लगातार तीन टर्म से MLC हैं। इस इलाके में उनका अपना पॉकेट वोट है। इसका उन्हें लाभ मिला। अनंत सिंह के कारण अनुज सिंह को लाइमलाइट जरूर मिली, लेकिन उनके रोड शो की भीड़ वोट में कन्वर्ट नहीं हुई। निशांत कुमार ने फ्रंट से संभाली जिम्मेदारी नीरज कुमार और अनंत सिंह की लड़ाई JDU के लिए आन की लड़ाई बन गई थी। ऐसे में निशांत कुमार पहली बार किसी चुनाव को फ्रंड से लीड कर रहे थे। उन्होंने पटना स्नातक सीट के तीनों जिलों के नेताओं से अलग-अलग मुलाकात की। जिले में वोट कराने की जिम्मेदारी दी। इसके बाद लगातार दो दिन नालंदा गए और वहां कैंपेनिंग की। इसका सीधा लाभ नीरज कुमार को मिला। मतदान से दो दिन पहले नीरज कुमार की तबीयत बिगड़ी तो बिहार के पूर्व सीएम नीतीश कुमार उन्हें देखने घर पहुंचे। इसके बाद कुर्मी वोटों के बिखराव का जो डर था वो पूरी तरह JDU के साथ गोलबंद हो गया। भूमिहार वोटों के बिखराव को कुर्मी वोट से मैनेज किया RJD के कैंडिडेट दिलीप पटेल का पूरा फोकस नालंदा में कुर्मी वोटर्स पर था। इसके लिए उन्होंने सबसे ज्यादा कैंपेन नालंदा में किया। जनसुराज कैंडिडेट अनुज सिंह खुद भूमिहार थे। उन्हें भूमिहार नेता अनंत सिंह का सपोर्ट मिल रहा था। ऐसे में भूमिहार वोटों में बिखराव तय था। इसके लिए नीरज कुमार ने कुर्मी वोट को मैनेज किया। इसमें उन्हें NDA संगठन खास कर JDU का भरपूर सपोर्ट मिला। तिरहुत: देवेश चंद्र ठाकुर और आनंद मोहन ने JDU का खेल बिगाड़ा अभिषेक झा को यहां टिकट दिलाने में JDU नेता और सीतामढ़ी सांसद देवेश चंद्र ठाकुर का अहम रोल माना जाता है, लेकिन उन्हें हराने में भी उन्हीं की भूमिका बताई जाती है। दरअसल, सांसद बनने के बाद उन्होंने मुस्लिम और कुशवाहा को लेकर कई बयान दिए थे। इसके कारण देवेश चंद्र ठाकुर के खिलाफ इलाके में भारी नाराजगी है। इसका खामियाजा चुनाव में अभिषेक झा को भुगतना पड़ा। वहीं, JDU लीडरशिप से नाराज चल रहे आनंद मोहन ने भी शिवहर और सीतामढ़ी के इलाके में JDU को भारी नुकसान पहुंचाया है। बिना किसी ऐलान के साइलेंटली आनंद मोहन ने अपनी नारजागी जताई। उन्होंने किसी का नाम लिए बिना अपने समर्थकों को इलाके में एक्टिव किया। बंशीधर के एंटी इनकम्बेंसी पर वोटों का बिखराव पड़ा भारी JDU नेता देवेश चंद्र ठाकुर के सांसद बनने के बाद 2024 में तिरहुत स्नातक सीट पर उपचुनाव हुआ था। तब वंशीधर ब्रजवासी ने शिक्षा सचिव केके पाठक से त्रस्त आकर यहां से निर्दलीय चुनाव लड़ा था और JDU के अभिषेक झा को मात दी थी। शिक्षकों के बीच लोकप्रिय वंशीधर ने युवाओं के बीच अपनी लोकप्रियता साबित की थी। इन दो सालों के बीच भी वे शिक्षकों के बीच तो रहे, लेकिन युवाओं से उनका जुड़ाव कटने लगा था। इलाके में बात करने के बाद उनके प्रति नाराजगी तो दिखती थी, लेकिन उनके उनके खिलाफ वोटों के बिखराव ने उनकी जीत का रास्ता आसान बना दिया। यहां JDU के अभिषेक झा के अलावा RJD ने डॉ. रश्मि विनायक गौतम और जन सुराज ने डॉ. विमोहन कुमार को मैदान में उतारा। इससे मुकाबला बहुकोणीय हुआ। सवर्णों के वोट का बिखराव हो गया। बंशीधर ने अगड़ा-पिछड़ा कार्ड खेला मुजफ्फरपुर के सीनियर जर्नलिस्ट विभेष कुमार ने बताया, ‘पिछले चुनाव में युवाओं और शिक्षकों के मुद्दे पर चुनाव लड़ने वाले बंशीधर ब्रजवासी ने इस बार चुनाव में पिछड़ा कार्ड खेला। उनके खिलाफ चुनाव लड़ रहे सभी पार्टियों के कैंडिडेट सवर्ण थे। ऐसे में इलाके के पिछड़ा वोटर्स उनके पक्ष में गोलबंद हो गए। इसका उन्हें चुनाव में लाभ मिला।’ दरभंगा: सर्वेश कुमार की लोकप्रियता विपक्षियों पर भारी पड़ी दरभंगा में बीजेपी टेक्टिकली इस बार स्नातक सीट पर चुनाव लड़ी। अभी तक पार्टी यहां शिक्षक सीट पर लड़ती आ रही थी। सर्वेश कुमार पिछली बार BJP से बागी होकर चुनाव लड़े और जीत गए। सिटिंग MLC होने के बाद भी उनके खिलाफ नाराजगी इस बार नहीं दिखी। BJP में आने के बाद अपने पॉकेट वोट के साथ उन्हें BJP और NDA के सपोर्ट का भी फायदा मिला। संगठन वोटों का बिखराव रोकने में सफल रहा। दरभंगा के सीनियर जर्नलिस्ट प्रशांत झा बताते हैं, ‘इस बार BJP के सर्वेश कुमार और RJD के अनिल झा के बीच सीधी टक्कर थी। ऐसे में दरभंगा के साथ बेगूसराय के भूमिहारों ने एग्रेसिवली सर्वेश के पक्ष में वोट किया।’ RJD के कोर वोटर्स ने अनिल झा को सपोर्ट किया। प्रशांत किशोर ने यहां से मुस्लिम कैंडिडेट डॉ. मो. इम्तियाज को उतारकर मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने की कोशिश जरूर की, लेकिन उनका प्रयोग पूरी तरह फेल रहा। कोसी: जनसुराज का दांव फेल, BJP की एकतरफा जीत 8 सीटों के लिए हुए इस चुनाव में सबसे बड़ी जीत कोसी स्नातक सीट से BJP के कैंडिडेट एनके यादव ने दर्ज की है। इन्होंने RJD के नितेश को 11 हजार से भी ज्यादा वोटों से हराया है। इसका सबसे बड़ा कारण उनके खिलाफ किसी तरह की एंटी इनकम्बेंसी का नहीं होना है। वह लगातार तीसरी बार चुनाव लड़ रहे थे, लेकिन किसी वर्ग में इनके खिलाफ कोई नाराजगी नहीं थी। जनसुराज की तरफ से यहां उलटफेर करने की कोशिश की गई, लेकिन पार्टी औंधे मुंह गिर गई। BJP और RJD की तरफ से यहां यादव कैंडिडेट को मैदान में उतारा गया था। जनसुराज ने राजपूत समाज से आने वाले रजनीश रंजन को मैदान में उतारा, लेकिन वह सहरसा और कुछ हद तक मधेपुरा तक ही सीमित दिखे। एनके यादव को अपना पॉकेट वोट मिलने के साथ संगठन का भी खूब साथ मिला। भौगोलिक दृष्टिकोण से कोसी स्नातक सबसे बड़ा क्षेत्र था। इसमें कोसी, अंग और सीमांचल, तीनों इलाके को मिलाकर 14 जिले आते हैं। इन जिलों में NDA की मजबूत पकड़ थी। यहां की 80 फीसदी से ज्यादा विधानसभा सीटों पर NDA का कब्जा था। विधायक एनके सिंह के पक्ष में ग्राउंड पर उतरे और अपने कैंडिडेट को जीताने में सफल रहे। अब इस जीत-हार के 3 मैसेज जानते हैं शिक्षित लोगों के बीच NDA की स्वीकार्यता बरकरार बांकीपुर उपचुनाव में हार के बाद BJP और खासकर सम्राट सरकार के लिए MLC चुनाव प्रतिष्ठा की बात बन गई थी। सम्राट चौधरी के CM बनने के बाद चुनाव में NDA कैंडिडेट की लगातार हार हो रही थी। ऐसे में पार्टी ने इस चुनाव में अपनी पूरी ताकत लगा दी थी। इस चुनाव परिणाम से सरकार की सेहत पर फर्क नहीं पड़ा, लेकिन इसके दो मैसेज गए। पहला-NDA एकजुट है। शिक्षित वोटर्स अभी भी NDA के साथ है। BJP पटना शिक्षक का अपना 12 साल का किला भले नहीं बचा पाई, लेकिन दो हार के बाद तिरहुत जीतने में जरूर सफल रही। JDU अपनी एक मात्र पटना स्नातक की सिटिंग सीट बचाने में सफल रही। बिखरा विपक्ष NDA के सामने और कमजोर हुआ इस चुनाव में ये भी स्पष्ट हुआ कि NDA से मुकाबले के लिए विपक्ष को एकजुट होना होगा। बिखरा विपक्ष NDA का मुकाबला नहीं कर पाएगा। MLC के इस चुनाव में महागठबंधन पूरी तरह बिखर गया था। RJD ने गठबंधन के साथियों के बिना सहमति के 7 सीटों पर कैंडिडेट उतार दिए। केवल तिरहुत शिक्षक का सीट CPI के लिए छोड़ा। बाद में कांग्रेस भी 5 सीटों पर कैंडिडेट उतार दी। नतीजा महागठबंधन चुनाव में पूरी तरह पिछड़ गया। RJD एक मात्र पटना शिक्षक सीट जीत सकी। विपक्ष को 7 सातों पर हार मिली। पटना शिक्षक सीट की जीत का श्रेय भी RJD से ज्यादा कैंडिडेट डॉ. संजीव को दिया जा रहा है। इस चुनाव के बाद CPI विधान परिषद से पूरी तरह साफ हो गई। कांग्रेस अपनी एक सीट भी नहीं बचा पाई। प्रशांत किशोर बिहार में विपक्ष का बड़ा चेहरा बने विधानसभा चुनाव में 95 फीसदी से ज्यादा सीटों पर जमानत जब्त कराने के बाद ऐसा माना जा रहा है कि जनसुराज बिहार में नहीं टिक पाएगा। अब जनसुराज बिहार की सियासत में विपक्ष का बड़ा चेहरा बन कर उभर रहा है। भले विधानसभा चुनाव में प्रशांत किशोर पिछड़ गए हों, लेकिन अब वह लगातार कमबैक कर रहे हैं। पहले उन्होंने बांकीपुर उपचुनाव में BJP से उनका 30 साल का किला छीना। अब दरभंगा शिक्षक की सीट जीतकर विधान परिषद में भी जनसुराज की एंट्री हो गई। हर सीट पर पार्टी मजबूती से चुनाव लड़ी और लगभग हर सीट पर तीसरे नंबर पर रही। सीट जीतने में पार्टी सफल नहीं रही, लेकिन मैसेज देने में जरूर सफल रही कि प्रशांत विपक्ष का मजबूत चेहरा बन रहे हैं। वह चुनावी कैंपेन के दौरान इस बात को लगातार दोहराते भी रहे। इस रिजल्ट का एक संदेश यह भी है कि शिक्षित वोटर्स प्रशांत किशोर को अपना समर्थन दे रहे हैं।

