अंतरराष्ट्रीय श्रीरामलीला उत्सव में सत्रिया नृत्य की प्रस्तुति:सत्रिया नृत्य में जीवंत हुए अहल्या उद्धार, पुष्प वाटिका और सीता स्वयंवर के प्रसंग

अंतरराष्ट्रीय श्रीरामलीला उत्सव में सत्रिया नृत्य की प्रस्तुति:सत्रिया नृत्य में जीवंत हुए अहल्या उद्धार, पुष्प वाटिका और सीता स्वयंवर के प्रसंग

भोपाल के अंतरराष्ट्रीय श्रीरामलीला उत्सव के दूसरे दिन असम की 15वीं शताब्दी की समृद्ध सत्रिया नृत्य शैली में भगवान श्रीराम के जीवन से जुड़े प्रसंगों की भावपूर्ण प्रस्तुति दी गई। श्रीरामचंद्र पथ गमन न्यास और संस्कृति विभाग, मध्यप्रदेश शासन द्वारा आयोजित सात दिवसीय उत्सव में सत्रिया केंद्र, गुवाहाटी के कलाकारों ने ‘श्रीराम पर्व’ नृत्य-नाटिका के माध्यम से अहल्या उद्धार, पुष्प वाटिका, सीता स्वयंवर और लक्ष्मण-परशुराम संवाद को मंच पर जीवंत किया। करीब 90 मिनट की प्रस्तुति में नृत्य, संगीत, अभिनय और संवादों का संगम देखने को मिला। नृत्य-नाटिका की शुरुआत अहल्या उद्धार के प्रसंग से हुई। इसके बाद मिथिला की पुष्प वाटिका में श्रीराम और सीता की पहली भेंट, सीता स्वयंवर में शिव धनुष भंग और फिर परशुराम-लक्ष्मण संवाद का मंचन किया गया। प्रस्तुति में श्रीराम की विनम्रता, मर्यादा, धैर्य और धर्म के प्रति प्रतिबद्धता को कलात्मक ढंग से दर्शाया गया। बौद्धिक सम्मेलन में रामकथा के विविध आयामों पर चर्चा उत्सव के दूसरे दिन अंतरराष्ट्रीय बौद्धिक सम्मेलन में रामायणकालीन पारिस्थितिकी तंत्र, लोककथाओं में श्रीराम और आदर्श नेतृत्व एवं सुशासन जैसे विषयों पर विचार रखे गए। ऑस्ट्रेलिया से आईं शोधकर्ता मित्रा देसाई ने रामायण के भौगोलिक साक्ष्यों और अपनी शोध यात्रा के संदर्भ में विचार व्यक्त किए। सत्र की अध्यक्षता कर रहे पद्मश्री डॉ. भगवतीलाल राजपुरोहित ने कहा कि रामकथा को गहराई से समझने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि रामलीला अब वैश्विक स्वरूप ले चुकी है और दुनिया के अनेक हिस्सों में अलग-अलग रूपों में मंचित होती है। श्रीलंका के शोधकर्ता दिसनायके मुदियंसेलागे महील भंडारा ने वहां प्रचलित लोककथाओं में जमीन के नीचे मौजूद सुरंगों और गुफाओं का उल्लेख किया। वहीं, आचार्य मिथिलेश नंदिनी शरण महाराज ने कहा कि श्रीराम भारतीय परंपरा में हमेशा चेतना के केंद्र रहे हैं। देखिए रामलीला महोत्सव के दौरान तस्वीरें… चित्रकला शिविर और कलाकृतियां बनीं आकर्षण उत्सव के तहत ‘राघव के रंग’ चित्रकला शिविर भी शुरू हुआ, जिसमें देश के विभिन्न ललित कला संस्थानों के 80 विद्यार्थी रामकथा के प्रसंगों पर चित्र बना रहे हैं। ‘स्वरांकन’ गतिविधि में भजन गायन के साथ कलाकारों ने उसके भावों को कैनवास पर उकेरा। रवींद्र भवन परिसर में आयोजित प्रदर्शनियों में थाईलैंड की खोन शैली के मुखौटे और आंध्रप्रदेश की पारंपरिक नक्शी डॉल्स भी प्रदर्शित की गईं। उत्सव के माध्यम से रामकथा को विभिन्न कला माध्यमों से प्रस्तुत कर भारतीय सांस्कृतिक विरासत को व्यापक दर्शकों तक पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है।

​ 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *