Field Marshal: पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल फील्ड मार्शल आसिम मुनीर इन दिनों बेहद उत्साहित दिखाई दे रहे हैं। इस उत्साह की मुख्य वजह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से की गई उनकी वह भारी-भरकम तारीफ है, जिसने मुनीर की वैश्विक कूटनीतिक महत्वाकांक्षाओं को परवान चढ़ा दिया है। ट्रंप ने खुले तौर पर मुनीर को अपना ‘फेवरेट फील्ड मार्शल’ करार दिया है। इस एक बयान ने पाकिस्तानी हुक्मरानों को इतना ‘फुला’ दिया है कि मुनीर अब खुद को मध्य पूर्व के सबसे बड़े शांतिदूत के तौर पर पेश कर रहे हैं और इसी कड़ी में उन्होंने ईरान को लेकर एक अहम बयान भी दे डाला है।
अमेरिका-ईरान के बीच ‘शांतिदूत’ बनने की होड़
इस समय पूरी दुनिया की निगाहें अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच चल रहे भयंकर तनाव पर टिकी हैं। इसी बीच पाकिस्तान ने इस वैश्विक संकट में अपना फायदा ढूंढ लिया है। मुनीर ने इस युद्ध को रुकवाने के लिए अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता करने का जिम्मा अपने सिर ले लिया है। मुनीर के इसी कदम से खुश होकर डोनाल्ड ट्रंप ने उन्हें ‘असाधारण व्यक्ति’ और ‘कमाल का फाइटर’ तक कह दिया। ट्रंप की इस कूटनीतिक चापलूसी ने मुनीर का आत्मविश्वास इस कदर बढ़ा दिया कि वे सीधे ईरान के अधिकारियों के साथ बातचीत की मेज पर जा बैठे।
ईरान पर मुनीर का बड़ा बयान
डोनाल्ड ट्रंप से हरी झंडी मिलने के बाद, पाकिस्तानी सेना प्रमुख ने ईरान और क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर कड़ा रुख अपना लिया है। ईरान जाकर या ईरानी नेतृत्व के साथ अपनी बातचीत में मुनीर ने साफ कर दिया है कि इस क्षेत्र में व्यापार और समुद्री मार्गों (जैसे होर्मुज जलडमरूमध्य) की सुरक्षा सर्वोपरि है। उन्होंने मध्यस्थता की आड़ में कड़ा संदेश दिया कि फारस की खाड़ी और ओमान सागर में किसी भी तरह के आयात-निर्यात को रुकने नहीं दिया जाएगा। यह बयान सीधे तौर पर अमेरिका के हितों की रक्षा करता है और दिखाता है कि मुनीर, ट्रंप के प्लान के अनुसार ही बिसात बिछा रहे हैं।
पाकिस्तान का छिपा हुआ एजेंडा
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि असीम मुनीर की यह पूरी कवायद सिर्फ दुनिया में शांति स्थापित करने के लिए नहीं है, बल्कि इसके पीछे पाकिस्तान की अपनी मजबूरियां छिपी हैं। कंगाली की कगार पर खड़ा पाकिस्तान इस समय भारी आर्थिक संकट से जूझ रहा है। मुनीर जानते हैं कि अगर वे अमेरिका और ईरान के बीच कोई भी ‘डील’ या ‘सीजफायर’ कराने में सफल हो गए, तो अमेरिका खुश होकर पाकिस्तान को फिर से भारी-भरकम आर्थिक मदद, नया निवेश और सुरक्षा गारंटी दे सकता है। यानी, यह कूटनीति कम और पाकिस्तान की ‘तिजोरी’ भरने की चाल ज्यादा है।
क्या आसिम मुनीर सफल हो पाएंगे ?
हालांकि, ट्रंप और मुनीर के बीच फोन कॉल्स और मुलाकातों का दौर जारी है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक इस ‘दोस्ती’ को शक की निगाह से देख रहे हैं। ईरान जैसे सख्त देश को अमेरिका की शर्तों पर राजी करना पाकिस्तान के लिए लोहे के चने चबाने जैसा है। ट्रंप अक्सर अपने फायदे के लिए नेताओं की तारीफ करते हैं और काम निकलने के बाद उन्हें भूल जाते हैं। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि ‘फेवरेट फील्ड मार्शल’ का यह तमगा मुनीर को सच में कोई कूटनीतिक सफलता दिलाता है, या फिर यह सिर्फ एक और ख्याली पुलाव साबित होता है।
पाकिस्तान अपनी हैसियत से बड़ा दांव खेल रहा
भू-राजनीतिक विशेषज्ञों और कूटनीतिक जानकारों का मानना है कि पाकिस्तान अपनी हैसियत से बड़ा दांव खेल रहा है। ट्रंप का मुनीर को ‘फेवरेट फील्ड मार्शल’ कहना सिर्फ एक ‘ट्रांजैक्शनल कूटनीति’ का हिस्सा है। अमेरिका अपनी साख दांव पर लगाए बिना बैक-चैनल से ईरान को साधना चाहता है और इसके लिए उसे पाकिस्तान का कंधा मिल गया है। दूसरी ओर, पाकिस्तान की अवाम और वहां के स्थानीय पत्रकार इस पूरी घटना को अपनी खस्ताहाल अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए रचे गए एक ‘नाटक’ के रूप में देख रहे हैं।
क्या ट्रंप प्रशासन पाकिस्तान पर लगे पुराने प्रतिबंधों में ढील देगा
इस मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच कोई सीधी या परोक्ष बातचीत सच में धरातल पर उतर पाएगी? आने वाले दिनों में यह देखना होगा कि मुनीर की ईरान के साथ बातचीत के क्या ठोस परिणाम निकलते हैं। अगर युद्धविराम होता है, तो क्या ट्रंप प्रशासन पाकिस्तान पर लगे पुराने प्रतिबंधों में ढील देगा या उसे कोई नया आर्थिक पैकेज सौंपेगा? हमारी नज़र इस कूटनीतिक घटनाक्रम के अगले चरण पर बनी हुई है।
इस पूरे घटनाक्रम पर भारत की पैनी नजर
बहरहाल, इस पूरे घटनाक्रम पर भारत की पैनी नज़र है। अमेरिका और पाकिस्तान की सेना के बीच बढ़ती यह अचानक नज़दीकी दक्षिण एशिया के कूटनीतिक समीकरणों को प्रभावित कर सकती है। भारत के लिए चिंता का विषय यह हो सकता है कि अमेरिका, मध्य पूर्व में अपने काम निकलवाने के एवज में कहीं पाकिस्तान को नए आधुनिक हथियार या सैन्य समर्थन ना दे दे, जिसका सीधा असर सीमा पार आतंकवाद और क्षेत्रीय सुरक्षा पर पड़ सकता है।


