Variola Virus Symptoms: इतिहास में कई ऐसी बीमारियां रही हैं जिन्होंने पूरी दुनिया में तबाही मचाई है, और उन्हीं में से एक सबसे नाम है स्मॉलपॉक्स (Smallpox), जिसे हिंदी में हम चेचक के नाम से भी जानते हैं। इसी स्मॉलपॉक्स बीमारी को फैलाने वाले वायरस का नाम वेरियोला (Variola) है। यह एक बेहद संक्रामक और जानलेवा वायरस था, जिसने सदियों तक लाखों लोगों की जान ली। मेयो क्लिनिक और अमेरिका की स्वास्थ्य एजेंसी सीडीसी (CDC) के अनुसार, वेरियोला वायरस के कारण ही स्मॉलपॉक्स की गंभीर बीमारी होती थी। राहत की बात यह है कि दुनिया भर में चलाए गए टीकाकरण (Vaccination) अभियानों की बदौलत 1980 में विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने इसे पूरी तरह से खत्म (Eradicate) घोषित कर दिया था। लेकिन इस वायरस का इतिहास, इसके लक्षण और यह कैसे फैलता था, यह जानना आज भी स्वास्थ्य के लिहाज से बहुत जरूरी है। आइए समझते हैं वेरियोला वायरस के बारे में सब कुछ।
वेरियोला वायरस क्या है और यह कैसे फैलता था?
वेरियोला (Variola Virus) एक प्रकार का पॉक्सवायरस (Poxvirus) है। यह मुख्य रूप से इंसान से इंसान में ही फैलता था। यानी यह जानवरों से इंसानों में नहीं आता था। इस वायरस के फैलने के मुख्य कारण ये थे;
- सांस के जरिए सीधे संपर्क से।
- संक्रमित सामान से।
- त्वचा के दानों के संपर्क में आने से।
वेरियोला (स्मॉलपॉक्स) के मुख्य लक्षण
जब यह वायरस किसी इंसान के शरीर में प्रवेश करता था, तो इसके लक्षण तुरंत दिखाई नहीं देते थे। इसे शरीर में पनपने में 10 से 14 दिनों का समय (Incubation Period) लगता था। इसके बाद लक्षण दो चरणों में सामने आते थे:
- अचानक बहुत तेज बुखार आना (101°F से 104°F या उससे ज्यादा)।
- सिर में भयंकर दर्द होना और ठंड लगना।
- पीठ और कमर के निचले हिस्से में तेज दर्द।
- अत्यधिक थकान, कमजोरी और उल्टी होना।
- बुखार आने के 2 से 4 दिन बाद शरीर पर दाने निकलने शुरू होते थे
- सबसे पहले मुंह, जीभ और गले के अंदर छोटे-छोटे लाल चकत्ते बनते थे।
- कुछ ही दिनों में ये दाने बड़े होकर मवाद (Pus) से भरे फफोले बन जाते थे।
- दाने छूने में बहुत सख्त और चुभने वाले होते थे।
वेरियोला से क्या-क्या खतरे और जटिलताएं थीं?
वेरियोला वायरस से होने वाली चेचक बेहद खतरनाक थी। इस बीमारी से पीड़ित लगभग 30% मरीजों की मौत हो जाती थी। इसके अलावा, जो लोग बच जाते थे, उन्हें जिंदगी भर के लिए कई तरह की परेशानियां झेलनी पड़ती थीं, अगर वायरस आंखों तक पहुंच जाता था, तो मरीज की आंखों की रोशनी हमेशा के लिए चली जाती थी। चेहरे और शरीर पर इतने गहरे गड्ढे पड़ जाते थे कि व्यक्ति का चेहरा पूरी तरह बदल जाता था। शरीर की इम्युनिटी कमजोर होने के कारण फेफड़ों का इंफेक्शन (निमोनिया) या खून में इंफेक्शन (सेप्सिस) हो जाता था।
कैसे खत्म हुआ यह वायरस?
वेरियोला वायरस का कोई खास एंटीवायरल इलाज नहीं था; मरीजों को केवल उनके लक्षणों के आधार पर राहत दी जाती थी। इस बीमारी को खत्म करने में केवल स्मॉलपॉक्स वैक्सीन (Smallpox Vaccine) ने ही सबसे बड़ी भूमिका निभाई। एडवर्ड जेनर द्वारा खोजी गई इस वैक्सीन का दुनिया भर में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया गया। इसी का नतीजा है कि आज प्राकृतिक रूप से यह वायरस दुनिया में कहीं भी मौजूद नहीं है। अब यह वायरस केवल अमेरिका और रूस की बेहद सुरक्षित प्रयोगशालाओं में रिसर्च के उद्देश्य से रखा गया है।

