अनोखा निमंत्रण! राजस्थान में यहां साबुन-तौलिया देकर देते हैं बारात में जाने का न्योता, सदियों से चली आ रही परंपरा

ठुकरियासर. राजस्थान अपनी विविधतापूर्ण सांस्कृतिक विरासत, अनूठी परंपराओं और क्षेत्रीय विशिष्टताओं के लिए दुनियाभर में प्रसिद्ध है। शादी विवाह हो या कोई अन्य मांगलिक अवसर उसमें निमंत्रण देने की परम्परा का चलन पूर्वजों ने अनूठे तरीके से किया और कई पीढ़ियों के बीत जाने के बाद भी उनके परिवार के लोग आज भी बखूबी से निभा रहे हैं।

श्रीडूंगरगढ़ कस्बे में किसी भी बाराती को बारात में ले जाने का न्योता जहां कागज और कलम के जरिए चौका मंढ़वा कर दिया जाता है। वहीं तोलियासर गांव में राजपुरोहित समाज के लोग साबुन और तौलिया देकर बारात में जाने का निमंत्रण देते हैं।

अनूठी है परम्पराएं

साहित्यकार सत्यदीप बताते हैं कि यहां शादियों में अनेक अनूठी परंपराएं हैं। एक कहावत है कि बारह कोस में बोली पलटे, दस कोस में पानी। अलग-अलग क्षेत्र की विविधता भरी और अनूठी परंपराओं ने ही राजस्थान को रंगीला राजस्थान बनाया है।

यहां शादियों में प्रचलित बिनोटा (दूल्हा-दुल्हन की जूतियां), कांकरडोरा (नजर से बचाव के धागे), सामेला (वधू पक्ष द्वारा वर पक्ष का स्वागत), कंवर कलेवा के अलावा बिनायक मुंदणा, जुआ खेल, तोरण मारना और मायरा-भात रस्में संस्कृति को खास बनाती हैं।

चौका यानी बरात जाने की स्वीकृति देना

श्रीडूंगरगढ़ कस्बे में बारात का निमंत्रण चौका यानी चार की संख्या लिखवाकर दिया जाता है। कस्बे के निवासी चौका का अर्थ पूर्णता का प्रतीक मानते हुए पीढ़ियों से इस परम्परा का निर्वहन कर रहे हैं। यह परम्परा सैकड़ों वर्षों से चली आ रही है।

बारात में जिस व्यक्ति को ले जाना है, उसे दूल्हा के परिवार के लोग चौका मंढ़वाकर बाराती को आमंत्रित करते हैं। इसमें आमंत्रित व्यक्ति अपने नाम की सूची के आगे चोका (4) अंकित कर देता है, जो बारात में जाने की पूर्ण स्वीकृति मानी जाती है।

नहाने के साबुन से बाराती का निमंत्रण

क्षेत्र के तोलियासर गांव में राजपुरोहित समाज में लड़के की शादी में दूल्हा का परिवार साबुन देकर बरात में ले जाने का न्योता देते हैं। इस गांव के ग्रामीणों ने बताया कि बुजर्गों की ओर से सदियों पूर्व चलाई गई इस रीति रिवाज का पीढ़ी दर पीढ़ी आज भी निर्वहन किया जा रहा है।

गांव के राजाराम राजपुरोहित ने बताया कि समाज विवाह में बारात में साक्षी बनने वाले बारातियों को दो दिन पहले साबुन देने की परम्परा है, जो वर्षों से चली आ रही है। इसमें में परिवार के सदस्यों की ओर से साबुन देकर बारातियों का सम्मान किया जाता है। पृथ्वीराज राजपुरोहित बताते है कि पूर्वजों की सोच भी निराली थी।

प्राचीन काल में बारात जाने वाले को साबुन भेंट करना एक स्वच्छता और सजने संवरने का प्रतीक भी रहा है। इसके साथ ही बरात ले जाने का न्योता और बारातियों की गणना का भी एक हिस्सा है। जिस व्यक्ति ने साबुन को स्वीकार कर लिया वह बारात में जरूर जाएगा और जिसने साबुन अस्वीकार किया, वह नहीं जाएगा।

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