43 साल पुराने हत्या मामले में दो दोषी बरी:हाईकोर्ट ने कहा- संदेह का लाभ आरोपियों को मिले, ट्रायल कोर्ट से हुई थी सजा

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वर्ष 1981 के गैर इरादतन हत्या मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए 43 साल बाद दो दोषियों को बरी कर दिया।
अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा और ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्यों का सही कानूनी दृष्टिकोण से मूल्यांकन नहीं किया।न्यायमूर्ति तेज प्रताप तिवारी ने यह फैसला सुनाते हुए बस्ती के तत्कालीन सत्र न्यायाधीश द्वारा 26 मार्च 1983 को पारित निर्णय को रद्द कर दिया। ट्रायल कोर्ट ने सुनाई थी सजा ट्रायल कोर्ट ने आरोपी बैठोले उर्फ राम तीरथ को धारा 304 (2) आईपीसी में 10 वर्ष कठोर कारावास तथा शिव कुमार को तीन वर्ष कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। मामला बस्ती जिले के पैकोलिया थाना क्षेत्र के बसथनवा गांव का है। अभियोजन के अनुसार 24 जनवरी 1981 को खेत में काम कर रहे आत्मा प्रसाद पर श्याम बिहारी, शिव कुमार और बैठोले ने फरसा, बल्लम और लाठी से हमला किया था।
घायल आत्मा प्रसाद की अस्पताल ले जाते समय मौत हो गई थी। मामले में हत्या का मुकदमा दर्ज कर तीनों आरोपियों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया गया था। सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने एफआईआर, घटनास्थल, गवाहों के बयान और जांच प्रक्रिया में कई विरोधाभासों की ओर अदालत का ध्यान आकर्षित किया। यह भी कहा गया कि अभियोजन यह स्पष्ट नहीं कर पाया कि किस आरोपी ने कौन सी चोट पहुंचाई। जबकि समान साक्ष्यों के आधार पर एक आरोपी श्याम बिहारी को ट्रायल कोर्ट ने संदेह का लाभ देकर बरी कर दिया था, वहीं अन्य दो आरोपियों को दोषी ठहराया गया। दोषी ठहराना न्यायसंगत नहीं माना जाएगा हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि जब समान प्रकार के साक्ष्य सभी आरोपियों के खिलाफ हों, तब बिना किसी विशिष्ट और अलग साक्ष्य के केवल कुछ आरोपियों को दोषी ठहराना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता। अदालत ने न्यायिक निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि अभियोजन को अपना मामला संदेह से परे सिद्ध करना आवश्यक है। कोर्ट ने यह भी पाया कि एफआईआर में वर्षा होने का उल्लेख था, जबकि प्रत्यक्षदर्शी गवाह ने अदालत में कहा कि घटना के दिन बारिश नहीं हुई थी। इसी तरह घटनास्थल को लेकर भी गवाहों के बयानों और साइट प्लान में विरोधाभास पाए गए। जांच अधिकारी द्वारा गवाहों के बयान दर्ज करने में पांच दिन की देरी पर भी अदालत ने सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि आरोपियों से धारा 313 सीआरपीसी के तहत पूछे गए प्रश्न भी विधिसम्मत तरीके से नहीं पूछे गए, जिससे आरोपियों को अपने खिलाफ साक्ष्यों का समुचित जवाब देने का अवसर नहीं मिला। कोर्ट ने इसे भी ट्रायल की गंभीर खामी माना। इन सभी परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि आरोपियों को संदेह का लाभ दिया जाना चाहिए। इसके साथ ही दोनों आरोपियों की सजा और दोषसिद्धि को निरस्त करते हुए आपराधिक अपील मंजूर कर ली गई।

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