पत्रकारिता और न्यूज़रूम के माहौल पर आधारित कॉमेडी या व्यंग्य बनाना हमेशा से एक बेहद जोखिम भरा काम माना जाता है। किसी पत्रकार या मीडिया जगत के करीब रहे व्यक्ति की नज़र सबसे पहले उन छोटी-मोटी बारीकियों पर जाती है जो अक्सर स्क्रीन पर गलत दिखाई जाती हैं—जैसे पत्रकारों की आपसी बातचीत, किसी खबर का डेवलपमेंट, एडिटर का रवैया, डेडलाइन का दबाव और यहाँ तक कि बैकएंड पर काम करने वाला CMS (कंटेंट मैनेजमेंट सिस्टम)। ऐसे में किसी भी शो के लिए ज़रा सी चूक पर असफल होने की काफी गुंजाइश रहती है। लेकिन ‘द ऑफिस’ (The Office) का लोकप्रिय मॉक्यूमेंट्री स्पिन-ऑफ ‘द पेपर’ (The Paper) अपने दूसरे सीज़न में न केवल इन सभी कसौटियों पर पूरी तरह खरा उतरता है, बल्कि न्यूज़रूम की कड़वी सच्चाई और अफरा-तफरी को इतने शानदार ढंग से पेश करता है कि आप हँसते-हँसते लोटपोट हो जाते हैं।
‘टोलेडो ट्रुथ टेलर’ का संघर्ष और शो का नया आत्मविश्वास
‘द पेपर’ सीज़न 2 एक बार फिर दर्शकों को संघर्षरत स्थानीय अख़बार ‘टोलेडो ट्रुथ टेलर’ (TTT) की अतरंगी दुनिया में ले जाता है। यहाँ एक स्थानीय अख़बार को डिजिटल दौर में ज़िंदा रखना उतना ही मुश्किल काम है जितना कि न्यूज़रूम में बैठे पत्रकारों को इस बात पर सहमत करना कि अगली ‘लीड स्टोरी’ क्या होनी चाहिए।
जहाँ इसका पहला सीज़न खुद को साबित करने की कोशिश कर रहे एक स्पिन-ऑफ जैसा लगता था, वहीं दूसरा सीज़न पूरी तरह आत्मविश्वास से लबरेज़ है। शो अब ‘द ऑफिस’ की तुलनात्मक छाया से बाहर निकलकर अपनी एक अलग पहचान बना चुका है।
आधुनिक पत्रकारिता का सटीक और तीखा व्यंग्य
शो का यह नया आत्मविश्वास इसके लेखन और परिस्थितियों में साफ झलकता है। ‘द पेपर’ तब सबसे ज़्यादा मज़ेदार और असरदार बन जाता है जब यह आधुनिक मीडिया की उन छोटी-मोटी शर्मिंदगी वाली स्थितियों पर प्रहार करता है जिन्हें हम रोज़ देखते हैं:
विज्ञापनों की विडंबना: अख़बार की सफलता और निष्पक्षता का जश्न मनाने के लिए लगाया गया एक बड़ा बिलबोर्ड लोगों को उल्टे यह याद दिला देता है कि उन्हें अपना सब्सक्रिप्शन क्यों रद्द कर देना चाहिए।
शोक-संदेश (Obituary) का ड्रामा: एक साधारण सा शोक-संदेश अचानक एक अप्रत्याशित और विवादित मोड़ ले लेता है।
पुश नोटिफिकेशन का सिरदर्द: मोबाइल ऐप पर जाने वाला एक मामूली सा ‘पुश नोटिफिकेशन’ पूरे न्यूज़रूम के लिए एक बड़ा बखेड़ा खड़ा कर देता है।
यह शो पत्रकारों को कोई महान देशभक्त या लोकतंत्र को बचाने वाले ‘सुपरहीरो’ के रूप में नहीं दिखाता। इसके बजाय, ये वे आम लोग हैं जो हर दिन क्लिक्स, सब्सक्रिप्शन, गिरते सर्कुलेशन, डेडलाइन के तनाव और कॉर्पोरेट फैसलों के बीच झूलते हुए भी कुछ ऐसा लिखने की कोशिश कर रहे हैं जो पढ़ने लायक हो।
दमदार अभिनय: डॉमनाल ग्लीसन और स्टार कास्ट का जादू
अभिनेता डॉमनाल ग्लीसन TTT के एडिटर नेड सैम्पसन के रूप में इस पूरी अफरा-तफरी के केंद्र बने हुए हैं। नेड के किरदार में एक ऐसा अटूट आशावाद है जो आमतौर पर चिड़चिड़ापन पैदा कर सकता है, लेकिन ग्लीसन के अभिनय की सादगी इसे बेहद आकर्षक और प्यारा बना देती है। उन्हें दिल से विश्वास है कि डूबते अख़बार को बचाया जा सकता है।
वहीं, कलाकारों की सपोर्टिंग टीम इस सीज़न की सबसे बड़ी ताकत साबित होती है:
सबरीना इम्पैचियाटोर (एस्मेराल्डा ग्रैंड): सबरीना का अभिनय इस सीज़न की सबसे बड़ी उपलब्धि है। उनकी लाउड, लाउड-एंड-क्लियर और फिजिकल कॉमेडी शो को एक अलग ही ऊँचाई पर ले जाती है। क्रेट और अजीब भेष वाले उनके सीन्स बेतुके होने के बावजूद ज़बरदस्त ठहाके लगाने पर मजबूर करते हैं।
लिसा गिलरॉय: एक अजीब सी असहज ऊर्जा वाली HR ऑफिसर के रूप में लिसा गिलरॉय की एंट्री ताज़गी लाती है, जो निजी जानकारियाँ शेयर करने में कोई सीमा नहीं मानतीं।
चेल्सी फ्रे (मेयर): नेड और मेयर के बीच की केमिस्ट्री और पिछले सीज़न के चुंबन (Kiss) के बाद का ड्रामा सीज़न में रोमांटिक तड़का लगाता है। एक ‘टोरनेडो’ (बवंडर) वाले सीन में फिजिकल कॉमेडी को रोमांटिक पल में बदलते देखना काफ़ी असरदार है।इसे भी पढ़ें: Mookuthi Amman 2 का धमाकेदार टीज़र रिलीज़: Nayanthara ने फिर धारण किया ‘महाशक्ति’ का अवतार, दिवाली पर होगी रिलीज़
हास्य के पीछे छिपा एक दर्दनाक सच
तमाम मज़ाकों, बेतुकी हरकतों और कॉर्पोरेट राजनीति के बीच यह शो अपने भावनात्मक पहलू को कभी नहीं खोता। सभी चुटकुलों के पीछे एक दर्दनाक और प्रासंगिक सवाल छिपा है: उन पत्रकारों और कर्मचारियों का क्या होता है जो अपने काम की ईमानदारी से परवाह करते हैं, जबकि पूरी दुनिया और उनके कॉर्पोरेट मालिक उस संस्थान की परवाह करना छोड़ चुके हैं?
शो किसी भी स्तर पर भावुक या उपदेशात्मक नहीं बनता। यह संघर्षरत अख़बार की बेइज्जती और लाचारी में भी हास्य ढूँढ लेता है। यही वजह है कि इसके भावनात्मक पल बहुत स्वाभाविक और सीधे दिल को छूने वाले लगते हैं।
निष्कर्ष: क्या आपको यह देखना चाहिए?
‘द पेपर’ सीज़न 2 साबित करता है कि बेहतरीन ‘वर्कप्लेस कॉमेडी’ असल में दफ्तर की दीवारों के बारे में नहीं, बल्कि वहाँ काम करने वाले हाड़-मांस के इंसानों के बारे में होती है। यद्यपि इसमें एक साथ कई ट्रैक (रोमांस, न्यूज़रूम की राजनीति, व्यक्तिगत राज़) चलाने के चक्कर में कभी-कभी बिखराव महसूस होता है, फिर भी यह शो अपनी ज़बरदस्त कॉमिक टाइमिंग और शानदार राइटिंग के दम पर दर्शकों को बाँधे रखता है।इसे भी पढ़ें: ‘यह श्री राम का वर्णन नहीं, भक्त का भाव है’, Dr. Kumar Vishwas ने बताया कैसे लिखे Ramayana के ‘जय जय राम’ गीत के बोल
यदि आप ‘द ऑफिस’ शैली की मॉक्यूमेंट्री कॉमेडी, तीखे व्यंग्य और बेहतरीन अभिनय के शौकीन हैं, तो ‘द पेपर’ सीज़न 2 आपके लिए एक परफेक्ट बिंज-वॉच है। इसके सभी 10 एपिसोड अब JioHotstar पर देखने के लिए उपलब्ध हैं।

