Tarique Rahman Delhi Visit: तारीक रहमान का दिल्ली दौरा टला, फिर चीन और पाकिस्तान की तरफ क्यों बढ़ा बांग्लादेश?

Tarique Rahman Delhi Visit: तारीक रहमान का दिल्ली दौरा टला, फिर चीन और पाकिस्तान की तरफ क्यों बढ़ा बांग्लादेश?

Bangladesh India Relations: बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारीक रहमान की प्रस्तावित दिल्ली यात्रा टलना महज एक कूटनीतिक कार्यक्रम का स्थगन नहीं माना जा रहा। इसके पीछे ढाका की बदलती रणनीतिक सोच, चीन की बढ़ती भूमिका और भारत को लेकर पैदा हो रही आशंकाओं की बड़ी तस्वीर दिखाई देती है। जिस भारत के साथ बांग्लादेश का भूगोल, कारोबार, ऊर्जा और सुरक्षा सीधे जुड़ी है, उसी से दूरी बनाने के संकेत अब नई बहस छेड़ रहे हैं। सवाल यह है कि आखिर ढाका किस दिशा में बढ़ रहा है?

टली दिल्ली यात्रा ने खोल दी रिश्तों की नई परत

तारीक रहमान की 23 अगस्त से प्रस्तावित तीन दिवसीय दिल्ली यात्रा को स्थगित किया जाना ऐसे समय हुआ है, जब भारत और बांग्लादेश के संबंध पहले ही कई संवेदनशील सवालों से गुजर रहे हैं। यात्रा का टलना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि दोनों देशों के बीच संवाद की जरूरत पहले से कहीं ज्यादा है।

ढाका की ओर से हाल के दिनों में आए कुछ बयानों ने भी नई दिल्ली की चिंताएं बढ़ाई हैं। एक ओर भारत से पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के प्रत्यर्पण की मांग सामने आई, तो दूसरी तरफ बांग्लादेश के कुछ नेताओं ने सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये के रक्षा समझौते से जुड़े संभावित नए समीकरणों की चर्चा शुरू कर दी।

यानी जिस समय दोनों पड़ोसियों को आर्थिक और सुरक्षा सहयोग को मजबूत करना चाहिए था, उसी समय रिश्तों में रणनीतिक अविश्वास की परत मोटी होती दिखाई दे रही है।

बीजिंग की ओर पहले कदम, दिल्ली से पहले चीन क्यों?

तारीक रहमान का दिल्ली से पहले चीन दौरा भी इस पूरे घटनाक्रम का अहम हिस्सा है। रिपोर्टों के मुताबिक, बांग्लादेश ने चीन से तीस्ता नदी परियोजना में भूमिका निभाने और म्यांमार के रास्ते युन्नान से बांग्लादेश तक सड़क संपर्क की संभावनाओं पर चर्चा की।

चीन के साथ आर्थिक और बुनियादी ढांचे का सहयोग बांग्लादेश के लिए नया नहीं है। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब ऐसे प्रस्तावों का इस्तेमाल भारत के साथ रणनीतिक संतुलन बदलने के संकेत के तौर पर देखा जाने लगे।

म्यांमार के रास्ते प्रस्तावित संपर्क को लेकर जमीनी चुनौतियां भी कम नहीं हैं। म्यांमार के कई इलाके सशस्त्र संगठनों के प्रभाव में हैं, जिससे किसी बड़े अंतरराष्ट्रीय कॉरिडोर को व्यवहार में उतारना बेहद कठिन हो सकता है।

‘इस्लामिक NATO’ की चर्चा कितनी जमीन पर टिकती है?

बांग्लादेश में कुछ नेताओं की ओर से पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये के बीच बने रक्षा समझौते को लेकर दिलचस्पी दिखाई गई है। इसे एक व्यापक इस्लामिक सुरक्षा ढांचे की दिशा में कदम के तौर पर पेश करने की कोशिश भी हुई है। लेकिन बांग्लादेश की भौगोलिक और आर्थिक वास्तविकता इस रणनीति को मुश्किल बनाती है।

बांग्लादेश तीन तरफ से भारत से घिरा है और चौथी तरफ बंगाल की खाड़ी है। उसकी रोजमर्रा की अर्थव्यवस्था भारत के साथ व्यापारिक संपर्क से गहराई से जुड़ी है। ईंधन, खाद्य वस्तुओं और आवश्यक सामान की आपूर्ति में भारत की भूमिका भी महत्वपूर्ण है।

ऐसे में भारत को किनारे रखकर कोई नया सुरक्षा समीकरण खड़ा करना ढाका के लिए आसान नहीं होगा।

पाकिस्तान से दोस्ती, लेकिन सबक भी सामने

बांग्लादेश-पाकिस्तान रिश्तों में गर्माहट की कोशिशें नई दिल्ली के लिए स्वाभाविक रूप से चिंता का विषय बन सकती हैं। लेकिन दक्षिण एशिया की सुरक्षा स्थिति को देखते हुए यह भी सवाल है कि इस तरह के रक्षा गठजोड़ संकट की घड़ी में कितने प्रभावी साबित होते हैं।

लाल सागर क्षेत्र में जहाजों पर हमलों से लेकर पश्चिम एशिया की लगातार बदलती सुरक्षा परिस्थितियों तक, हाल के वर्षों ने दिखाया है कि कागज पर बने रणनीतिक समझौते और वास्तविक सैन्य सहायता दो अलग चीजें हैं।

भारत के साथ दूरी बढ़ाने से पहले ढाका को यह भी देखना होगा कि उसके पास वास्तविक विकल्प कितने हैं और वे संकट के समय कितने भरोसेमंद साबित होंगे।

बांग्लादेश के सामने असली चुनौती घर के भीतर

भारत-विरोधी बयानबाजी से बांग्लादेश की आंतरिक समस्याएं खत्म नहीं होने वालीं। देश में कट्टरपंथी और राजनीतिक इस्लामी संगठनों की सक्रियता लंबे समय से चिंता का विषय रही है।

जमात-ए-इस्लामी और उससे जुड़े राजनीतिक-सामाजिक नेटवर्क के अलावा कुछ आतंकी संगठनों की गतिविधियां भी सुरक्षा एजेंसियों के लिए चुनौती बनी हुई हैं। कॉक्स बाजार और चटगांव जैसे संवेदनशील इलाकों की भौगोलिक स्थिति इस समस्या को और जटिल बनाती है।

BRICS भी बन सकता था बड़ा मौका

अगर बांग्लादेश BRICS जैसे बहुपक्षीय मंच पर सक्रिय भूमिका निभाता है, तो उसके सामने भारत, चीन और रूस समेत कई बड़े देशों के साथ एक ही मंच पर बातचीत करने का अवसर होता है।

ऐसे मंचों पर व्यापार, ऊर्जा, आतंकवाद विरोधी सहयोग, परिवहन और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी जैसे मुद्दों पर सीधे संवाद की गुंजाइश रहती है।

भारत की ओर से निमंत्रण के बावजूद तारीक रहमान की संभावित दूरी को इसलिए एक खोए हुए कूटनीतिक अवसर के रूप में देखा जा सकता है। पड़ोसी देशों के साथ संबंधों में दरवाजे बंद करने से ज्यादा फायदा उन्हें बातचीत के लिए खुला रखने में होता है।

अमेरिका-चीन की होड़ में ढाका कहां खड़ा है?

शेख हसीना के सत्ता से बाहर होने के बाद बांग्लादेश में पश्चिमी देशों और चीन दोनों की भूमिका पर चर्चा बढ़ी है। अंतरिम शासन के दौरान पश्चिम के साथ संपर्क बढ़ा, जबकि चीन ने भी आर्थिक और रणनीतिक प्रभाव को आगे बढ़ाने के अवसर तलाशे।

भारत की चिंता यह है कि बांग्लादेश किसी बड़ी शक्ति प्रतिस्पर्धा का मैदान न बन जाए।

दक्षिण एशिया में नेपाल, श्रीलंका और मालदीव के अनुभव भारत के लिए इस मामले में महत्वपूर्ण रहे हैं। आर्थिक संकट के समय भारत ने श्रीलंका की मदद की, मालदीव को पेयजल उपलब्ध कराया और महामारी के दौरान पड़ोसी देशों को वैक्सीन सहायता दी।

भारत का तर्क यही रहा है कि पड़ोसी देशों की स्थिरता उसके अपने हित में है।

अब नजर ‘चिकन नेक’ पर

भारत के लिए बांग्लादेश का महत्व सिर्फ पड़ोसी होने तक सीमित नहीं है। पूर्वोत्तर भारत को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ने वाला सिलिगुड़ी कॉरिडोर राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से बेहद संवेदनशील क्षेत्र है।

यह संकरा भूभाग अपने सबसे कम चौड़े हिस्से में करीब 21 किलोमीटर तक सीमित बताया जाता है। यही कारण है कि भारत इस क्षेत्र में सैन्य और बुनियादी ढांचे की सुरक्षा मजबूत करने पर लगातार जोर दे रहा है।

किशनगंज, चोपड़ा और धुबरी जैसे इलाकों में सुरक्षा ढांचे को मजबूत करने की योजनाओं के साथ हाशिमारा एयर बेस और पूर्वी कमान की सैन्य क्षमताएं भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

रेल और सड़क के भूमिगत नेटवर्क तथा सुरंग आधारित सैन्य भंडारण जैसी तैयारियां भविष्य में इस क्षेत्र की रणनीतिक मजबूती बढ़ा सकती हैं।

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