शिमला ज़िले के स्कूलों के सोशल ऑडिट से इंफ्रास्ट्रक्चर, बुनियादी सुविधाओं, छात्रों की सुरक्षा, बच्चों की सुरक्षा और एकेडमिक मॉनिटरिंग में बड़ी कमियों का पता चला है। इससे ‘शिक्षा का अधिकार’ (RTE) के नियमों के पालन को लेकर चिंताएँ पैदा हो गई हैं। इस ऑडिट में ‘समग्र शिक्षा अभियान’ (SSA) के तहत 444 स्कूलों की जाँच की गई, जो ज़िले के कुल 2,068 स्कूलों का लगभग 20 प्रतिशत हैं। इसमें कई तरह की समस्याएँ सामने आईं, जैसे कि अपर्याप्त क्लासरूम, फर्नीचर की कमी, पीने के पानी का अभाव, खराब साफ़-सफ़ाई, सड़क संपर्क की सीमित सुविधा और सुरक्षा के अपर्याप्त उपाय।
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इन नतीजों को थियोग में एक जन-सुनवाई के दौरान पेश किया गया। इस सुनवाई में 2,100 से ज़्यादा लोग शामिल हुए, जिनमें माता-पिता, शिक्षक, स्कूल मैनेजमेंट कमिटी के सदस्य, चुने हुए प्रतिनिधि, शिक्षा अधिकारी और स्थानीय समुदाय के लोग शामिल थे। हिमाचल प्रदेश के शिक्षा मंत्री रोहित ठाकुर ने भी इस सुनवाई में हिस्सा लिया और कई शिकायतों का मौके पर ही समाधान किया। ठाकुर ने ऑडिट के नतीजों को स्वीकार करते हुए कहा: “शिक्षा के क्षेत्र में हमारे राज्य ने कई उपलब्धियां हासिल की हैं और देश में कुल प्रदर्शन के मामले में हम पांचवें स्थान पर हैं, लेकिन हमारे यहां कई कमियां भी हैं, जिनकी ओर इस सोशल ऑडिट रिपोर्ट में इशारा किया गया है। आने वाले समय में हम इन सभी कमियों और खामियों को दूर करेंगे।”
इस ऑडिट का नेतृत्व हिमाचल प्रदेश यूनिवर्सिटी की एक टीम ने किया, जिसके प्रमुख अर्पणा नेगी और रणधीर रांटा थे। योजना के अनुसार, बाकी बचे स्कूलों को अगले चार चरणों में कवर किया जाएगा। रांटा ने कहा कि रिपोर्ट उन सिस्टम से जुड़ी चुनौतियों को सामने लाती है जो शिक्षा की गुणवत्ता को कम कर रही हैं: “शिमला के स्कूलों का प्रदर्शन ‘शिक्षा का अधिकार अधिनियम’ (Right to Education Act) के तहत तय किए गए गुणवत्ता मानकों पर खरा नहीं उतरता है।”
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मुख्य नतीजों में यह बात सामने आई कि 47 प्रतिशत स्कूलों में क्लासरूम के लिए पर्याप्त जगह नहीं थी और 78 प्रतिशत स्कूलों में सही फर्नीचर की कमी थी, जिसके कारण कई छात्रों को बिना सही बैठने की जगह के पढ़ाई करनी पड़ती थी। खास बात यह है कि सर्वे किए गए 81 प्रतिशत स्कूलों में पीने के साफ़ पानी की सुविधा नहीं थी, जिससे छात्रों की सेहत और साफ़-सफ़ाई को लेकर चिंता पैदा होती है। छात्रों की सुरक्षा एक अहम चिंता का विषय थी; 43 प्रतिशत स्कूलों में बाउंड्री वॉल या फेंसिंग नहीं थी, जिससे सुरक्षा का खतरा बना रहता है। इसके अलावा, लगभग 79 प्रतिशत स्कूल ऐसी जगहों पर थे जहाँ तक गाड़ी से नहीं पहुँचा जा सकता था, जिससे छात्रों, खासकर दिव्यांग छात्रों के लिए आना-जाना मुश्किल हो जाता था। ऑडिट में समावेशी शिक्षा के लक्ष्यों के साथ-साथ पहुँच (accessibility) की समस्या को हल करने की ज़रूरत पर भी ज़ोर दिया गया।

