बंगाल में बदले सियासी समीकरण, खंडवा के नवरात्र पर भी दिखा असर, कम बनीं दुर्गा प्रतिमाएं

बंगाल में बदले सियासी समीकरण, खंडवा के नवरात्र पर भी दिखा असर, कम बनीं दुर्गा प्रतिमाएं

बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद वहां के कलाकारों को कोलकाता में ही प्रतिमा निर्माण के काम मिलने का असर अब खंडवा के नवरात्र उत्सव पर भी दिखाई देने लगा है। हर साल नवरात्र के लिए खंडवा आने वाले बंगाली कलाकारों की संख्या इस बार घट गई है। इसका असर मिट्टी से बनने वाली पर्यावरण अनुकूल माता की प्रतिमाओं के निर्माण पर पड़ा है।

एक दर्जन कलाकार आते थे खंडवा

बंगाली कलाकार कीना पाल ने बताया कि वे हर साल मई माह में ही खंडवा आ जाते हैं। यहां गणेश प्रतिमाओं के साथ ही माता की प्रतिमाओं का निर्माण भी शुरू कर दिया जाता है। पहले उनके साथ करीब 12 कलाकार खंडवा आते थे, लेकिन इस बार कुछ कलाकारों को कोलकाता में ही प्रतिमा निर्माण का काम मिल गया। इसके चलते वे खंडवा नहीं आ सके। कलाकारों की संख्या कम होने से प्रतिमाओं के निर्माण में भी गिरावट आई है। पहले जहां ढाई सौ प्रतिमाएं बनाई जाती थीं, इस बार महज 80 प्रतिमाएं ही तैयार हो पाई हैं।

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गंगा की मिट्टी और प्राकृतिक रंगों से बनती हैं प्रतिमाएं

बंगाली कलाकारों की विशेषता मिट्टी से पर्यावरण अनुकूल प्रतिमाओं का निर्माण करना है। इन प्रतिमाओं में प्राकृतिक रंगों का उपयोग किया जाता है। प्रतिमा निर्माण के लिए कलाकार कोलकाता से विशेष मिट्टी और अन्य जरूरी सामग्री लेकर आते हैं। मृत्युंजय पाल के अनुसार, प्रतिमाओं के निर्माण में गंगा की मिट्टी के साथ मां नर्मदा की माटी और चावल की घास सहित अन्य सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है। इनसे तैयार प्रतिमाएं पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं।

एक लाख रुपए तक पहुंचा महीने का खर्च

बंगाली कलाकार मृत्युंजय पाल ने बताया कि वे करीब 30 साल से खंडवा आकर प्रतिमा निर्माण कर रहे हैं। पहले यहां रहने और प्रतिमा निर्माण से जुड़ी व्यवस्थाओं पर करीब 70 हजार रुपए प्रतिमाह खर्च होते थे, लेकिन इस साल यह खर्च बढकऱ एक लाख रुपए तक पहुंच गया है। इसके अलावा प्रतिमा निर्माण में उपयोग होने वाली सामग्री भी महंगी हो गई है। बढ़ती लागत के चलते प्रतिमाओं की कीमतों में भी इजाफा करना पड़ा है। कलाकारों के सामने बढ़ते खर्च और सीमित मांग के बीच प्रतिमा निर्माण करना चुनौती बन गया है।

खंडवा के साथ आसपास के क्षेत्रों में भी मांग

बंगाली कलाकारों द्वारा बनाई गई मिट्टी की प्रतिमाएं केवल खंडवा शहर तक सीमित नहीं हैं। इनकी मांग बुरहानपुर, धारणी, डेढ़तलाई, हरसूद, पंधाना सहित आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में भी रहती है। हर साल बड़ी संख्या में प्रतिमाएं तैयार कर इन क्षेत्रों में भेजी जाती हैं। हालांकि, इस बार कलाकारों की कमी और बढ़ती लागत के चलते निर्माण सीमित रहा। ऐसे में बंगाली कलाकारों ने इस बार केवल पहले से बुक की गई प्रतिमाओं का ही निर्माण किया है।

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