दिल्ली हाई कोर्ट ने प्रॉपर्टी से जुड़े एक विवाद की सुनवाई के दौरान अपने ही एक न्यायिक आदेश में छेड़छाड़ का मामला सामने आने पर इस ओर ध्यान दिलाया है और आदेश दिया है कि सक्षम अधिकारी इस मामले की जांच करें। यह आदेश 18 सितंबर को जस्टिस पुरुषेंद्र कुमार कौरव ने मीना देवी और एक अन्य याचिकाकर्ता की याचिका पर दिया था। याचिकाकर्ताओं ने दिल्ली के खेड़ा खुर्द गांव के विस्तारित लाल डोरा इलाके में 175 वर्ग गज ज़मीन के प्लॉट से जुड़े धोखाधड़ी और जालसाजी के आरोपों पर पुलिस की कार्रवाई न करने की शिकायत की थी। कोर्ट के आदेश के अनुसार, याचिकाकर्ताओं ने पहले ही 7 सितंबर, 2026 को दिल्ली पुलिस मुख्यालय में पुलिस कमिश्नर को एक विस्तृत शिकायत सौंपी थी। बहस के दौरान, उनके वकील ने RSA 101/2024 में 19 नवंबर, 2024 को पारित हाई कोर्ट के आदेश के तौर पर पेश किए गए दस्तावेज़ का हवाला दिया।
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जब कोर्ट ने इसे अपने रिकॉर्ड से मिलाया, तो उसे उस तारीख को असल में जारी किए गए आदेश और उसके सामने पेश की गई कॉपी के बीच अंतर मिला। असली आदेश में बस यह लिखा था कि प्रतिवादियों के वकील ने निर्देश लेने के लिए समय मांगा था, मामले को 14 जनवरी, 2025 के लिए लिस्ट किया गया था, और ट्रायल कोर्ट के रिकॉर्ड मंगाने के लिए कहा गया था। हालांकि, कोर्ट के सामने पेश किए गए दस्तावेज़ में एक अतिरिक्त लाइन थी जो ओरिजिनल में नहीं थी – एक चौथा पैराग्राफ जिसमें लिखा था “अंतरिम रोक (स्टे) मंजूर। दोनों वर्ज़न की तुलना करने पर, बेंच ने कहा कि ऐसा लगता है कि किसी अज्ञात व्यक्ति ने यह अतिरिक्त लाइन जोड़कर कोर्ट का आदेश बनावटी रूप से तैयार किया था। कोर्ट ने माना कि मामले में औपचारिक जांच और उचित आगे की कार्रवाई की ज़रूरत है।
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इसके अनुसार, याचिकाकर्ताओं को दिल्ली हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल के सामने एक विस्तृत आवेदन (रिप्रेजेंटेशन) दाखिल करने की छूट दी गई, जिसमें तुलना के लिए आदेश के दोनों वर्ज़न शामिल हों। कोर्ट ने निर्देश दिया कि ऐसी कोई भी शिकायत दाखिल होने के बाद, उसे उसके तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाया जाए।

