विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने जब कहा कि अमेरिका खुद को एक ‘अकेली शक्ति” बना रहा है, तब शायद बहुत लोगों ने इसे सिर्फ कूटनीतिक टिप्पणी माना था। लेकिन अब पाकिस्तान के साथ अमेरिकी रक्षा कंपनी का नया सैन्य समझौता इस बात को सही साबित करता दिख रहा है। हम आपको बता दें कि जिस पाकिस्तान से अमेरिका लंबे समय से सैन्य दूरी बनाए हुए था, उसी के साथ उसका रक्षा सहयोग फिर से बढ़ रहा है। दरअसल, पावरस नाम की फ्लोरिडा स्थित रक्षा कंपनी ने पाकिस्तान के रक्षा मंत्रालय से मानवरहित हवाई प्रणालियों यानि ड्रोन्स की सीमित खरीद का आदेश हासिल किया है। इसके साथ ही दोनों पक्षों ने मानवरहित और स्वायत्त सैन्य प्रणालियों में भविष्य के व्यापक सहयोग का रास्ता खोलने वाला समझौता ज्ञापन भी किया है। कंपनी के अध्यक्ष और सह-संस्थापक ब्रेट वेलिकोविच सितंबर में पाकिस्तान गए थे। कंपनी का कहना है कि शुरुआती आदेश सीमित है, लेकिन आगे अमेरिकी और पाकिस्तानी तकनीक को जोड़कर पाकिस्तान में ही उत्पादन की संभावना तलाशने की महत्वाकांक्षा है।
यहीं से यह सौदा साधारण कारोबारी समझौते की सीमा तोड़ देता है। पावरस कंपनी की खासियत यह है कि वह यूक्रेन के युद्ध से विकसित अत्याधुनिक रक्षा तकनीक से जुड़ चुकी है। मार्च में इस कंपनी ने अमेरिकी जी-वन एक्सप्लोरेशन के साथ साझेदारी कर यूक्रेनी स्वायत्त रक्षा प्रणालियों के व्यावसायीकरण की शुरुआत की थी। इसी साझेदारी से ‘गार्डियन’ श्रृंखला की प्रतिड्रोन प्रणालियां सामने आई हैं, जिन्हें यूक्रेन में रूस के खिलाफ युद्ध से मिले वास्तविक युद्धक्षेत्र अनुभव और तकनीकी क्षमता के आधार पर विकसित किया गया है।
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अब तस्वीर साफ है। रूस के खिलाफ यूक्रेन में आजमाई गई युद्ध तकनीक अगर अमेरिकी कंपनी के रास्ते पाकिस्तान तक पहुंचती है, तो भारत के लिए इससे बड़ा सामरिक खतरा और क्या हो सकता है? यह इसलिए भी चिंताजनक है क्योंकि पावरस पहले से भारतीय रक्षा क्षेत्र में मौजूद है। उसकी सहायक कंपनी टैंडम डिफेंस ने मुंबई स्थित पारस डिफेंस एंड स्पेस टेक्नोलॉजीज को ‘गार्डियन-1’ प्रतिड्रोन प्रणाली के भारत में निर्माण और व्यावसायीकरण का विशेष लाइसेंस दिया है। यानी एक ही अमेरिकी कंपनी भारत और पाकिस्तान दोनों के साथ रक्षा सहयोग कर रही है। यह स्थिति सामान्य परिस्थितियों में भी असामान्य है, लेकिन मई 2025 में भारत-पाकिस्तान के बीच हुए संघर्ष के बाद इसका महत्व कई गुना बढ़ जाता है, क्योंकि उस संघर्ष में ड्रोन युद्ध का महत्वपूर्ण हथियार बन चुके थे।
हम आपको बता दें कि भारत ने अमेरिका के साथ पिछले वर्षों में जिस गहरे रणनीतिक संबंध को विकसित किया है, उसके बीच पाकिस्तान को उन्नत मानवरहित, प्रतिड्रोन, निगरानी और संचार तकनीक मिलना नई दिल्ली के लिए असहज करने वाला घटनाक्रम है। खासकर तब, जब इन तकनीकों ने यूक्रेन युद्ध में यह साबित कर दिया है कि आधुनिक युद्ध केवल लड़ाकू विमानों और मिसाइलों से नहीं जीता जाता। जिसके पास बेहतर ड्रोन, बेहतर प्रतिड्रोन, बेहतर निगरानी, सुरक्षित संचार और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध की क्षमता होगी, वही युद्धक्षेत्र की आंख और कान नियंत्रित करेगा।
देखा जाये तो अमेरिका-पाकिस्तान समीकरण में बदलाव के संकेत पहले भी मिल चुके हैं। ट्रंप प्रशासन ने दिसंबर में पाकिस्तान के पुराने एफ-16 विमानों के आधुनिकीकरण के लिए करीब 68.6 करोड़ डॉलर के पैकेज को मंजूरी दी थी। इसमें सामरिक संपर्क प्रणालियां, कूटबद्ध संचार उपकरण, विमानिकी, प्रशिक्षण और रसद सहायता शामिल थी। अमेरिकी तर्क था कि इससे पाकिस्तान की अमेरिकी तथा सहयोगी सेनाओं के साथ अंतर-संचालन क्षमता और आतंकवाद विरोधी अभियानों को मजबूती मिलेगी। लेकिन रणनीतिक नजरिए से सवाल यह है कि क्या यह केवल पुराने हथियारों के रखरखाव तक सीमित रहेगा?
यदि एफ-16 आधुनिकीकरण के साथ पाकिस्तान को ड्रोन, प्रतिड्रोन, स्वायत्त प्रणालियां, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध और उन्नत संचार तकनीक भी मिलती है, तो पाकिस्तान की सैन्य क्षमता का स्वरूप बदल सकता है। चीन से मिलने वाली भारी सैन्य सहायता, तुर्किये की ड्रोन तकनीक और अब संभावित अमेरिकी तकनीकी सहयोग, इन तीनों को जोड़कर पाकिस्तान एक बहु-स्रोत सैन्य क्षमता विकसित कर सकता है। दिलचस्प बात यह भी है कि पाकिस्तान स्वयं चीन और तुर्किये से बड़ी मात्रा में रक्षा सामग्री लेता है। ऐसे में अमेरिकी कंपनी के साथ नया समझौता उसके लिए आपूर्तिकर्ताओं में विविधता लाने का प्रयास भी हो सकता है। लेकिन पाकिस्तान में इस सौदे को लेकर विरोधाभास भी हैं। पावरस के इजरायली संबंधों और उसके एक सह-संस्थापक के पूर्व इजरायली सेना अधिकारी होने की रिपोर्टों ने वहां सवाल खड़े किए हैं। इसके बावजूद पाकिस्तान का आगे बढ़ना बताता है कि इस समय उसके लिए अमेरिकी सैन्य तकनीक हासिल करने का रणनीतिक महत्व इन असहजताओं से बड़ा हो सकता है।
पावरस के अमेरिकी राजनीतिक संपर्क भी इस कहानी को और संवेदनशील बनाते हैं। कंपनी के उस अमेरिकी कारोबारी ढांचे से जुड़े होने की रिपोर्टें हैं, जिसमें डोनाल्ड ट्रंप जूनियर और एरिक ट्रंप के निवेश संबंध बताए जाते हैं। ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि आने वाले समय में यह समझौता केवल सीमित व्यावसायिक आदेश रहता है या अमेरिकी-पाकिस्तानी रक्षा संबंधों का व्यापक माध्यम बनता है। यहीं जयशंकर का बयान फिर सामने आता है।
जयशंकर ने कहा था कि दुनिया में अमेरिका का रुख तेजी से बदल रहा है और चीन का प्रभाव बढ़ रहा है। उन्होंने यह भी याद दिलाया था कि जब दुनिया का बड़ा हिस्सा भारत के पड़ोसी सैन्य शासन वाले देश पाकिस्तान के साथ खड़ा होना पसंद करता था, तब रूस भारत के साथ मजबूती से खड़ा था। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं कि अमेरिका ने भारत को छोड़ दिया है या पावरस का सौदा अपने आप में अमेरिका की पाकिस्तान नीति में पूर्ण बदलाव का प्रमाण है। लेकिन रणनीतिक दुनिया में खतरे हमेशा किसी बड़े हथियार सौदे से शुरू नहीं होते। कई बार बदलाव छोटे, निजी और कम चर्चित समझौतों के जरिए धीरे-धीरे आकार लेता है। पावरस का मामला ठीक वैसा ही संकेत हो सकता है। यहां यह सवाल भी उठता है कि क्या पावरस केवल एक नई अमेरिकी रक्षा कंपनी है, या वह अमेरिका-पाकिस्तान के उस सैन्य रिश्ते की वापसी का छोटा लेकिन खतरनाक दरवाजा है, जिसे पिछले दो दशकों में लगभग बंद माना जा रहा था? अगर दूसरा अनुमान सही साबित होता है, तो भारत को केवल कूटनीतिक आपत्ति जताने से काम नहीं चलेगा। उसे अपनी ड्रोन और प्रतिड्रोन क्षमता, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, अंतरिक्ष आधारित निगरानी, सुरक्षित संचार और स्वदेशी रक्षा उत्पादन को कई गुना तेज करना होगा।
बहरहाल, आधुनिक युद्ध में खतरा सीमा पर खड़े टैंक से पहले आसमान में उड़ते छोटे ड्रोन के रूप में आता है और जिस दिन दुश्मन के पास तकनीक, नेटवर्क और युद्धक्षेत्र की आंखें एक साथ आ गईं, उस दिन पारंपरिक सैन्य बढ़त का अर्थ ही बदल जाता है।

