देश की सबसे महत्वपूर्ण राष्ट्रीय परीक्षाओं में शामिल UGC-NET एक बार फिर गंभीर विवादों के केंद्र में है। अंग्रेजी, कॉमर्स और समाजशास्त्र विषयों की परीक्षाओं को रद्द कर दोबारा कराने के राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (NTA) के फैसले ने परीक्षा प्रश्नपत्र तैयार करने की पूरी प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर दिए हैं। विषय विशेषज्ञों और NTA से जुड़े सूत्रों का दावा है कि प्रश्नपत्रों की तैयारी और अनुवाद में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया गया, जबकि NTA ने विवादित प्रश्नपत्रों को तैयार करने में जनरेटिव AI के उपयोग से साफ इंकार किया है।
हम आपको बता दें कि विवाद की सबसे बड़ी वजह केवल प्रश्नपत्रों में सामने आई त्रुटियां नहीं हैं, बल्कि इन परीक्षाओं को रद्द करने में हुई करीब छह सप्ताह की देरी भी है। सूत्रों के अनुसार, शिक्षा मंत्रालय परीक्षा रद्द कर जुलाई के अंत या अगस्त के पहले सप्ताह तक दोबारा परीक्षा कराने के पक्ष में था। इसके बावजूद NTA ने तत्काल कार्रवाई नहीं की और 87 में से 84 विषयों की प्रोविजनल आंसर-की जारी करने के समय ही तीन विषयों की परीक्षाएं रद्द करने की घोषणा की।
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विशेषज्ञों का कहना है कि UGC-NET प्रश्नपत्रों को तैयार करने के दौरान AI आधारित तकनीकों का व्यापक इस्तेमाल हुआ और मानवीय स्तर पर पर्याप्त अकादमिक समीक्षा नहीं की गई। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, NTA से हाल तक जुड़े रहे कुछ पूर्व विषय विशेषज्ञों ने यह भी दावा किया कि केवल UGC-NET ही नहीं, बल्कि NEET-UG के प्रश्नपत्रों के अनुवाद में भी AI का इस्तेमाल किया गया था। हालांकि, तकनीक का उपयोग अपने आप में गलतियों का प्रमाण नहीं है, लेकिन सवाल यह है कि क्या तकनीक से तैयार, अनुवादित या व्यवस्थित सामग्री को अंतिम रूप देने से पहले पर्याप्त विशेषज्ञ समीक्षा की गई थी?
दूसरी ओर, NTA के महानिदेशक अभिषेक सिंह ने विवादित प्रश्नपत्रों को तैयार करने में जनरेटिव AI के इस्तेमाल से इंकार किया है। उनका कहना है कि प्रश्नपत्र तैयार होने के बाद उनका “ह्यूमन रिव्यू” किया गया था। लेकिन जब उनसे पूछा गया कि इतनी गंभीर त्रुटियां इस मानवीय समीक्षा के बावजूद कैसे रह गईं, तो इस पर कोई स्पष्ट जवाब सामने नहीं आया।
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, शिक्षा मंत्रालय के एक वरिष्ठ सूत्र ने बताया कि NTA के दो वरिष्ठ अधिकारियों के साथ हुई बैठकों में यह कहा गया था कि प्रश्नपत्रों को “एड-हॉक तरीके” से डिजाइन किए जाने के कारण आंसर-की घोषित करने में समस्या आ रही है। लेकिन जब अधिकारियों से पूछा गया कि “एड-हॉक” से उनका क्या आशय है, तो कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया गया। इसी तरह यह सवाल भी अनुत्तरित रहा कि यदि विषय विशेषज्ञों द्वारा प्रश्नपत्रों की समीक्षा की गई थी, तो इतनी बड़ी गलतियां आखिर कैसे सामने आईं?
हम आपको बता दें कि समाजशास्त्र का प्रश्नपत्र सबसे ज्यादा आलोचना के घेरे में रहा। अभ्यर्थियों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध विद्वानों के नामों की गलत वर्तनी, तकनीकी शब्दावली के बिगड़े हुए अनुवाद और पाठ्यक्रम से मेल न खाने वाले प्रश्नों की शिकायत की। उम्मीदवारों के अनुसार, प्रसिद्ध समाजशास्त्री George Ritzer का नाम “Putzer”, Talcott Parsons का “Parsow” और G.S. Ghurye का “Ghunye” लिख दिया गया। दार्शनिक Martha Nussbaum के नाम को भी कथित तौर पर गलत रूप में प्रस्तुत किया गया। इन त्रुटियों ने प्रश्नपत्र की अकादमिक विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।
साथ ही अंग्रेजी विषय की परीक्षा में एक अलग तरह की समस्या सामने आई। अभ्यर्थियों का आरोप है कि 150 में से करीब 67 प्रश्न पहले की UGC-NET परीक्षा में आ चुके थे। कुछ उम्मीदवारों ने यह भी दावा किया कि कई प्रश्नों में उत्तर विकल्पों का क्रम तक पहले जैसा ही रखा गया था। वहीं कॉमर्स के अभ्यर्थियों ने टैक्सेशन, ब्रेक-ईवन एनालिसिस, कैपिटल स्ट्रक्चर और सर्विसेज मार्केटिंग से जुड़े कई प्रश्नों के दोहराव की शिकायत की है। हालांकि, इन प्रश्नों की पुनरावृत्ति आखिर किस स्तर पर और कैसे हुई, यह अब तक निर्णायक रूप से स्पष्ट नहीं हो सका है।
एक अन्य सूत्र ने पूरी प्रश्नपत्र निर्माण प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि चार से पांच विषय विशेषज्ञों के पैनल ने प्रश्नपत्र तैयार किया था, तो पिछले वर्ष के इतने अधिक प्रश्न दोबारा कैसे शामिल हो गए। इससे भी बड़ा सवाल यह है कि जिन परीक्षकों ने प्रश्न तैयार किए, उनके पास कुछ प्रश्नों के स्पष्ट उत्तर तक क्यों नहीं थे।
बहरहाल, UGC-NET केवल एक सामान्य परीक्षा नहीं है। यह देशभर के विश्वविद्यालयों में शिक्षण और शोध के क्षेत्र में पात्रता निर्धारित करने वाली महत्वपूर्ण परीक्षा है। ऐसे में प्रश्नपत्रों की गुणवत्ता, अनुवाद की शुद्धता, विशेषज्ञ समीक्षा और परीक्षा रद्द करने जैसे फैसलों में पारदर्शिता बेहद जरूरी है। AI के इस्तेमाल पर बहस से कहीं बड़ा सवाल अब परीक्षा प्रणाली की जवाबदेही का है। यह विवाद NTA के सामने केवल तीन परीक्षाएं दोबारा कराने की चुनौती नहीं, बल्कि लाखों अभ्यर्थियों का भरोसा दोबारा जीतने की परीक्षा भी बन गया है।

