आंखों की गंभीर बीमारियों, विशेषकर रेटिना और यूवेइटिस से जूझ रहे मरीजों के लिए राहत भरी खबर है। एलएलआर अस्पताल के नेत्र रोग विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. परवेज खान ने एक ऐसी आधुनिक तकनीक और खास नीडल (सुप्राकोरोइडल नीडल) के बारे में जानकारी साझा की है, जो आंखों के इलाज की दिशा में गेम-चेंजर साबित हो सकती है। इस नई तकनीक के जरिए अब दवा सीधे उस हिस्से तक पहुँचेगी जहाँ बीमारी है। क्यों मुश्किल था अब तक रेटिना का इलाज? डॉ. परवेज खान के मुताबिक, रेटिना और यूवेइटिस के इलाज में सबसे बड़ी चुनौती दवा को सही जगह पहुँचाना रही है। सामान्य तौर पर इस्तेमाल होने वाली आई ड्रॉप्स आंखों के पिछले हिस्से (रेटिना) तक नहीं पहुँच पातीं। वहीं, अगर मरीज को ओरल टैबलेट यानी खाने वाली दवा दी जाती है, तो वह खून के जरिए पूरे शरीर में फैल जाती है। इससे शरीर के अन्य अंगों पर बुरा असर (साइड इफेक्ट) होने का डर रहता है और आंख के प्रभावित हिस्से तक दवा बहुत ही कम मात्रा में पहुंच पाती है। सुप्राकोरोइडल नीडल,सीधे निशाने पर लगेगी दवा इस समस्या को दूर करने के लिए एक विशेष सुप्राकोरोइडल नीडल विकसित की गई है, जिसका पेटेंट भी हो चुका है। डॉक्टर खान ने बताया कि इसके एक और एडवांस वर्जन (दूसरी नीडल) के लिए भी पेटेंट फाइल किया जा रहा है। इस तकनीक की खासियत यह है कि इसके जरिए एंटीबायोटिक्स, एंटी-वीईजीएफ और स्टेरॉयड जैसे इंजेक्शन सीधे रेटिना के ऊतकों में लगाए जा सकते हैं। इसे ‘टारगेटेड ड्रग डिलीवरी’ कहा जाता है। इससे दवा का असर तुरंत होता है और मरीज को जल्दी आराम मिलता है। ओपीडी में हर तीसरा मरीज रेटिना का शिकार अस्पताल के आंकड़ों पर गौर करें तो आंखों की बीमारियों की गंभीरता का पता चलता है। डॉ. खान के अनुसार, उनकी ओपीडी में आने वाले कुल मरीजों में से लगभग एक-तिहाई (1/3) मरीज रेटिना की समस्याओं से ग्रसित होते हैं। उदाहरण के लिए, यदि दिन भर में 200 मरीज ओपीडी में आते हैं, तो उनमें से एक बड़ा हिस्सा इसी गंभीर बीमारी का शिकार होता है। ‘असाध्य’ बीमारियों की जगी उम्मीद
चिकित्सा विज्ञान की इस नई प्रगति से उन बीमारियों का इलाज भी संभव हो रहा है, जिन्हें अब तक ‘असाध्य’ या लाइलाज माना जाता था। सीधे प्रभावित टिशू तक दवा पहुँचने से गंभीर संक्रमण और सूजन को तेजी से कंट्रोल किया जा सकता है, जिससे मरीजों की आंखों की रोशनी बचाना अब पहले से कहीं अधिक आसान हो गया है।


