Netanyahu Rejects Gaza Peace Plan: ‘नहीं’ सुनने के आदी नहीं डोनाल्ड ट्रंप, नेतन्याहू के इनकार के बाद अब क्या होगा गाजा में?

Netanyahu Rejects Gaza Peace Plan: ‘नहीं’ सुनने के आदी नहीं डोनाल्ड ट्रंप, नेतन्याहू के इनकार के बाद अब क्या होगा गाजा में?

Donald Trump Gaza Peace Plan: गाजा में युद्ध रोकने की अमेरिकी कोशिश को इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने बड़ा झटका दिया है। अमेरिका समर्थित 15 सूत्री शांति प्रस्ताव को ठुकराते हुए नेतन्याहू ने साफ कर दिया है कि हमास के पूरी तरह हथियार डालने तक इजरायली सेना गाजा से पीछे नहीं हटेगी। यह सिर्फ शांति योजना पर असहमति नहीं, बल्कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनके सबसे करीबी सहयोगी के बीच बढ़ते मतभेद का संकेत भी है। अब सवाल है ट्रंप इस खुली चुनौती का जवाब कैसे देंगे?

एक इनकार, जिसने बदल दिया पूरा समीकरण

अमेरिका और इजरायल के रिश्तों में मतभेद कोई नई बात नहीं है, लेकिन इस बार मामला सीधे ट्रंप की गाजा नीति से जुड़ा है। नेतन्याहू ने कैबिनेट बैठक में अमेरिकी समर्थन वाली 15 सूत्री योजना को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। उनका कहना है कि इजरायली सेना किसी भी तरह की वापसी तभी करेगी, जब हमास का वास्तविक और पूर्ण निरस्त्रीकरण हो जाए।

यानी प्रस्ताव में जिस क्रम की कल्पना की गई थी हमास का हथियार छोड़ना और उसके बाद इजरायल की चरणबद्ध सैन्य वापसी उसे लेकर दोनों पक्षों की प्राथमिकताएं फिलहाल अलग-अलग हैं।

ट्रंप के लिए क्यों बढ़ी मुश्किल?

यह घटनाक्रम ट्रंप के लिए इसलिए अहम है क्योंकि उन्होंने गाजा में शांति की दिशा में प्रगति को अपनी विदेश नीति की बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश किया है। जुलाई में उनके ‘बोर्ड ऑफ पीस’ से जुड़े प्रस्ताव में हमास के निरस्त्रीकरण के बदले इजरायली सेना की चरणबद्ध वापसी और आगे गाजा का प्रशासन एक स्वतंत्र फिलिस्तीनी निकाय को सौंपने की दिशा शामिल थी।

नेतन्याहू का मौजूदा रुख इस पूरी प्रक्रिया की सबसे अहम कड़ी को ही रोक देता है। अगर इजरायल वापसी के लिए पहले पूर्ण निरस्त्रीकरण की शर्त रखता है और हमास इसके लिए पहले इजरायली सैनिकों की वापसी चाहता है, तो बातचीत एक ऐसे गतिरोध में फंस सकती है जहां दोनों पक्ष एक-दूसरे के पहले कदम का इंतजार करते रहें।

क्या ट्रंप नेतन्याहू पर दबाव बनाएंगे?

यही इस विवाद का सबसे बड़ा सवाल है। ट्रंप सार्वजनिक रूप से यह संकेत देते रहे हैं कि इजरायल उनकी बात को गंभीरता से लेता है और गाजा समेत मध्य-पूर्व में उनकी कूटनीतिक पहल को आगे बढ़ाने में अमेरिकी प्रभाव निर्णायक है।

लेकिन नेतन्याहू का इतिहास बताता है कि वे अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ मतभेद होने पर भी अपनी सुरक्षा नीति से पीछे हटने में आसानी नहीं दिखाते। यही वजह है कि मौजूदा टकराव को केवल व्यक्तिगत मतभेद के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा।

ट्रंप के सामने अब दो रास्ते हैं। पहला, वे नेतन्याहू को मनाने और योजना में कुछ बदलाव करने की कोशिश करें। दूसरा, वे अमेरिकी दबाव को खुलकर इस्तेमाल करें और यह संदेश दें कि वॉशिंगटन की शांति पहल को सहयोगी देश भी अनिश्चितकाल तक नहीं रोक सकते।

इजरायल-अमेरिका रिश्तों पर भी पड़ सकता है असर

इस विवाद का असर सिर्फ गाजा तक सीमित रहने की संभावना नहीं है। इजरायल के प्रति अमेरिकी समर्थन लंबे समय से अमेरिकी राजनीति में एक महत्वपूर्ण मुद्दा रहा है। हालांकि डेमोक्रेटिक पार्टी के भीतर इजरायल को लेकर मतभेद और आलोचना बढ़ी है, रिपब्लिकन खेमे में इजरायल के लिए समर्थन अब भी अपेक्षाकृत मजबूत है।

ऐसे में अगर ट्रंप और नेतन्याहू के बीच सार्वजनिक टकराव बढ़ता है, तो यह अमेरिकी घरेलू राजनीति में भी चर्चा का विषय बन सकता है। ट्रंप को तय करना होगा कि वे अपने राजनीतिक आधार और अमेरिकी रणनीतिक हितों के बीच संतुलन कैसे साधते हैं।

हमास के सामने भी बड़ी चुनौती

दिलचस्प बात यह है कि प्रस्ताव को लेकर सिर्फ इजरायल ही पूरी तरह संतुष्ट नहीं है। हमास भी गाजा में अपने हथियार छोड़ने के सवाल पर गंभीर आपत्तियां रखता रहा है। अप्रैल में सामने आई रिपोर्टों के मुताबिक, हमास ने कहा था कि वह निरस्त्रीकरण पर चर्चा से पहले इजरायल से पहले चरण की अपनी प्रतिबद्धताएं पूरी करने की मांग कर रहा है, जिसमें सैनिकों की वापसी और मानवीय सहायता शामिल थी।

इससे साफ है कि शांति योजना की सबसे कठिन पहेली यही है हथियार पहले कौन छोड़े और सैन्य वापसी पहले कौन करे?

नेतन्याहू का सख्त रुख क्यों?

नेतन्याहू के लिए हमास का निरस्त्रीकरण केवल बातचीत की एक शर्त नहीं बल्कि इजरायल की सुरक्षा नीति का केंद्रीय मुद्दा है। उनका तर्क है कि अगर हमास के पास हथियार और सैन्य क्षमता बनी रहती है, तो इजरायल की सेना के पीछे हटने से भविष्य में फिर से हमले का खतरा पैदा हो सकता है।

इसीलिए वे किसी प्रतीकात्मक या अधूरे निरस्त्रीकरण को स्वीकार करने के बजाय पूर्ण निरस्त्रीकरण पर जोर दे रहे हैं। इजरायली पक्ष ने हाल में भी स्पष्ट किया है कि गाजा के पूरी तरह विसैन्यीकरण से पहले सैनिकों की वापसी उसके लिए स्वीकार्य नहीं है।

आगे क्या होगा? ट्रंप के अगले कदम पर नजर

अब सबसे ज्यादा निगाहें वॉशिंगटन पर हैं। अगर ट्रंप नेतन्याहू के रुख को स्वीकार करते हैं, तो अमेरिकी शांति योजना को जमीन पर लागू करने की प्रक्रिया लंबी खिंच सकती है। लेकिन अगर वे इजरायल पर दबाव बढ़ाते हैं, तो अमेरिका-इजरायल रिश्तों में असहजता खुलकर सामने आ सकती है।

फिलहाल दोनों देशों के बीच बातचीत जारी रहने की संभावना है और समझौते की कुछ शर्तों में बदलाव की गुंजाइश भी बनी हुई है। लेकिन एक बात साफ है गाजा की शांति योजना अब सिर्फ हमास और इजरायल के बीच बातचीत नहीं रही; यह ट्रंप की विदेश नीति और नेतन्याहू की राजनीतिक-सुरक्षा रणनीति के बीच भी शक्ति-परीक्षण बन चुकी है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *