Meta के नए नियम: रात 12 से सुबह 6 बजे तक बंद रहेंगे Kids Accounts, 2 घंटे की Daily Limit तय

Meta के नए नियम: रात 12 से सुबह 6 बजे तक बंद रहेंगे Kids Accounts, 2 घंटे की Daily Limit तय
सोशल मीडिया पर बच्चों और किशोरों की सुरक्षा को लेकर बहस के बीच मेटा ने अपने मंचों के इस्तेमाल के तरीके में बड़े बदलाव का प्रस्ताव रखा है। समझौते के तहत कंपनी नाबालिगों के खातों पर समय की पाबंदी, रात में ऐप बंद रखने और विद्यालय के समय सूचनाएं रोकने जैसे कदम उठाएगी। हालांकि, इन बदलावों की सफलता उम्र की सही पहचान पर काफी हद तक निर्भर करेगी।
मौजूद जानकारी के अनुसार, समझौते में मेटा ने ऐप इस्तेमाल के लिए रोजाना दो घंटे की डिफॉल्ट समय सीमा रखने का प्रस्ताव दिया है। इसके अलावा हर 15 मिनट में उपयोगकर्ताओं को कुछ समय रुककर सोचने और सोच-समझकर मंच का इस्तेमाल करने के लिए संदेश दिखाई देंगे। कंपनी जिन खातों को नाबालिगों का मानेगी, उनमें रात 12 बजे से सुबह 6 बजे तक मेटा के ऐप का इस्तेमाल अपने आप बंद रहेगा।
नाबालिगों के खातों पर सुबह 8 बजे से दोपहर 3 बजे तक सूचनाएं भी बंद रहेंगी। इस समय को सामान्य तौर पर विद्यालय का समय माना गया है। इसके अलावा किशोरों को अपनी पोस्ट या दूसरे लोगों की पोस्ट पर पसंद किए जाने की संख्या देखने की सुविधा भी डिफॉल्ट रूप से नहीं मिलेगी।
इन प्रस्तावित बदलावों को बच्चों की डिजिटल आदतों और सोशल मीडिया पर उनके व्यवहार को नियंत्रित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। लेकिन विशेषज्ञों के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि मेटा आखिर यह तय कैसे करेगा कि किसी खाते का इस्तेमाल बच्चा कर रहा है या कोई वयस्क।
डॉक्टर इंगबर ने कहा कि कागज पर ये बदलाव अच्छे दिखाई देते हैं, लेकिन इनका असर तभी होगा जब उम्र की पहचान करने वाली तकनीक सही, प्रभावी और निष्पक्ष तरीके से काम करे। उनके मुताबिक, मौजूदा तकनीकों में अब भी वयस्कों को नाबालिग और नाबालिगों को वयस्क समझ लेने की गुंजाइश बनी हुई है।
गौरतलब है कि उम्र की पहचान के लिए अब केवल उम्र पूछने वाले सामान्य सवालों पर निर्भरता नहीं रही है। कंपनियां चेहरे की तस्वीर, सरकारी पहचान पत्र और उपयोगकर्ता के व्यवहार जैसे तरीकों का इस्तेमाल कर रही हैं। हालांकि, हर तरीके के साथ गोपनीयता और गलत पहचान से जुड़े खतरे हैं। पहचान पत्र या चेहरे से जुड़ी जानकारी देने का मतलब है कि बच्चों और वयस्कों को संवेदनशील निजी जानकारी किसी दूसरी कंपनी के साथ साझा करनी पड़ सकती है।
इसको लेकर उपयोगकर्ताओं में अविश्वास भी सामने आया है। डिस्कॉर्ड को इस साल वैश्विक स्तर पर उम्र की पहचान की व्यवस्था लागू करने की कोशिश के बाद विरोध का सामना करना पड़ा और उसे अपनी योजना टालनी पड़ी थी।
हालांकि, कानून विशेषज्ञ फिलिप यानेला इस तकनीक को लेकर पूरी तरह निराश नहीं हैं। उनका मानना है कि पिछले कुछ वर्षों में उम्र की पहचान की तकनीक में काफी सुधार हुआ है। उनके मुताबिक, कंपनियां उम्र की पुष्टि करने के बाद निजी जानकारी को अपने पास रखे बिना भी काम कर सकती हैं। उदाहरण के लिए, पहचान संबंधी जानकारी हटाकर केवल यह संकेत रखा जा सकता है कि संबंधित उपयोगकर्ता एक निश्चित उम्र से कम है।
इसके बावजूद डॉक्टर इंगबर और दूसरे विशेषज्ञों का कहना है कि निजी जानकारी को सुरक्षित रखना ही एकमात्र चिंता नहीं है। पहचान पत्र या चेहरे की जैविक जानकारी को इंटरनेट पर भेजना भी जोखिम पैदा करता है। अगर बच्चों से जुड़ी ऐसी जानकारी चोरी होती है तो पहचान की चोरी का खतरा बढ़ सकता है। पासवर्ड बदला जा सकता है, लेकिन चेहरा या उंगलियों के निशान नहीं बदले जा सकते।
बता दें कि मेटा और अमेरिका के 52 राज्यों के महान्यायवादी इन दिशानिर्देशों को अंतिम रूप दे रहे हैं। समझौते के तहत मेटा को अगले 10 वर्षों तक इन नियमों का पालन करना होगा। कंपनी इसे कानूनी दबाव में किया गया समझौता बताने के बजाय बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा में अपनी नेतृत्वकारी भूमिका के प्रमाण के रूप में पेश कर रही है।
मेटा अब टिकटॉक और यूट्यूब से भी ऐसे ही बदलाव लागू करने की अपील कर रही है। दिलचस्प बात यह है कि समझौते के तहत मेटा को मिलने वाले भुगतान की करीब 30 प्रतिशत राशि इस बात से जुड़ी है कि टिकटॉक और यूट्यूब भी इन दिशानिर्देशों का पालन करते हैं या नहीं।
विशेषज्ञों की चिंताओं के बावजूद यह मामला सोशल मीडिया के बदलते तौर-तरीकों की ओर इशारा करता है। डॉक्टर इंगबर के मुताबिक, बड़े मंचों की बनावट ही लोगों के व्यवहार को प्रभावित करती है और अगर मंचों की संरचना बदली जाए तो बच्चों के लिए इंटरनेट के इस्तेमाल के नए मानक भी तैयार किए जा सकते हैं।

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