Ram Mandir Chadhawa Case: अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे से जुड़ी कथित अनियमितताओं के मामले में महिपाल सिंह का नाम लगातार चर्चा में रहा है। वह श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट में लेखा प्रभारी और सह कार्यालय प्रमुख की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। ट्रस्ट में काम करने से पहले भी उनका लंबे समय तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ाव रहा है। हालांकि, चढ़ावे में कथित गड़बड़ी और अन्य वित्तीय अनियमितताओं को लेकर महिपाल सिंह की ओर से लगाए गए आरोपों की अंतिम पुष्टि जांच और संबंधित दस्तावेजों के आधार पर ही हो सकती है।
9 साल की उम्र में संघ से जुड़े थे महिपाल सिंह
महिपाल सिंह का जन्म 1959 में राजस्थान के कोटा में हुआ। उनके मुताबिक, बचपन से ही वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संपर्क में आए और वर्ष 1968 में महज नौ साल की उम्र में बाल स्वयंसेवक के तौर पर संघ से जुड़ गए। इसके बाद कोटा में संघ की शाखाओं और विभिन्न गतिविधियों में उनकी सक्रियता बनी रही। समय के साथ उन्होंने संघ और विश्व हिंदू परिषद से जुड़े कई दायित्व भी संभाले।
बैंक में 39 साल की नौकरी, फिर राम मंदिर से जुड़े
महिपाल सिंह पढ़ाई में मेधावी रहे और करीब 21 साल की उम्र में उन्हें सहकारी बैंक में नौकरी मिल गई। उन्होंने 2019 तक बैंक में काम किया। इस दौरान कैशियर से लेकर क्षेत्रीय अधिकारी तक अलग-अलग पदों पर जिम्मेदारी निभाई। सेवानिवृत्ति के बाद वह दोबारा संघ के कामों में सक्रिय हुए। राम मंदिर निर्माण के लिए निधि समर्पण अभियान के दौरान उन्हें कोटा विभाग क्षेत्र की जिम्मेदारी भी दी गई थी। उनके पास जमा होने वाली राशि के लिए करीब 55 संग्रहकर्ताओं की व्यवस्था बताई गई है।
राम मंदिर ट्रस्ट में कैसे मिली जिम्मेदारी?
महिपाल सिंह के अनुसार, उन्हें श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट में एक विशेष काम के लिए अयोध्या बुलाया गया था। उस समय दान और निधि समर्पण से जुड़ी रसीदों को लेकर काम लंबित था। इसके बाद उन्हें ट्रस्ट में लेखा प्रभारी और सह कार्यालय प्रमुख की जिम्मेदारी दी गई। वह जनवरी 2021 से 2022 के मध्य तक ट्रस्ट के राम कचहरी कार्यालय से जुड़े रहे। उनके अनुसार, मार्च 2022 में उन्हें चढ़ावे की गणना से अलग कर दिया गया था।
चढ़ावे की व्यवस्था को लेकर उठाए सवाल
चढ़ावा चोरी प्रकरण सामने आने के बाद महिपाल सिंह ने ट्रस्ट की दान और चढ़ावा व्यवस्था को लेकर कई सवाल उठाए। उनका दावा है कि वर्ष 2021-22 की ऑडिट रिपोर्ट में कुछ आपत्तियां दर्ज थीं, जिनका ट्रस्ट की ओर से संतोषजनक निराकरण नहीं किया गया। उन्होंने चढ़ावे की गिनती में लगाए गए कर्मचारियों की नियुक्ति और उनके बैंकिंग अनुभव को लेकर भी सवाल उठाए। महिपाल सिंह का आरोप है कि कई कर्मचारियों के पास बैंकिंग से जुड़ा पर्याप्त अनुभव नहीं था।
सोना-चांदी की एंट्री को लेकर भी आरोप
महिपाल सिंह ने दान पेटियों से निकलने वाली बहुमूल्य धातुओं, खासकर सोने और चांदी, की रसीद और रिकॉर्ड में उचित प्रविष्टि नहीं होने का भी आरोप लगाया है। उन्होंने यह भी दावा किया कि चढ़ावे की गिनती के दौरान नोटों के बंडलों की संख्या और निकाली गई रकम को लेकर गड़बड़ी की जाती थी। ये सभी आरोप महिपाल सिंह के दावे हैं और इनकी स्वतंत्र पुष्टि जांच के निष्कर्षों से ही होगी।
मंदिर निर्माण लागत पर भी उठाया सवाल
महिपाल सिंह ने राम मंदिर निर्माण की लागत को लेकर भी सवाल उठाया। उनके अनुसार, शुरुआती अनुमान करीब 800 करोड़ रुपये का था, जबकि बाद में खर्च बढ़कर करीब 2,200 करोड़ रुपये तक पहुंचने की बात सामने आई। ऐसे में उनका कहना है कि मंदिर निर्माण और उससे जुड़े खर्चों की वित्तीय प्रक्रिया को भी पूरी पारदर्शिता के साथ देखा जाना चाहिए।
खुद को राजनीतिक प्रभाव से दूर बताते हैं
महिपाल सिंह का कहना है कि वह किसी राजनीतिक दल से प्रेरित होकर यह मुद्दा नहीं उठा रहे हैं। वह अपने वैचारिक जुड़ाव को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जोड़ते हैं। उन्होंने संघ के कोटा और उदयपुर कार्यालयों की जिम्मेदारी संभालने के साथ विश्व हिंदू परिषद में भी पद पर काम किया है। यही वजह है कि राम मंदिर चढ़ावा प्रकरण में उनके बयान को लेकर राजनीतिक और धार्मिक दोनों स्तरों पर चर्चा तेज हुई है। अब इस मामले में जांच एजेंसियों और अदालत के सामने आने वाली रिपोर्ट से यह स्पष्ट होगा कि उनके लगाए आरोपों में कितनी सच्चाई है और किन दावों की पुष्टि दस्तावेजों से होती है।

