भारत के 2004 के ऐतिहासिक पाकिस्तान दौरे से पहले वहां के तत्कालीन राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ कराची में टेस्ट मैच की मेजबानी चाहते थे और उन्होंने भारत से इसकी अनुमति भी मांगी थी लेकिन सुरक्षा कारणों से उन्हें मंजूरी नहीं मिली। पूर्व खुफिया एवं सुरक्षा अधिकारी यशोवर्धन आजाद ने अपनी हाल में प्रकाशित पुस्तक ‘पुलिसिंग द रिपब्लिक: एन इनसाइड व्यू ऑफ हाउ इंडिया फाइट्स करप्शन एंड क्राइम, एंड प्रोटेक्ट्स राइट्स’ में इस पूरे घटनाक्रम का खुलासा करते हुए लिखा है कि तत्कालीन उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने इस पूरे मामले में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हुए मुशर्रफ के अनुरोध को ठुकरा दिया था। आजाद उस तीन सदस्यीय सुरक्षा दल के प्रमुख थे, जिसने पाकिस्तान के सभी क्रिकेट स्थलों का सुरक्षा जायजा लिया था।दल ने दौरे की सिफारिश तो की, लेकिन कराची और पेशावर में टेस्ट मैच नहीं कराने की सलाह दी थी। सुरक्षा दल ने मुल्तान, रावलपिंडी और लाहौर को टेस्ट मैचों के लिए सुरक्षित माना था। रिपोर्ट सौंपने के कुछ समय बाद आजाद को ‘रिस्ट्रिक्टेड एरिया एक्सचेंज (आरएएक्स)’ पर आडवाणी का फोन आया।उन्होंने पूछा, ‘‘यशोवर्धन जी, कराची में क्या हम टेस्ट मैच नहीं करा सकते हैं?’’
आजाद ने उन्हें समझाया कि कराची और पेशावर को टेस्ट स्थलों की सूची से इसलिए बाहर रखा गया है क्योंकि वहां खतरे की आशंका अधिक थी और लंबे समय तक टीम के रहने से जोखिम बढ़ सकता था। आजाद ने किताब के ‘क्रिकेट डिप्लोमैसी, सिक्योरिटी एंड पोलोटिक्स’ चैप्टर में बताया, ‘‘आडवाणी ने मुझ से सुरक्षा आकलन पर दोबारा विचार करने और मामले को खुफिया ब्यूरो (आईबी) के निदेशक के सामने रखने को कहा। उन्होंने यह भी कहा कि वह खुद आईबी निदेशक से इस संबंध में बात करेंगे।’’
भारत का पाकिस्तान दौरा मार्च में कराची में एकदिवसीय मैच के साथ शुरू हुआ और अप्रैल तक चला।कराची में टेस्ट मैच की सुरक्षा संभालने की संभावना से आजाद चिंतित हो गए। उन्होंने अपने स्कूल के दिनों के दोस्त अरुण सिंह को फोन किया, जो उस समय विदेश मंत्रालय में पाकिस्तान मामलों के संयुक्त सचिव थे। सिंह ने उन्हें बताया कि कराची में टेस्ट मैच कराने का अनुरोध स्वयं राष्ट्रपति मुशर्रफ की ओर से आया था।आजाद के मुताबिक, ‘‘ मैंने पूछा कि यह सवाल सीधे उपप्रधानमंत्री की ओर से क्यों आया। अरुण सिंह ने बताया कि यह मुशर्रफ का अनुरोध था, जिसे तत्कालीन विदेश मंत्री के माध्यम से भारत तक पहुंचाया गया था।’’
आजाद ने लिखा कि आडवाणी चाहते तो सुरक्षा अधिकारियों के फैसले को आसानी से पलट सकते थे, लेकिन उन्होंने सुरक्षा संबंधी सलाह को प्राथमिकता दी और सुरक्षा दल द्वारा मंजूर कार्यक्रम में कोई बदलाव नहीं किया गया। पुस्तक में दौरे से जुड़ा एक हल्का-फुल्का प्रसंग भी है।आजाद के मुताबिक इस्लामाबाद हवाई अड्डे पर भारतीय टीम के साथ मौजूद सचिन तेंदुलकर उनके बगल में बैठे थे। उन्होंने काले सूट पहने, काले ब्रीफकेस लिए लंबे कद के सुरक्षा अधिकारियों की ओर इशारा करते हुए मासूमियत से पूछा, “क्या यह परमाणु बटन है?”
आजाद ने जब उन्हें ‘जैमर (संकेत अवरोधक उपकरणों)’ के बारे में बताया तो तेंदुलकर ने संतुष्ट होने तक उनसे कई सवाल किए। आजाद के मुताबिक, यह महान क्रिकेटर के साथ बातचीत का शानदार अनुभव था, क्योंकि उन्हें अपने पेशे के अलावा दूसरी चीजों को जानने में भी गहरी रुचि थी।सौरव गांगुली की कप्तानी में खेला गया यह ऐतिहासिक दौरा ‘मैत्री दौरे’ के नाम से चर्चित हुआ था। भारत ने एकदिवसीय श्रृंखला 3-2 से जीती, जबकि टेस्ट श्रृंखला पर 2-1 से कब्जा किया।
भारत के 2004 के ऐतिहासिक पाकिस्तान दौरे से पहले वहां के तत्कालीन राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ कराची में टेस्ट मैच की मेजबानी चाहते थे और उन्होंने भारत से इसकी अनुमति भी मांगी थी लेकिन सुरक्षा कारणों से उन्हें मंजूरी नहीं मिली। पूर्व खुफिया एवं सुरक्षा अधिकारी यशोवर्धन आजाद ने अपनी हाल में प्रकाशित पुस्तक ‘पुलिसिंग द रिपब्लिक: एन इनसाइड व्यू ऑफ हाउ इंडिया फाइट्स करप्शन एंड क्राइम, एंड प्रोटेक्ट्स राइट्स’ में इस पूरे घटनाक्रम का खुलासा करते हुए लिखा है कि तत्कालीन उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने इस पूरे मामले में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हुए मुशर्रफ के अनुरोध को ठुकरा दिया था। आजाद उस तीन सदस्यीय सुरक्षा दल के प्रमुख थे, जिसने पाकिस्तान के सभी क्रिकेट स्थलों का सुरक्षा जायजा लिया था।
दल ने दौरे की सिफारिश तो की, लेकिन कराची और पेशावर में टेस्ट मैच नहीं कराने की सलाह दी थी। सुरक्षा दल ने मुल्तान, रावलपिंडी और लाहौर को टेस्ट मैचों के लिए सुरक्षित माना था। रिपोर्ट सौंपने के कुछ समय बाद आजाद को ‘रिस्ट्रिक्टेड एरिया एक्सचेंज (आरएएक्स)’ पर आडवाणी का फोन आया।
उन्होंने पूछा, ‘‘यशोवर्धन जी, कराची में क्या हम टेस्ट मैच नहीं करा सकते हैं?’’
आजाद ने उन्हें समझाया कि कराची और पेशावर को टेस्ट स्थलों की सूची से इसलिए बाहर रखा गया है क्योंकि वहां खतरे की आशंका अधिक थी और लंबे समय तक टीम के रहने से जोखिम बढ़ सकता था। आजाद ने किताब के ‘क्रिकेट डिप्लोमैसी, सिक्योरिटी एंड पोलोटिक्स’ चैप्टर में बताया, ‘‘आडवाणी ने मुझ से सुरक्षा आकलन पर दोबारा विचार करने और मामले को खुफिया ब्यूरो (आईबी) के निदेशक के सामने रखने को कहा। उन्होंने यह भी कहा कि वह खुद आईबी निदेशक से इस संबंध में बात करेंगे।’’
भारत का पाकिस्तान दौरा मार्च में कराची में एकदिवसीय मैच के साथ शुरू हुआ और अप्रैल तक चला।
कराची में टेस्ट मैच की सुरक्षा संभालने की संभावना से आजाद चिंतित हो गए। उन्होंने अपने स्कूल के दिनों के दोस्त अरुण सिंह को फोन किया, जो उस समय विदेश मंत्रालय में पाकिस्तान मामलों के संयुक्त सचिव थे। सिंह ने उन्हें बताया कि कराची में टेस्ट मैच कराने का अनुरोध स्वयं राष्ट्रपति मुशर्रफ की ओर से आया था।
आजाद के मुताबिक, ‘‘ मैंने पूछा कि यह सवाल सीधे उपप्रधानमंत्री की ओर से क्यों आया। अरुण सिंह ने बताया कि यह मुशर्रफ का अनुरोध था, जिसे तत्कालीन विदेश मंत्री के माध्यम से भारत तक पहुंचाया गया था।’’
आजाद ने लिखा कि आडवाणी चाहते तो सुरक्षा अधिकारियों के फैसले को आसानी से पलट सकते थे, लेकिन उन्होंने सुरक्षा संबंधी सलाह को प्राथमिकता दी और सुरक्षा दल द्वारा मंजूर कार्यक्रम में कोई बदलाव नहीं किया गया। पुस्तक में दौरे से जुड़ा एक हल्का-फुल्का प्रसंग भी है।
आजाद के मुताबिक इस्लामाबाद हवाई अड्डे पर भारतीय टीम के साथ मौजूद सचिन तेंदुलकर उनके बगल में बैठे थे। उन्होंने काले सूट पहने, काले ब्रीफकेस लिए लंबे कद के सुरक्षा अधिकारियों की ओर इशारा करते हुए मासूमियत से पूछा, “क्या यह परमाणु बटन है?”
आजाद ने जब उन्हें ‘जैमर (संकेत अवरोधक उपकरणों)’ के बारे में बताया तो तेंदुलकर ने संतुष्ट होने तक उनसे कई सवाल किए। आजाद के मुताबिक, यह महान क्रिकेटर के साथ बातचीत का शानदार अनुभव था, क्योंकि उन्हें अपने पेशे के अलावा दूसरी चीजों को जानने में भी गहरी रुचि थी।
सौरव गांगुली की कप्तानी में खेला गया यह ऐतिहासिक दौरा ‘मैत्री दौरे’ के नाम से चर्चित हुआ था। भारत ने एकदिवसीय श्रृंखला 3-2 से जीती, जबकि टेस्ट श्रृंखला पर 2-1 से कब्जा किया।
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