लंदन कैसे पहुंची भोजशाला की सरस्वती की प्रतिमा? जानिए पूरा इतिहास

लंदन कैसे पहुंची भोजशाला की सरस्वती की प्रतिमा? जानिए पूरा इतिहास

Bhojshala Controversy: धार की भोजशाला को लेकर मुस्लिम पक्ष और हिन्दू पक्ष दोनों ही अपने-अपने दावे करते हैं। उसे लेकर हाईकोर्ट ने शुक्रवार को अहम फैसला दिया। हाईकोर्ट ने सभी पक्षों को सुनने के बाद इसे मंदिर परिसर माना है। इसके मुताबिक हिन्दुओं को अब यहां पूजा का अधिकार रहेगा, जबकि मस्जिद के लिए अन्य स्थान पर जमीन देने के लिए भी हाईकोर्ट ने कहा है। एएसआई की रिपोर्ट के मुताबिक आपको बता रहे हैं कि मंदिर के प्राचीन अवशेषों से कमाल मौला नामक मस्जिद को बनाया था। आइए नजर डालते हैं एक हजार साल पुराने भोजशाला परिसर के इतिहास पर…।

patrika.com की रिपोर्ट…।

तब राजाभोज का शासन था

आज से एक हजार साल पहले मालवा क्षेत्र में सन 1010 से 1055 के बीच राजा भोज का शासनकाल था। अपने कार्यकाल के दौरान राजाभोज ने 1034 में सरस्वती सदन की स्थापना की थी, जिसका नाम भोजशाला रखा गया था। यहां बाग्देवी (देवी सरस्वती) की प्रतिमा स्थापित की गई थी।

कौन थे कमाल मौला?

राजाभोज के शासन के बाद 1305 से 1531 का ऐसा कालखंड आया जब अलाउद्दीन खिलजी और दिलावर खान गौरी ने धार पर कब्जा कर लिया था। तब गोलादेव और महालकदेव का शासन था। इसके बाद स्वतंत्र मालवा सल्तनत की स्थापना हो गई थी। तब भोजशाला के ज्यादातर हिस्से को ध्वस्त कर दिया गया था। उस दौर के सूफी संत कमाल मौला जिनका वास्तविक नाम शेख कमल अल-दीन था। निजामुद्दीन औलिया के शिष्य रहे कमाल मौला का 1331 में देहांत हो गया था। 1459 में मौलाना कमालुद्दीन के मकबरा बनाया गया था। कहा जाता है कि इस्लाम के प्रचार के लिए औलिया ने कमाल मौला तो धार और आसपास के क्षेत्र में भेजा था। कमालुद्दीन वेलफेयर सोसायटी के चेयरमैन अब्दुल समद बताते हैं कि कमाल मौला मकबरा मस्जिद और विवादित भोजशाला के करीब ही है।

कैसे लंदन पहुंच गई सरस्वती की प्रतिमा

भोजशाला की बाग्देवी यानी सरस्वती की प्रतिमा अब लंदन के म्यूजिम में रखी हुई है। यह ब्रिटिश म्यूजियम में कांच के एक बॉक्स में रखी है। इसकी ऊंचाई 4-5 फीट है। 1732 में धार पर जब मराठा शासकों का कब्जा हो गया था। 1875 में भोजशाला के पास खुदाई के दौरान वाग्देवी की मूर्ति मिली थी, जिसे 1880 में एक अंग्रेज अधिकारी लेकर लंदन पहुंच गया। 117 साल से लंदन के ब्रिटिश म्यूजिम ग्रेट रसल स्ट्रीट में रखी यह प्रतिमा लॉर्ड कर्जन के आदेश से धार से लंदन ले जाई गई थी। मुगलों के आक्रमण के बाद खंडित हुई थी। अंग्रेजों ने खुदाई कर 1875 में निकाला था।

1909 में स्मारक घोषित

धार शासकों ने प्राचीन स्मारक कानून लागू करते हुए धार दरबार गैजेट जारी किया था, जिसमें भोजशाला परिसर को संरक्षित स्मारक घोषित किया था। 1934 में धार के शासकों ने यहां अवैध अतिक्रमण हटाते हुए भोजशाला का बोर्ड लगा दिया था। इसी साल धार के दीवान के नादकर ने भोजशाला को कमाल मौलाना मस्जिद घोषित कर दिया था और मुसलमानों को शुक्रवार की नमाज अदा करने की अनुमति दे दी थी।

Dhar Bhojshala Dispute

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