केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट के लिए दौधन बांध बनाए जाने के खिलाफ जल सत्याग्रह 10 दिन के लिए टल गया है, लेकिन आंदोलन के दो प्रमुख चेहरे अमित भटनागर और दिव्या अहिरवार सुर्खियों में हैं। अमित रिटायर्ड प्रिंसिपल के बेटे हैं। दिव्या साधारण दलित परिवार से आती हैं। दोनों घर-परिवार छोड़कर रात-दिन विस्थापितों के साथ रहे। खुले आसमान के नीचे सोए। सत्याग्रह के दौरान कई दिन भूखे रहे। भास्कर ने उनसे बात कर समझा कि वे इस आंदोलन से कैसे जुड़े और किन चुनौतियों का उन्होंने और परिवार ने सामना किया। विरोध की वजह केन-बेतवा लिंक परियोजना से छतरपुर के 24 गांवों का विस्थापन होना है। आठ गांव डूब क्षेत्र में हैं। 16 गांव पन्ना टाइगर रिजर्व में शामिल किए जाएंगे। डूब क्षेत्र वाले गांवों में ज्यादा विरोध है। ग्रामीण विकसित ग्राम में भूखंड और 5 लाख रुपए मुआवजा मांग रहे हैं, जबकि प्रशासन 12.50 लाख रुपए देकर पल्ला झाड़ना चाहता है। पहले बात अमित भटनागर की… भास्कर से बोले- हजारों लोगों के विस्थापन पर कैसे चुप रहूं भास्कर ने अमित भटनागर से पूछा कि रिटायर्ड प्रिंसिपल का बेटा, कारोबारी का भाई और सरकारी टीचर का पति विस्थापितों के साथ अनशन क्यों कर रहा है? जवाब में अमित ने कहा कि उन्होंने कम्प्यूटर साइंस में ग्रेजुएशन किया, लेकिन शुरू से गांधी विचार से प्रभावित रहे। कई राज्यों की यात्राएं कीं। राष्ट्रीय युवा संगठन से जुड़े रहे। नर्मदा बचाओ आंदोलन से जुड़े रहे। विस्थापन का दर्द देखा है। केन-बेतवा प्रोजेक्ट में हजारों लोगों के विस्थापन पर चुप नहीं रह सकता था। गांव-गांव घूमकर लोगों का दर्द देखा। उनकी पीढ़ियों की यादें खत्म हो रही हैं। विस्थापन पैकेज के नाम पर भ्रष्टाचार हो रहा है। पिता से कहा- गोली भी चला दें तो भी हटूंगा नहीं… अमित के पिता संतोष भटनागर बीएड कॉलेज के संचालक हैं। वे बताते हैं कि अनशन के दौरान एसडीएम और तहसीलदार टीम के साथ कॉलेज पहुंचे। उन्होंने बिल्डिंग के दस्तावेज और बाउंड्री की मंजूरी मांगी, जो हमारे पास थी। इसके बावजूद जेसीबी मंगवा ली। हमने पूछा कि बात क्या है? अधिकारियों ने पूछा- अमित भटनागर कौन है? उन्होंने कहा कि उसे किसी भी तरह अनशन से उठाओ। मैं छोटे बेटे अंकित के साथ अनशन स्थल पहुंचा। वहां अमित से बात हुई तो उसने कहा- पिताजी, आपकी हर बात मानी है। आपने जहां कहा, वहीं शादी की, लेकिन इन ग्रामीणों को मंझधार में नहीं छोड़ सकते। जब तक सुनवाई नहीं होगी, हम नहीं हटेंगे। हम नदी में जान दे देंगे। डंडों या गोलियों से मारे जाएंगे, लेकिन झुकेंगे नहीं। प्रशासन ने बातचीत के लिए भेजा, उधर घर नपवा दिया अमित के भाई अंकित बताते हैं कि प्रशासन ने बातचीत के लिए उन्हें भाई के पास भेजा, उधर घर नपवा दिया। 12 अप्रैल को वे अनशन स्थल पर पहुंचे। 13 अप्रैल को नोटिस आ गया। घर के सामने जेसीबी खड़ी कर दी गई। उन्होंने कहा- गांधीजी अनशन पर बैठते थे तो अंग्रेजों ने भी ऐसा नहीं किया। अमित गलत हैं तो उन पर कार्रवाई करें, लेकिन मकान गिराने की धमकी देना गलत है। अमित कहते हैं कि विस्थापितों की लड़ाई के लिए उन्हें परिवार की नाराजगी सहना पड़ती है। कई बार पिता और पत्नी नाराज होते हैं, लेकिन डर से लड़ना बंद नहीं करूंगा। अब बात 24 साल की दिव्या की… महिलाओं में मुझे मेरी मां का चेहरा दिखता है ऐसी ही कहानी दिव्या की है। वह कहती हैं कि पिता की मौत के बाद मां-भाई को रोजी-रोटी के लिए जूझते देखा है। इतने बड़े पैमाने पर जंगल-जमीन उजाड़ी जा रही है, इसलिए उनके साथ खड़ा होना मेरी ड्यूटी है। उन महिलाओं में मुझे मेरी मां का चेहरा दिखता है, अगर हम साथ नहीं खड़े होंगे तो सरकारी सिस्टम को डर नहीं होगा। हजारों लोग भूखे थे, मैं भाई की शादी में कैसे जाती दिव्या से 15 अप्रैल को अनशन स्थल पर मुलाकात हुई थी। बातचीत में उन्होंने नहीं बताया कि उसी दिन उनके भाई की शादी थी। यह जानकारी 16 अप्रैल को अमित भटनागर के पिता से मिली। दिव्या ने बताया कि आंदोलन निर्णायक मोड़ पर था। हजारों आदिवासी महिलाएं तपती धूप में भूखी थीं। वह आगे कहती हैं कि मेरी भी इच्छा थी कि भाई की शादी में जाऊं, लेकिन हालात ऐसे थे कि लोगों को छोड़ना मुश्किल था। वह बताती हैं कि अनशन के लिए उन्हें बीएड का एक पेपर छोड़ना पड़ा था। 13 साल पहले पिता का निधन हो गया। बड़ी बहन और भाई की पढ़ाई छूट गई। मां और भाई ने मजदूरी कर बहनों को पढ़ाया। हमने शुरू से संघर्ष देखा है। सिर्फ अपनी खुशी के लिए आंदोलन का साथ नहीं छोड़ सकती।


