Middle East Conflict : इटली और इजरायल के बीच कूटनीतिक और रक्षा संबंध दशकों पुराने और बेहद मजबूत रहे हैं। दोनों देश लंबे समय से सैन्य तकनीक, हथियारों की खरीद और रक्षा अनुसंधान में एक-दूसरे के प्रमुख साझीदार रहे हैं। लेकिन मौजूदा मध्य पूर्व संघर्ष ने इन ऐतिहासिक रिश्तों की कड़ी परीक्षा ले ली है। ईरान और इजरायल के बीच लगातार बढ़ते तनाव और युद्ध के हालातों को देखते हुए इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने एक ऐसा कदम उठाया है, जिसकी उम्मीद इजरायल को बिल्कुल नहीं थी। मेलोनी सरकार ने इजरायल के साथ होने वाले महत्वपूर्ण रक्षा और सैन्य तकनीक समझौते को निलंबित कर दिया है।
क्यों रुकी पुरानी और पक्की दोस्ती की डील ?
सवाल यह उठता है कि जिस इटली ने हमेशा यूरोपीय संघ में इजरायल का बचाव किया, उसने अचानक यह रुख क्यों बदला? दरअसल, इस फैसले के पीछे केवल अंतरराष्ट्रीय कूटनीति नहीं, बल्कि इटली की घरेलू राजनीति और मानवाधिकार का मुद्दा अहम है। गाजा में लंबे समय से चल रहे संघर्ष और अब ईरान के साथ सीधे टकराव के कारण नागरिक हताहतों की संख्या तेजी से बढ़ी है। मेलोनी सरकार पर अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों और खुद उनके देश की जनता का भारी दबाव था। इटली नहीं चाहता कि उसके हथियारों या रक्षा तकनीक का इस्तेमाल ऐसे युद्ध में हो, जिससे क्षेत्रीय अस्थिरता और ज्यादा भड़के।
‘ऑटोमैटिक रिन्यूअल’ पर लगी रोक
इस रक्षा समझौते के तहत दोनों देशों के बीच अत्याधुनिक हथियारों और सैन्य तकनीक का लेन-देन होना था। आमतौर पर ऐसे सौदे स्वतः नवीनीकृत (ऑटोमैटिक रिन्यू) हो जाते हैं। लेकिन इटली ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक मध्य पूर्व में शांति बहाल नहीं होती और युद्ध के हालात सामान्य नहीं होते, तब तक इस रिन्यूअल पर ब्रेक लगा रहेगा। मेलोनी का यह फैसला इस बात का सबूत है कि युद्ध के चरम पर अब पारंपरिक मित्र देश भी आंख मूंदकर समर्थन देने से कतरा रहे हैं।
नेतन्याहू के लिए भारी कूटनीतिक झटका
इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के लिए यह केवल हथियारों का रुकना नहीं है, बल्कि यह एक बड़ा रणनीतिक झटका है। इजरायल को डर है कि इटली का यह कदम एक ‘डोमिनो इफेक्ट’ पैदा कर सकता है। यानी, इटली की देखा-देखी अब स्पेन, फ्रांस और जर्मनी जैसे अन्य महत्वपूर्ण यूरोपीय देश भी घरेलू दबाव में आकर इजरायल के साथ अपने रक्षा सौदों की समीक्षा कर सकते हैं।
इटली ने मैलोनी के कदम को अहम बताया
इटली के इस फैसले पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। यूरोपीय शांति संगठनों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने मेलोनी के इस कदम को “साहसिक और शांति की दिशा में एक जरूरी पहल” बताया है। वहीं, इजरायली रक्षा खेमे में भारी निराशा है। इजरायली रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि संकट के समय में एक पुराने दोस्त का यूं पीछे हटना उनके सैन्य मनोबल और कूटनीतिक पकड़ को कमजोर कर सकता है।
राजनयिकों ने आपातकालीन बैठकें शुरू कर दीं
इस झटके के बाद इजरायल के रक्षा मंत्रालय और शीर्ष राजनयिकों ने आपातकालीन बैठकें शुरू कर दी हैं। तेल अवीव की कोशिश है कि इटली के साथ बैक-चैनल वार्ता कर उन्हें यह भरोसा दिलाया जाए कि दी जाने वाली तकनीक का इस्तेमाल आक्रामक नहीं बल्कि केवल रक्षात्मक उद्देश्यों के लिए किया जाएगा। साथ ही, इजरायल अब अमेरिका पर अधिक निर्भरता बढ़ाने की रणनीति बना रहा है।
जॉर्जिया मेलोनी की अपनी राजनीतिक छवि
बहरहाल, इस पूरे घटनाक्रम का एक दिलचस्प पहलू जॉर्जिया मेलोनी की अपनी राजनीतिक छवि है। मेलोनी एक धुर दक्षिणपंथी नेता मानी जाती हैं, और आम तौर पर ऐसी सरकारें सैन्य रूप से इजरायल के करीब होती हैं। लेकिन इस बार उन्होंने अपनी वैचारिक लाइन से हटकर व्यावहारिक और मानवीय आधार पर फैसला लिया है। यह दर्शाता है कि जब बात अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और घरेलू वोट बैंक की आती है, तो गहरी राजनीतिक विचारधाराएं भी बैकसीट ले लेती हैं।


