सुप्रीम कोर्ट में 13 मई को शिक्षकों की पात्रता परीक्षा (टीईटी) को लेकर हुई सुनवाई के बाद कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया है, लेकिन कोर्ट में आए अदालत के तर्कों के आधार पर अब शिक्षकों ने वैकल्पिक तैयारियां शुरू कर दी हैं। कोर्ट के रुख से यह संकेत मिले हैं कि उन्हें परीक्षा से राहत मिलना आसान नहीं है। ऐसे में प्लान बी पर काम करने के लिए अब क्यूरेटिव पिटीशन दायर करने और केंद्र सरकार को घेरने के लिए देश भर के शिक्षक संगठनों का जमावड़ा जल्दी ही दिल्ली में लगाने की तैयारी है। इस परीक्षा का विरोध करने के लिए सभी राज्यों के शिक्षक दिल्ली में एकत्र होकर सड़क से संसद तक अपना विरोध जताने की तैयारी में जुट गए हैं। राज्य शिक्षक संघ के प्रदेश अध्यक्ष जगदीश यादव ने कहा कि उम्मीद है कि न्यायालय लाखों शिक्षकों के भविष्य, सेवा सुरक्षा और न्यायसंगत अधिकारों को ध्यान में रखते हुए शिक्षकों के पक्ष में ऐतिहासिक निर्णय देगा। यादव ने कहा कि यदि किसी कारणवश निर्णय शिक्षकों के पक्ष में नहीं आता है तो यह संघर्ष किसी भी स्थिति में समाप्त नहीं होगा। संगठन सुप्रीम कोर्ट में क्यूरेटिव पिटीशन दायर कर पुनः न्याय की लड़ाई लड़ेगा और देशभर के शिक्षकों को संगठित कर लोकतांत्रिक तरीके से सड़क से संसद तक बड़ा आंदोलन खड़ा करेगा। उन्होंने कहा कि शीघ्र ही दिल्ली में देश के विभिन्न राज्यों के शिक्षक संगठनों की एक बैठक आयोजित की जाएगी, जिसमें संसद घेराव, राष्ट्रव्यापी आंदोलन और व्यापक जनजागरण अभियान की रणनीति तैयार की जाएगी। यह केवल नौकरी बचाने का आंदोलन नहीं, बल्कि लाखों शिक्षक परिवारों के सम्मान, भविष्य और अस्तित्व की लड़ाई है। उन्होंने सरकार से मांग करते हुए कहा कि यदि आवश्यकता पड़े तो सरकार तत्काल अध्यादेश लाकर कानून में संशोधन करे ताकि लाखों शिक्षकों को राहत मिल सके और शिक्षा व्यवस्था में स्थिरता बनी रहे। जगदीश यादव ने चेतावनी भरे स्वर में कहा कि यदि शिक्षकों की आवाज को अनसुना किया गया, तो देशभर के शिक्षक एकजुट होकर ऐसा जनआंदोलन खड़ा करेंगे जिसकी गूंज सड़कों से लेकर संसद तक सुनाई देगी। राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद से क्यों नहीं पूछा जाता उधर ट्राइबल वेलफेयर्स टीचर्स एसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष डीके सिंगोर ने कहा है कि वर्ष 2017 का संशोधित अध्यादेश उन कार्यरत शिक्षकों के लिए 4 वर्ष बढ़ाया है जिन्हे 2010 में 5 वर्ष की छूट देकर नियुक्त किया गया था लेकिन सुप्रीम कोर्ट इसे 2010 के पहले नियुक्त शिक्षकों तक ले कर जा रही है l सिंगोर ने कहा कि यदि 2017 के प्रोविजन के कारण इन सर्विस टीचर्स के लिए टीईटी अनिवार्य हो गई है तो क़्या 2010 से 2017 तक टीईटी अनिवार्य नहीं थी l उन्होंने कहा कि न्यूनत्तम योग्यता शब्द आरटीई एक्ट में लिख जाने से एनसीटीई (राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद) को टीईटी से छूट देने का पॉवर नहीं है तो एनसीटीई से ही क्यों नहीं पूछा जाता कि उसने कार्य क्षेत्र से बाहर जाकर छूट के प्रावधान क्यों और किस मंशा से डाले l ….तो टीडब्ल्यूटीए भी लगाएगा क्यूरेटिव पिटीशन सिंगोर ने सोशल मीडिया पर यह लिखा है कि यदि मामला बिगड़ा तो क्यूरेटिव पेटिशन लगाएंगे और जो नहीं सुना गया वह दूसरे जजों के समक्ष रखे जायेंगे। सिंगोर ने सवाल उठाया कि RTE Act में न्यूनतम योग्यता का उल्लेख है जिसमें एकेडमिक, शिक्षक प्रशिक्षण के साथ TET शामिल है, फिर कोर्ट ने सिर्फ टीईटी क्यों अनिवार्य किया? कई शिक्षकों के 50% से कम अंक हैं उन्हें फिर से हायर सेकेण्डरी, स्नातक करने को कह देना था, शायद ऐसा कभी नहीं कहा जा सकता क्योंकि भर्ती के समय न्यूनत्तम 50% की शर्त नहीं थी तो फिर टीईटी को क्यों अनिवार्य किया भर्ती के समय इसकी भी कोई शर्त न थी l


