ईरान युद्ध के बीच केरोसिन पर सरकार की घोषणा:गयाजी में वितरण की न तैयारी, न डिमांड; डिपो संचालक बोले- सिर्फ राशन डीलर्स को ही डिलीवरी की अनुमति

ईरान युद्ध के बीच केरोसिन पर सरकार की घोषणा:गयाजी में वितरण की न तैयारी, न डिमांड; डिपो संचालक बोले- सिर्फ राशन डीलर्स को ही डिलीवरी की अनुमति

अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच चल रहे युद्ध से पैदा हुए संभावित गैस संकट को लेकर केंद्र सरकार ने केरोसिन वितरण की बात कही है, लेकिन जमीन पर इसकी तस्वीर बिल्कुल उलट दिख रही है। सरकारी घोषणा और जमीनी हकीकत के बीच बड़ा फासला साफ नजर आ रहा है। दैनिक भास्कर की टीम आमस प्रखंड के चंडी स्थान स्थित केरोसिन डिपो पहुंची, तो वहां न कोई तैयारी दिखी और न ही किसी तरह की हलचल। हालात यह कि पूरी योजना अभी कागजों तक ही सीमित है। पढ़ें, पूरी रिपोर्ट। आमस, गुरारू, टिकारी और इमामगंज में केरोसिन डिपो गयाजी जिले में आमस, गुरारू, टिकारी और इमामगंज को छोड़ पूरे बिहार में कहीं भी डिपो नहीं है। इन चार डिपो से ही जनवितरण प्रणाली के डीलर जरूरत पड़ने पर केरोसिन उठाते हैं। हालांकि हकीकत यह है कि रूटीन में कोई भी डीलर केरोसिन लेने नहीं पहुंचता। डिपो संचालकों को भी सिर्फ राशन डीलरों को ही केरोसिन देने की अनुमति है। किसी निजी या अन्य संस्थान को देने का अधिकार नहीं है। आमस प्रखंड के चंडी स्थान स्थित कलिंगा इंटरप्राइजेज के मालिक चंद्रिका सिंह बताते हैं कि उन्हें प्रशासन जितना ऑर्डर देता है, उतना ही केरोसिन देना होता है। लेकिन मौजूदा हालात में डिमांड लगभग खत्म हो चुकी है। महीने में बमुश्किल एक या दो डीलर ही केरोसिन लेने आते हैं। वजह साफ है। अब इसकी जरूरत ही नहीं रह गई। बिजली और एलपीजी गैस के चलते केरोसिन का इस्तेमाल लगभग खत्म हो चुका है। बिक्री ठप्प होने के बाद एक-एक कर बंद होते गए केरोसिन के डिपो चंद्रिका सिंह आगे बताते हैं कि एक समय जिले में कई डिपो हुआ करते थे, लेकिन बिक्री ठप होने के कारण एक-एक कर सभी बंद हो गए। हम लोग बरौनी से केरोसिन उठाते हैं। पिछले साल अगस्त में 12 हजार लीटर उठाया था। उसमें से अब भी करीब 5 हजार लीटर स्टॉक में पड़ा है। इसके बाद हाल ही में मार्च में फिर 12 हजार लीटर उठाने का आदेश मिला, लेकिन डिमांड नहीं होने के कारण अब तक नहीं उठाया। लाखों रुपए फंसा कर रखना आसान नहीं है। सरकार की नई घोषणा के तहत पेट्रोल पंपों के जरिए केरोसिन वितरण की बात कही गई है। इस पर डिपो संचालक इसे अपने लिए राहत जरूर मान रहे हैं। लेकिन आदेश का इंतजार कर रहे हैं। चंद्रिका सिंह कहते हैं कि अब तक न प्रशासन से कोई निर्देश आया है और न ही हिंदुस्तान पेट्रोलियम की ओर से। हम तैयार हैं, लेकिन बिना आदेश कुछ नहीं कर सकते। केरोसिन वितरण योजना पर कई सवाल हो रहे खड़े हालांकि इस योजना पर कई सवाल भी खड़े हो रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल यह कि पेट्रोल पंप केरोसिन का वितरण कैसे करेंगे। फिलहाल पेट्रोल पंपों पर सिर्फ पेट्रोल और डीजल के लिए ही नोजल और स्टोरेज सिस्टम होता है। ऐसे में तीसरे ईंधन के तौर पर केरोसिन को कैसे शामिल किया जाएगा। इस पर कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं है। केरोसिन की प्रकृति भी अलग और कुछ हद तक खतरनाक मानी जाती है। ऐसे में सुरक्षा का पहलू भी बड़ा मुद्दा है। गांवों में कुछ लोगों ने निकाले स्टोव, बोले- अब यही काम आएगा इधर, आमस के गांवों में एक अलग ही तस्वीर उभर रही है। संभावित संकट की आशंका के बीच लोग पुराने केरोसिन स्टोव को फिर से दुरुस्त कराने में जुट गए हैं। आमस के कोरमथु गांव निवासी पिंटू कुमार बताते हैं कि घर में पुराना स्टोव है, लेकिन खराब हो गया है। उसे ठीक कराने शेरघाटी बाजार जा रहा हूं। गैस खत्म हो रही है और इस बीच किल्लत भी बढ़ रही है। अगर केरोसिन मिलेगा तो स्टोव काम आएगा। पिंटू बताते हैं कि सरकार की घोषणा के बाद ही उन्होंने स्टोव ठीक कराने का फैसला लिया। सुना है कि सरकार केरोसिन देगी, इसलिए पहले से तैयारी कर रहे हैं। हालांकि बाजार की स्थिति भी निराशाजनक है। केरोसिन स्टोव अब बाजार से लगभग गायब हो चुके हैं। न तो इसका निर्माण हो रहा है और न ही इसे ठीक करने वाले कारीगर आसानी से मिल रहे हैं। शहर के रमना रोड बाजार के हार्डवेयर दुकानदार मनोज केसरी बताते हैं कि हर दिन 6-7 लोग स्टोव पूछने आते हैं। लेकिन हमारे पास नहीं है। पूरे बाजार में कहीं स्टोव नहीं मिल रहा। अब इसका न निर्माण हो रहा है और न कारीगर बचे हैं। केरोसिन वितरण का आदेश मिला तो है, लागू करने को स्पष्ट निर्देश नहीं मामले पर जिलापूर्ति अधिकारी अशोक चौधरी का भी जवाब साफ तस्वीर नहीं देता। वे कहते हैं कि केरोसिन वितरण को लेकर आदेश तो मिला है, लेकिन यह कब से लागू होगा, इस पर अब तक स्पष्ट निर्देश नहीं आया है। जब उनसे पूछा गया कि गांव के लोग केरोसिन का क्या करेंगे, तो उनका जवाब और भी चौंकाने वाला था। उन्होंने कहा कि लोग स्टोव जलाने या रोशनी के लिए इसका उपयोग कर सकते हैं। हालांकि यह जवाब खुद ही सवाल खड़ा करता है। क्योंकि जिले के लगभग हर गांव और घर में बिजली पहुंच चुकी है। ऐसे में रोशनी के लिए केरोसिन का उपयोग कितना व्यावहारिक होगा। यह समझ से परे है।
कुल मिलाकर, ईरान युद्ध के बीच संभावित संकट को लेकर सरकार की तैयारी अभी जमीन पर नजर नहीं आ रही। डिपो खाली पड़े हैं, डिमांड नहीं है, बाजार में स्टोव नहीं है और प्रशासन के पास भी स्पष्ट रोडमैप नहीं है। अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच चल रहे युद्ध से पैदा हुए संभावित गैस संकट को लेकर केंद्र सरकार ने केरोसिन वितरण की बात कही है, लेकिन जमीन पर इसकी तस्वीर बिल्कुल उलट दिख रही है। सरकारी घोषणा और जमीनी हकीकत के बीच बड़ा फासला साफ नजर आ रहा है। दैनिक भास्कर की टीम आमस प्रखंड के चंडी स्थान स्थित केरोसिन डिपो पहुंची, तो वहां न कोई तैयारी दिखी और न ही किसी तरह की हलचल। हालात यह कि पूरी योजना अभी कागजों तक ही सीमित है। पढ़ें, पूरी रिपोर्ट। आमस, गुरारू, टिकारी और इमामगंज में केरोसिन डिपो गयाजी जिले में आमस, गुरारू, टिकारी और इमामगंज को छोड़ पूरे बिहार में कहीं भी डिपो नहीं है। इन चार डिपो से ही जनवितरण प्रणाली के डीलर जरूरत पड़ने पर केरोसिन उठाते हैं। हालांकि हकीकत यह है कि रूटीन में कोई भी डीलर केरोसिन लेने नहीं पहुंचता। डिपो संचालकों को भी सिर्फ राशन डीलरों को ही केरोसिन देने की अनुमति है। किसी निजी या अन्य संस्थान को देने का अधिकार नहीं है। आमस प्रखंड के चंडी स्थान स्थित कलिंगा इंटरप्राइजेज के मालिक चंद्रिका सिंह बताते हैं कि उन्हें प्रशासन जितना ऑर्डर देता है, उतना ही केरोसिन देना होता है। लेकिन मौजूदा हालात में डिमांड लगभग खत्म हो चुकी है। महीने में बमुश्किल एक या दो डीलर ही केरोसिन लेने आते हैं। वजह साफ है। अब इसकी जरूरत ही नहीं रह गई। बिजली और एलपीजी गैस के चलते केरोसिन का इस्तेमाल लगभग खत्म हो चुका है। बिक्री ठप्प होने के बाद एक-एक कर बंद होते गए केरोसिन के डिपो चंद्रिका सिंह आगे बताते हैं कि एक समय जिले में कई डिपो हुआ करते थे, लेकिन बिक्री ठप होने के कारण एक-एक कर सभी बंद हो गए। हम लोग बरौनी से केरोसिन उठाते हैं। पिछले साल अगस्त में 12 हजार लीटर उठाया था। उसमें से अब भी करीब 5 हजार लीटर स्टॉक में पड़ा है। इसके बाद हाल ही में मार्च में फिर 12 हजार लीटर उठाने का आदेश मिला, लेकिन डिमांड नहीं होने के कारण अब तक नहीं उठाया। लाखों रुपए फंसा कर रखना आसान नहीं है। सरकार की नई घोषणा के तहत पेट्रोल पंपों के जरिए केरोसिन वितरण की बात कही गई है। इस पर डिपो संचालक इसे अपने लिए राहत जरूर मान रहे हैं। लेकिन आदेश का इंतजार कर रहे हैं। चंद्रिका सिंह कहते हैं कि अब तक न प्रशासन से कोई निर्देश आया है और न ही हिंदुस्तान पेट्रोलियम की ओर से। हम तैयार हैं, लेकिन बिना आदेश कुछ नहीं कर सकते। केरोसिन वितरण योजना पर कई सवाल हो रहे खड़े हालांकि इस योजना पर कई सवाल भी खड़े हो रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल यह कि पेट्रोल पंप केरोसिन का वितरण कैसे करेंगे। फिलहाल पेट्रोल पंपों पर सिर्फ पेट्रोल और डीजल के लिए ही नोजल और स्टोरेज सिस्टम होता है। ऐसे में तीसरे ईंधन के तौर पर केरोसिन को कैसे शामिल किया जाएगा। इस पर कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं है। केरोसिन की प्रकृति भी अलग और कुछ हद तक खतरनाक मानी जाती है। ऐसे में सुरक्षा का पहलू भी बड़ा मुद्दा है। गांवों में कुछ लोगों ने निकाले स्टोव, बोले- अब यही काम आएगा इधर, आमस के गांवों में एक अलग ही तस्वीर उभर रही है। संभावित संकट की आशंका के बीच लोग पुराने केरोसिन स्टोव को फिर से दुरुस्त कराने में जुट गए हैं। आमस के कोरमथु गांव निवासी पिंटू कुमार बताते हैं कि घर में पुराना स्टोव है, लेकिन खराब हो गया है। उसे ठीक कराने शेरघाटी बाजार जा रहा हूं। गैस खत्म हो रही है और इस बीच किल्लत भी बढ़ रही है। अगर केरोसिन मिलेगा तो स्टोव काम आएगा। पिंटू बताते हैं कि सरकार की घोषणा के बाद ही उन्होंने स्टोव ठीक कराने का फैसला लिया। सुना है कि सरकार केरोसिन देगी, इसलिए पहले से तैयारी कर रहे हैं। हालांकि बाजार की स्थिति भी निराशाजनक है। केरोसिन स्टोव अब बाजार से लगभग गायब हो चुके हैं। न तो इसका निर्माण हो रहा है और न ही इसे ठीक करने वाले कारीगर आसानी से मिल रहे हैं। शहर के रमना रोड बाजार के हार्डवेयर दुकानदार मनोज केसरी बताते हैं कि हर दिन 6-7 लोग स्टोव पूछने आते हैं। लेकिन हमारे पास नहीं है। पूरे बाजार में कहीं स्टोव नहीं मिल रहा। अब इसका न निर्माण हो रहा है और न कारीगर बचे हैं। केरोसिन वितरण का आदेश मिला तो है, लागू करने को स्पष्ट निर्देश नहीं मामले पर जिलापूर्ति अधिकारी अशोक चौधरी का भी जवाब साफ तस्वीर नहीं देता। वे कहते हैं कि केरोसिन वितरण को लेकर आदेश तो मिला है, लेकिन यह कब से लागू होगा, इस पर अब तक स्पष्ट निर्देश नहीं आया है। जब उनसे पूछा गया कि गांव के लोग केरोसिन का क्या करेंगे, तो उनका जवाब और भी चौंकाने वाला था। उन्होंने कहा कि लोग स्टोव जलाने या रोशनी के लिए इसका उपयोग कर सकते हैं। हालांकि यह जवाब खुद ही सवाल खड़ा करता है। क्योंकि जिले के लगभग हर गांव और घर में बिजली पहुंच चुकी है। ऐसे में रोशनी के लिए केरोसिन का उपयोग कितना व्यावहारिक होगा। यह समझ से परे है।
कुल मिलाकर, ईरान युद्ध के बीच संभावित संकट को लेकर सरकार की तैयारी अभी जमीन पर नजर नहीं आ रही। डिपो खाली पड़े हैं, डिमांड नहीं है, बाजार में स्टोव नहीं है और प्रशासन के पास भी स्पष्ट रोडमैप नहीं है।  

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