GDP के आंकड़ों पर भिड़े सुभाष चंद्र गर्ग और गौरव वल्लभ, 6 लाख करोड़ रुपये के बदलाव पर उठे सवाल

GDP के आंकड़ों पर भिड़े सुभाष चंद्र गर्ग और गौरव वल्लभ, 6 लाख करोड़ रुपये के बदलाव पर उठे सवाल

GDP Base Year Change: भारत की जीडीपी के आंकड़ों को लेकर राजनीतिक गलियारों में बहस छिड़ी हुई है। एक पक्ष कह रहा है कि सरकार ने बेस ईयर बदलकर आंकड़ों से छेड़छाड़ की है, तो दूसरा पक्ष कह रहा है कि विपक्षी आंकड़ों की गलत तुलना कर रहे हैं। इससे आर्थिक आंकड़ों की विश्वसनीयता और उन्हें समझने के तरीके पर भी सवाल उठ रहे हैं। दरअसल सरकार ने सोमवार को पहली तिमाही की जीडीपी ग्रोथ 7.8 फीसदी बतायी थी। यह एक साल पहले की समान तिमाही की 6.9% ग्रोथ रेट से अधिक है। हालांकि, यह जनवरी-मार्च 2026 में दर्ज 8.6 फीसदी की ग्रोथ रेट से कम है।

सांख्यिकीय मंत्रालय के मुताबिक, सही तुलना के लिए दोनों पीरियड के डेटा के एक समान स्रोतों का इस्तेमाल जरूरी है। नई सीरीज के तहत नॉमिनल जीडीपी 80 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 88.27 लाख करोड़ रुपये हो गई। यह 10.3 फीसदी की ग्रोथ है। वहीं, रियल जीडीपी 75.46 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 81.36 लाख करोड़ हो गई, जो 7.8 फीसदी की ग्रोथ रेट है। सरकार इस ग्रोथ रेट की काफी तारीफ कर रही है, तो विपक्ष इसे आंकड़ों की बाजीगरी बता रहा है।

बहस तब बढ़ गई, जब पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने कहा कि ग्रोथ रेट 7.8 फीसदी नहीं, बल्कि सिर्फ 2.6 फीसदी है। गर्ग और प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य गौरव वल्लभ के बीच एक टीवी चैनल पर चर्चा में इसी मुद्दे पर तीखी बहस देखने को मिली।

सुभाष गर्ग ने उठाए ये सवाल

बहस की शुरुआत जीडीपी की पुरानी और नई गणना के बीच बड़े अंतर से हुई। गर्ग ने सवाल उठाया कि पहले जिस करंट प्राइस जीडीपी को करीब 86 लाख करोड़ रुपये बताया गया था, वह संशोधन के बाद करीब 80 लाख करोड़ रुपये कैसे रह गई। उनका कहना था कि करीब 6 लाख करोड़ रुपये का इतना बड़ा बदलाव सामान्य संशोधन मानकर छोड़ देना ठीक नहीं है। गर्ग ने कहा कि सरकार को इस बदलाव की वजह विस्तार से बतानी चाहिए। उनके मुताबिक, यह मामूली आंकड़ा नहीं है और इतनी बड़ी कटौती पर गंभीरता से जांच होनी चाहिए।

गर्ग ने दावा किया कि 2023-24 की करंट प्राइस जीडीपी में नए आंकड़ों के साथ करीब 6 से 6.5 लाख करोड़ रुपये का ऊपर की ओर संशोधन हुआ है। गर्ग ने कहा कि उन्होंने अपने लंबे करियर में इस तरह का बड़ा बदलाव पहले नहीं देखा।

बेस ईयर बदलने से आंकड़ों में क्यों आया बदलाव?

गौरव वल्लभ ने गर्ग की आपत्ति को अलग नजरिए से देखा। उन्होंने कहा कि जीडीपी का बेस ईयर बदलने का मतलब केवल कीमतों या महंगाई की गणना बदलना नहीं है। इसके साथ अर्थव्यवस्था को मापने का पूरा दायरा और डेटा का आधार भी बदल सकता है। वल्लभ के मुताबिक, नई गणना में अलग-अलग नए सर्वे, GST के आंकड़े, कंपनियों से मिलने वाला बेहतर डेटा और सरकारी रिकॉर्ड शामिल किए गए हैं। आर्थिक गतिविधियों के कवरेज में भी बदलाव हुआ है।

इसे समझाने के लिए उन्होंने फैक्ट्रियों का उदाहरण दिया। अगर नई गणना में कुछ ऐसी फैक्ट्रियां शामिल हो जाती हैं या बाहर हो जाती हैं, जो पुराने आंकड़ों में अलग तरीके से गिनी गई थीं, तो जीडीपी का आंकड़ा भी बदल सकता है। वल्लभ का कहना था कि यही वजह है कि पुराने 86 लाख करोड़ रुपये और नए 80 लाख करोड़ रुपये के आंकड़े को सीधे आमने-सामने रखकर तुलना करना सही तस्वीर नहीं देता। दोनों आंकड़े अलग सांख्यिकीय व्यवस्था के तहत तैयार किए गए हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि GDP के आंकड़े पहली गणना के बाद अंतिम नहीं माने जाते। समय के साथ नए आंकड़े मिलने पर इनमें कई बार संशोधन होता है। इसलिए शुरुआती आंकड़े देखकर तुरंत अंतिम निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।

गर्ग ने क्या दिया तर्क

गर्ग ने वल्लभ की दलील पर अपनी आपत्ति दोहराई। उनका कहना था कि उनकी चिंता करंट प्राइस जीडीपी को लेकर है, न कि बाद में डिफ्लेटर लगाकर निकाली जाने वाली रियल जीडीपी को लेकर। उन्होंने कहा कि यहां अंश और हर की गणना का सवाल नहीं है। उनका 2.6 फीसदी का हिसाब सरकार के पहले जारी किए गए करंट प्राइस जीडीपी आंकड़े पर आधारित था। गर्ग का तर्क था कि अगर सरकार का मौजूदा जीडीपी आंकड़ा ही काफी नीचे संशोधित हो गया है, तो उसके असर को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

इसके जवाब में वल्लभ ने कहा कि गर्ग की गणना में यह मान लिया गया है कि बेस ईयर बदलने के बावजूद आर्थिक गतिविधियों का कवरेज पहले जैसा ही रहा। जबकि नई पद्धति में यही हिस्सा बदला है। उनके मुताबिक, इसी बदलाव को नजरअंदाज करके 2.6 फीसदी ग्रोथ या शून्य वास्तविक वृद्धि जैसी तस्वीर पेश करना आंकड़ों की गलत व्याख्या होगी।

GDP की बहस पहुंची रोजगार के मुद्दे तक

गौरव वल्लभ ने अर्थव्यवस्था की मजबूती दिखाने के लिए कई आंकड़ों का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि निजी खपत में 7.1 फीसदी, ग्रॉस फिक्स्ड कैपिटल फॉर्मेशन में 11.9 फीसदी और रियल एक्सपोर्ट में 12 फीसदी की ग्रोथ दर्ज की गई है। उधर गर्ग ने रोजगार के आंकड़ों को लेकर ज्यादा सावधानी बरतने की बात कही। उनका कहना था कि रोजगार में बढ़ोतरी का एक बड़ा हिस्सा फैमिली बिजनेस में बिना वेतन काम करने वाले लोगों और एग्रिकल्चर सेक्टर से जुड़ा है। ऐसे रोजगार को सीधे अच्छी गुणवत्ता वाली नौकरियों की वृद्धि नहीं माना जा सकता। उन्होंने पढ़े-लिखे युवाओं में बेरोजगारी और लेबर फोर्स से बाहर रहने वाले लोगों को लेकर भी चिंता जताई। गर्ग ने रोजगार की स्थिति को न पूरी तरह अच्छी बताया और न पूरी तरह खराब। उनके मुताबिक तस्वीर के दोनों पहलू हैं।

एक तरफ गर्ग का सवाल है कि अगर करंट प्राइस जीडीपी में करीब 6 लाख करोड़ रुपये का इतना बड़ा बदलाव हुआ है, तो सरकार को इसकी स्पष्ट वजह बतानी चाहिए। दूसरी तरफ वल्लभ का कहना है कि बेस ईयर बदलने के साथ डेटा, सर्वे और आर्थिक गतिविधियों के कवरेज में बदलाव हुआ है। इसलिए नए और पुराने आंकड़ों को एक ही पैमाने पर रखकर देखना सही नहीं होगा।

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