गया में 1 मई को प्रस्तावित ‘संविधान सुरक्षा महारैली’ को लेकर आज पूर्व विधायक ने धरना दिया है। बुद्ध जयंती और मजदूर दिवस के दिन गांधी मैदान में महारैली आयोजित की गई है। इसको लेकर जिला प्रशासन से अनुमति नहीं मिली है। इसके विरोध में जैसे ही पूर्व विधायक सतीश दास आज आमरण अनशन पर बैठे, पुलिस ने उन्हें मौके से हिरासत में ले लिया। पहले समझाने की कोशिश हुई, फिर सीधे उठा कर करीब 55 किलोमीटर दूर गहलौर थाने पहुंचा दिया गया। मांग पर अड़े रहने पर पुलिस ने कार्रवाई की गांधी मैदान के गेट पर शुरू हुआ यह विरोध कुछ ही देर में प्रशासन बनाम आंदोलन की लड़ाई में बदल गया। डीएसपी टाउन-1 सरोज कुमार पुलिस बल के साथ मौके पर पहुंचे। सतीश दास को धरना खत्म करने को कहा गया। लेकिन पूर्व विधायक अपनी मांग पर अड़े रहे। इसके बाद पुलिस ने कार्रवाई की और उन्हें वहां से हटाकर गाड़ी में बैठा लिया। हिरासत के बाद उनके समर्थकों में भी नाराजगी दिखी। गहलौर थाने से दैनिक भास्कर से फोन पर बातचीत में सतीश दास ने जिला प्रशासन पर सीधा हमला बोला। उन्होंने कहा- गया में भारत का संविधान लागू नहीं है। संविधान ने जो अधिकार दिए हैं, प्रशासन उन्हें कुचल रहा है। न ही कार्यक्रम करने दिया जा रहा, न शांतिपूर्ण धरना करने के लिए दिया जा रहा है। प्रशासन ने गर्मी-लू का दिया हवाला दरअसल अंबेडकर संघर्ष मोर्चा और महाबोधि महाविहार संघर्ष समिति ने 1 मई को गांधी मैदान में ‘संविधान बचाव’ कार्यक्रम के लिए अनुमति मांगी थी। लेकिन प्रशासन ने इजाजत देने से इनकार कर दिया। प्रशासन की ओर से गर्मी, लू, सुरक्षा व्यवस्था और वीआईपी मूवमेंट को कारण बताया गया। एसडीएम अनिल कुमार रमण के मुताबिक, 1 मई को मुख्यमंत्री का गया दौरा प्रस्तावित है। बड़ी संख्या में मजिस्ट्रेट और पुलिस बल उनकी सुरक्षा व्यवस्था में लगाए जाएंगे। साथ ही कई पुलिसकर्मी दूसरे राज्यों में चुनाव ड्यूटी पर हैं। ऐसे में किसी नए बड़े आयोजन को अनुमति देना फिलहाल संभव नहीं है। प्रशासन ने साफ किया कि केवल बुद्ध जयंती से जुड़े पहले निर्धारित कार्यक्रमों को ही मंजूरी दी गई है। नए आयोजन की अनुमति नहीं है। लेकिन सतीश दास और उनके संगठन इसे सिर्फ प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकारों पर रोक बता रहे हैं। उनका आरोप है कि संविधान और सामाजिक न्याय के नाम पर होने वाली आवाज को दबाया जा रहा है। गयाजी में अब यह मामला सिर्फ एक कार्यक्रम की अनुमति तक सीमित नहीं दिख रहा। सवाल यह खड़ा हो गया है कि सुरक्षा और प्रशासनिक मजबूरी के नाम पर क्या विरोध और लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति को रोका जा सकता है। गया में 1 मई को प्रस्तावित ‘संविधान सुरक्षा महारैली’ को लेकर आज पूर्व विधायक ने धरना दिया है। बुद्ध जयंती और मजदूर दिवस के दिन गांधी मैदान में महारैली आयोजित की गई है। इसको लेकर जिला प्रशासन से अनुमति नहीं मिली है। इसके विरोध में जैसे ही पूर्व विधायक सतीश दास आज आमरण अनशन पर बैठे, पुलिस ने उन्हें मौके से हिरासत में ले लिया। पहले समझाने की कोशिश हुई, फिर सीधे उठा कर करीब 55 किलोमीटर दूर गहलौर थाने पहुंचा दिया गया। मांग पर अड़े रहने पर पुलिस ने कार्रवाई की गांधी मैदान के गेट पर शुरू हुआ यह विरोध कुछ ही देर में प्रशासन बनाम आंदोलन की लड़ाई में बदल गया। डीएसपी टाउन-1 सरोज कुमार पुलिस बल के साथ मौके पर पहुंचे। सतीश दास को धरना खत्म करने को कहा गया। लेकिन पूर्व विधायक अपनी मांग पर अड़े रहे। इसके बाद पुलिस ने कार्रवाई की और उन्हें वहां से हटाकर गाड़ी में बैठा लिया। हिरासत के बाद उनके समर्थकों में भी नाराजगी दिखी। गहलौर थाने से दैनिक भास्कर से फोन पर बातचीत में सतीश दास ने जिला प्रशासन पर सीधा हमला बोला। उन्होंने कहा- गया में भारत का संविधान लागू नहीं है। संविधान ने जो अधिकार दिए हैं, प्रशासन उन्हें कुचल रहा है। न ही कार्यक्रम करने दिया जा रहा, न शांतिपूर्ण धरना करने के लिए दिया जा रहा है। प्रशासन ने गर्मी-लू का दिया हवाला दरअसल अंबेडकर संघर्ष मोर्चा और महाबोधि महाविहार संघर्ष समिति ने 1 मई को गांधी मैदान में ‘संविधान बचाव’ कार्यक्रम के लिए अनुमति मांगी थी। लेकिन प्रशासन ने इजाजत देने से इनकार कर दिया। प्रशासन की ओर से गर्मी, लू, सुरक्षा व्यवस्था और वीआईपी मूवमेंट को कारण बताया गया। एसडीएम अनिल कुमार रमण के मुताबिक, 1 मई को मुख्यमंत्री का गया दौरा प्रस्तावित है। बड़ी संख्या में मजिस्ट्रेट और पुलिस बल उनकी सुरक्षा व्यवस्था में लगाए जाएंगे। साथ ही कई पुलिसकर्मी दूसरे राज्यों में चुनाव ड्यूटी पर हैं। ऐसे में किसी नए बड़े आयोजन को अनुमति देना फिलहाल संभव नहीं है। प्रशासन ने साफ किया कि केवल बुद्ध जयंती से जुड़े पहले निर्धारित कार्यक्रमों को ही मंजूरी दी गई है। नए आयोजन की अनुमति नहीं है। लेकिन सतीश दास और उनके संगठन इसे सिर्फ प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकारों पर रोक बता रहे हैं। उनका आरोप है कि संविधान और सामाजिक न्याय के नाम पर होने वाली आवाज को दबाया जा रहा है। गयाजी में अब यह मामला सिर्फ एक कार्यक्रम की अनुमति तक सीमित नहीं दिख रहा। सवाल यह खड़ा हो गया है कि सुरक्षा और प्रशासनिक मजबूरी के नाम पर क्या विरोध और लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति को रोका जा सकता है।


