MSP नहीं मिलने से बिहार के किसानों को नुकसान:300 रुपए प्रति क्विंटल कम कीमत मिली, सुधाकर सिंह ने लाइव वीडियो जारी कर जताई चिंता

MSP नहीं मिलने से बिहार के किसानों को नुकसान:300 रुपए प्रति क्विंटल कम कीमत मिली, सुधाकर सिंह ने लाइव वीडियो जारी कर जताई चिंता

राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के नेता सुधाकर सिंह ने शुक्रवार सुबह एक लाइव वीडियो जारी कर बिहार के किसानों की बदहाली पर चिंता जताई। उन्होंने न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर फसलों की खरीद न होने को लेकर केंद्र और राज्य सरकारों पर गंभीर सवाल उठाए। सिंह ने आरोप लगाया कि गेहूं और मक्का की सरकारी खरीद नहीं होने से किसानों को इस साल भारी आर्थिक नुकसान हुआ है। सुधाकर सिंह ने याद दिलाया कि 2025 के विधानसभा चुनाव के समय भाजपा और एनडीए सहित लगभग सभी राजनीतिक दलों ने किसानों से वादा किया था। इन वादों में सरकार बनने पर गेहूं, मक्का, दलहन, धान और तिलहन जैसी फसलों पर एमएसपी की गारंटी देना शामिल था। किसानों को 6 माह बाद भी नहीं मिला लाभ हालांकि, उनके अनुसार, सरकार बने लगभग छह महीने बीत चुके हैं, लेकिन किसानों को इन वादों का लाभ नहीं मिला है। उन्होंने मौजूदा खरीद व्यवस्था पर भी सवाल उठाए। सिंह ने कहा कि धान की खरीद भी इसी सरकार के कार्यकाल में हुई थी, और अब गेहूं व मक्का का सीजन चल रहा है, लेकिन खरीद प्रणाली पूरी तरह से अव्यवस्थित है। उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा कि पिछले छह महीनों से बिहार की राजनीति में उथल-पुथल जारी है, और भाजपा के मुख्यमंत्री बने भी 20-25 दिन हो चुके हैं, फिर भी किसानों की समस्याओं पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। 70 लाख मीट्रिक टन गेहूं का उत्पाद सिंह ने बताया कि मौसम की चुनौतियों के बावजूद बिहार के किसानों ने इस साल लगभग 70 लाख मीट्रिक टन गेहूं और 40 लाख मीट्रिक टन मक्का का उत्पादन किया। उन्होंने उल्लेख किया कि केंद्र सरकार ने गेहूं का एमएसपी 2585 रुपए प्रति क्विंटल घोषित किया था, लेकिन किसानों को खुले बाजार में इससे लगभग 300 रुपए प्रति क्विंटल कम कीमत मिली। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि भारत सरकार की अमेरिका और यूरोप के साथ हुई व्यापारिक डील के कारण बाजार में सस्ते विदेशी गेहूं आने की आशंका बढ़ गई है। इस वजह से स्थानीय व्यापारियों ने किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य नहीं दिया। सुधाकर सिंह के अनुसार, केवल इस वर्ष गेहूं की फसल में किसानों को लगभग 21 करोड़ रुपए और मक्का की फसल में 45 करोड़ रुपए का अनुमानित नुकसान हुआ है। डेढ़ लाख करोड़ रुपए का घाटा सांसद ने कहा कि MSP लागू नहीं होने से बिहार के किसानों को हर साल करीब डेढ़ लाख करोड़ रुपए का घाटा हो रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार अपने GDP के आंकड़ों में फसलों का मूल्य MSP के आधार पर जोड़ देती है, जबकि वास्तविकता में किसानों को वह कीमत नहीं मिलती। इससे बिहार की अर्थव्यवस्था की सही तस्वीर सामने नहीं आ पाती। उन्होंने कहा कि गेहूं, मक्का और धान की खरीद की जिम्मेदारी फूड मंत्रालय की होती है, लेकिन लंबे समय से यह विभाग एनडीए के पास रहने के बावजूद किसानों की स्थिति में सुधार नहीं हुआ। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि किसानों को MSP नहीं मिला तो खेती घाटे का सौदा बन जाएगी और पलायन और तेजी से बढ़ेगा। मंडी कानून और MSP व्यवस्था लागू सुधाकर सिंह ने दावा किया कि 2005 में बिहार से पलायन करने वालों की संख्या करीब सवा करोड़ थी, जब मंडी कानून और MSP व्यवस्था लागू थी। लेकिन 2006 में मंडी कानून समाप्त होने और MSP व्यवस्था कमजोर पड़ने के बाद पलायन बढ़कर लगभग तीन करोड़ तक पहुंच गया। उन्होंने कहा कि बिहार में मतदान प्रतिशत कम होने का एक बड़ा कारण भी पलायन है। अंत में उन्होंने कहा कि किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत किए बिना पलायन नहीं रोका जा सकता और खरीद प्रणाली में पारदर्शिता लानी होगी। साथ ही उन्होंने संकेत दिया कि भविष्य में बिहार में जमीन से जुड़े “लैंड पूलिंग” मुद्दे पर भी विस्तार से चर्चा करेंगे। राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के नेता सुधाकर सिंह ने शुक्रवार सुबह एक लाइव वीडियो जारी कर बिहार के किसानों की बदहाली पर चिंता जताई। उन्होंने न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर फसलों की खरीद न होने को लेकर केंद्र और राज्य सरकारों पर गंभीर सवाल उठाए। सिंह ने आरोप लगाया कि गेहूं और मक्का की सरकारी खरीद नहीं होने से किसानों को इस साल भारी आर्थिक नुकसान हुआ है। सुधाकर सिंह ने याद दिलाया कि 2025 के विधानसभा चुनाव के समय भाजपा और एनडीए सहित लगभग सभी राजनीतिक दलों ने किसानों से वादा किया था। इन वादों में सरकार बनने पर गेहूं, मक्का, दलहन, धान और तिलहन जैसी फसलों पर एमएसपी की गारंटी देना शामिल था। किसानों को 6 माह बाद भी नहीं मिला लाभ हालांकि, उनके अनुसार, सरकार बने लगभग छह महीने बीत चुके हैं, लेकिन किसानों को इन वादों का लाभ नहीं मिला है। उन्होंने मौजूदा खरीद व्यवस्था पर भी सवाल उठाए। सिंह ने कहा कि धान की खरीद भी इसी सरकार के कार्यकाल में हुई थी, और अब गेहूं व मक्का का सीजन चल रहा है, लेकिन खरीद प्रणाली पूरी तरह से अव्यवस्थित है। उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा कि पिछले छह महीनों से बिहार की राजनीति में उथल-पुथल जारी है, और भाजपा के मुख्यमंत्री बने भी 20-25 दिन हो चुके हैं, फिर भी किसानों की समस्याओं पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। 70 लाख मीट्रिक टन गेहूं का उत्पाद सिंह ने बताया कि मौसम की चुनौतियों के बावजूद बिहार के किसानों ने इस साल लगभग 70 लाख मीट्रिक टन गेहूं और 40 लाख मीट्रिक टन मक्का का उत्पादन किया। उन्होंने उल्लेख किया कि केंद्र सरकार ने गेहूं का एमएसपी 2585 रुपए प्रति क्विंटल घोषित किया था, लेकिन किसानों को खुले बाजार में इससे लगभग 300 रुपए प्रति क्विंटल कम कीमत मिली। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि भारत सरकार की अमेरिका और यूरोप के साथ हुई व्यापारिक डील के कारण बाजार में सस्ते विदेशी गेहूं आने की आशंका बढ़ गई है। इस वजह से स्थानीय व्यापारियों ने किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य नहीं दिया। सुधाकर सिंह के अनुसार, केवल इस वर्ष गेहूं की फसल में किसानों को लगभग 21 करोड़ रुपए और मक्का की फसल में 45 करोड़ रुपए का अनुमानित नुकसान हुआ है। डेढ़ लाख करोड़ रुपए का घाटा सांसद ने कहा कि MSP लागू नहीं होने से बिहार के किसानों को हर साल करीब डेढ़ लाख करोड़ रुपए का घाटा हो रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार अपने GDP के आंकड़ों में फसलों का मूल्य MSP के आधार पर जोड़ देती है, जबकि वास्तविकता में किसानों को वह कीमत नहीं मिलती। इससे बिहार की अर्थव्यवस्था की सही तस्वीर सामने नहीं आ पाती। उन्होंने कहा कि गेहूं, मक्का और धान की खरीद की जिम्मेदारी फूड मंत्रालय की होती है, लेकिन लंबे समय से यह विभाग एनडीए के पास रहने के बावजूद किसानों की स्थिति में सुधार नहीं हुआ। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि किसानों को MSP नहीं मिला तो खेती घाटे का सौदा बन जाएगी और पलायन और तेजी से बढ़ेगा। मंडी कानून और MSP व्यवस्था लागू सुधाकर सिंह ने दावा किया कि 2005 में बिहार से पलायन करने वालों की संख्या करीब सवा करोड़ थी, जब मंडी कानून और MSP व्यवस्था लागू थी। लेकिन 2006 में मंडी कानून समाप्त होने और MSP व्यवस्था कमजोर पड़ने के बाद पलायन बढ़कर लगभग तीन करोड़ तक पहुंच गया। उन्होंने कहा कि बिहार में मतदान प्रतिशत कम होने का एक बड़ा कारण भी पलायन है। अंत में उन्होंने कहा कि किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत किए बिना पलायन नहीं रोका जा सकता और खरीद प्रणाली में पारदर्शिता लानी होगी। साथ ही उन्होंने संकेत दिया कि भविष्य में बिहार में जमीन से जुड़े “लैंड पूलिंग” मुद्दे पर भी विस्तार से चर्चा करेंगे।  

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