Delhi में कड़ी सुरक्षा और बैरिकेडिंग के बीच जंतर-मंतर पहुंचे प्रदर्शनकारी, पुलिस ने कई को हिरासत में लिया

Delhi में कड़ी सुरक्षा और बैरिकेडिंग के बीच जंतर-मंतर पहुंचे प्रदर्शनकारी, पुलिस ने कई को हिरासत में लिया

राष्ट्रीय राजधानी में बड़ी संख्या में सुरक्षाकर्मियों की तैनाती, बेरिकेड लगाने और मार्ग परिवर्तन किए जाने के बावजूद शनिवार को प्रदर्शनकारी अलग-अलग तरह से मध्य दिल्ली स्थित प्रदर्शन स्थल की ओर बढ़ने का प्रयास करते दिखे। किसी ने स्कूटी से दो घंटे का सफर किया तो कोई ऑटो से आने के बाद निजामुद्दीन से पैदल लंबी दूरी तय करके आया। कई लोग कैब में चक्कर काटने के बाद आखिरकार प्रदर्शन स्थल के पास उतर जाने में कामयाब हुए।

नयी दिल्ली की ओर जाने वाली सड़कों पर बैरिकेड लगाए जाने, वाहनों को रोके जाने या उनका मार्ग बदले जाने और मेट्रो के कई स्टेशन बंद होने के कारण कई लोगों के लिए जंतर-मंतर स्थित प्रदर्शन स्थल तक पहुंचना मुश्किल साबित हुआ। शहर के कुछ हिस्सों में बसें चलती रहीं, लेकिन नयी दिल्ली के कई इलाकों में वाहनों को प्रवेश की अनुमति नहीं दी गई। टॉलस्टॉय मार्ग पर, जहां जंतर-मंतर की ओर जाने वाली सड़क पर बैरिकेड लगाए गए थे, वहां तक पहुंचने में सफल रहे प्रदर्शनकारियों का एक समूह खड़ा था और बीच-बीच में नारे लगा रहा था।

पुलिसकर्मी जब उन्हें हिरासत में लेने के लिए आगे बढ़े तो कुछ लोगों ने भागने की कोशिश की, लेकिन उन्हें पकड़ लिया गया और फिर से हिरासत में लेने की कार्रवाई शुरू हो गई। सरिता विहार से स्कूटी पर आए मीर ने बताया कि उन्हें सफर में दो घंटे लगे और उन्हें प्रदर्शन स्थल से करीब तीन किलोमीटर दूर अपना वाहन खड़ा करना पड़ा। उन्होंने पाबंदियों के बावजूद वहां पहुंचने के अपने प्रयास के बारे में कहा, ‘‘हम इस देश के युवा हैं।

अगर हम नहीं आएंगे, तो कौन आएगा?’’
दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा सफहाना ने बताया कि वह लक्ष्मी नगर में रहती हैं और सुबह करीब छह बजे ऑटो से इस इलाके में पहुंचीं। उनके पास खाने-पीने का सामान और अन्य जरूरी चीजें थीं। छात्रा ने बताया कि वह आठ अन्य लोगों के साथ आई थीं।

उनके समूह की तीन महिलाओं को हिरासत में ले लिया गया। सफहाना ने कहा कि वे उन महिलाओं से संपर्क करने में कामयाब रहीं, लेकिन उन्हें यह पता नहीं था कि उन्हें किस थाने ले जाया गया है। जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय का छात्र होने का दावा करने वाले अल्तमस ने बताया कि वह ऑटो से संकरी गलियों से होते हुए आए और उन्हें निजामुद्दीन के पास उतार दिया गया।

वहां से उन्होंने प्रदर्शन स्थल तक पहुंचने के लिए करीब दो घंटे पैदल सफर किया। उन्होंने कहा, ‘‘ब्रिटिश शासन के दौरान हमने दमन के बारे में पढ़ा था। आज हम देख रहे हैं कि यह कितना दमनकारी हो सकता है।’’
अल्तमस ने कहा कि वह अपने लिए नहीं, बल्कि देश के लिए आए हैं।

इस दौरान उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के इस कथन का उल्लेख किया कि ‘‘सरकारें आएंगी और जाएंगी, लेकिन देश बना रहना चाहिए।’’
इक्कीस वर्षीय हर्षित व्यक्तिगत कारण से भी प्रदर्शन में शामिल हुए। हर्षित ने बताया कि उन्होंने मतदाता पहचान पत्र के लिए आवेदन किया था, लेकिन उन्हें बताया गया कि पते से जुड़ी समस्या के कारण वोटर कार्ड नहीं मिल सकता। हर्षित ने अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के नजदीक से कैब ली, लेकिन चालक ने कई रास्ते बदलने के बाद आखिरकार उन्हें प्रदर्शन स्थल के पास पहुंचाया।

हर्षित ने बताया कि चालक ने तत्काल किराया नहीं लिया और उनसे घर पहुंचने के बाद भुगतान करने को कहा। प्रदर्शनकारियों को वहां से हटाए जाने का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, ‘‘हम शांतिपूर्वक बैठे थे, लेकिन हमें वहां से हटने के लिए कहा गया।’’
पाबंदियों का असर उन लोगों पर भी पड़ा, जो प्रदर्शन में शामिल नहीं थे। एमटीएनएल में काम करने वाली एक महिलाकर्मी ने बताया कि उन्हें अपने कार्यस्थल तक पहुंचने के लिए नयी दिल्ली रेलवे स्टेशन से पैदल चलना पड़ा।

महीने का दूसरा शनिवार होने के कारण उनकी ड्यूटी थी और उन्हें आवश्यक सेवाओं से जुड़ा काम करने के लिए कार्यालय पहुंचना था। उन्होंने बताया कि नयी दिल्ली रेलवे स्टेशन से करीब डेढ़ से दो किलोमीटर पैदल चलकर वह जनपथ और कनॉट प्लेस के चौराहे पर पहुंचीं, जहां उन्हें रोक दिया गया। हालांकि, बाद में उन्हें आगे जाने की अनुमति दे दी गई।

कनॉट प्लेस पहुंचे पुणे के फिल्म निर्माता नीलेश नवलखा ने बताया कि वह दिल्ली इसलिए आए थे, क्योंकि उन्हें लगा कि उन्हें इस ‘‘ऐतिहासिक’’ घटना का प्रत्यक्षदर्शी बनना चाहिए। शुक्रवार शाम दिल्ली पहुंचे और एक होटल में ठहरे नवलखा ने बताया कि वह छह जून को हुए प्रदर्शन में भी शामिल हुए थे। उन्होंने कहा, ‘‘उस दिन और आज के माहौल में अंतर है।

पिछली सफलता के बाद लोग उत्साहित हैं। सरकार सख्त है।’’
मध्य दिल्ली पहुंचे सभी लोग किसी संगठित समूह या राजनीतिक संगठन से जुड़े हुए नहीं थे। सूरज ने बताया कि वह अपने पिता के साथ आए थे, जिन्होंने उस दिन अपनी दुकान बंद रखी थी।

नरेला से मोटरसाइकिल पर आए लखन ने बताया कि वह अपनी मां को काम पर छोड़ने के बाद सुबह कनॉट प्लेस पहुंचा। उन्होंने कहा कि रास्ते में उन्होंने बड़े वाहनों की आवाजाही पर पाबंदियां देखीं। लखन ने कहा, ‘‘मैं न तो कॉजपा के साथ हूं और न ही भाजपा के साथ।

सवाल यह है कि जब लोग अपनी आवाज उठाते हैं, तो उन्हें क्या जवाब दिया जाता है?’’
उन्होंने कहा, ‘‘जनता भूखी है। उसके सवालों का जवाब दीजिए।

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