CEA V Anantha Nageswaran ने MSME के लिए RBI के NPA नियमों की समीक्षा की मांग की

CEA V Anantha Nageswaran ने MSME के लिए RBI के NPA नियमों की समीक्षा की मांग की

(फाइल फोटो के साथ)
नयी दिल्ली, नौ अक्टूबर मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन ने शुक्रवार को भारतीय रिजर्व बैंक से सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्यमों (एमएसएमई) के लिए गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (एनपीए) के वर्गीकरण संबंधी नियमों पर फिर से विचार करने की वकालत की। उन्होंने कहा कि इन नियमों को वैश्विक स्तर पर एक समान व्यवस्था के अनुरूप बनाने के बजाय देश की कारोबारी परंपराओं और नकदी प्रवाह के तौर-तरीकों के अनुरूप बनाया जाना चाहिए। नागेश्वरन ने कहा कि नीतिगत स्तर पर वित्त मंत्रालय इन मानदंडों की समीक्षा की वकालत करता रहा है।

विभिन्न क्षेत्रों में काम करने वाले एमएसएमई की कार्यशील पूंजी की जरूरतें और नकदी प्रवाह की स्थिति अलग-अलग होती हैं। मौजूदा व्यवस्था के तहत, बकाया भुगतान की अवधि के आधार पर कर्ज को विशेष उल्लेख खातों (एसएमए) के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। इसकी श्रेणियां 30 दिन, 60 दिन और 90 दिन के बकाया भुगतान के अनुरूप हैं।

आम तौर पर, यदि ब्याज या मूलधन का भुगतान 90 दिन से अधिक समय तक बकाया रहता है तो खाते को गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (एनपीए) यानी फंसा कर्ज घोषित कर दिया जाता है। सीईए ने कहा कि एसएमए श्रेणी में आने से ही कर्ज लेने वालों पर गंभीर असर पड़ सकता है। कारोबारियों को औपचारिक रूप से एनपीए घोषित किए जाने से पहले ही मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है।

नागेश्वरन ने यहां सा-धन द्वारा आयोजित समावेशी वृद्धि पर 21वें राष्ट्रीय सम्मेलन में कहा, ‘‘जैसे ही किसी खाते को एसएमए के रूप में वर्गीकृत किया जाता है, वह कानूनी रूप से नहीं तो व्यवहार में लगभग उसी स्थिति में पहुंच जाता है।’’
उन्होंने कहा कि वैश्विक स्तर पर एक समान मानक अपनाने के बजाय ऐसे मानदंड विकसित किए जाने चाहिए, जो भारत में कारोबार करने के तौर-तरीकों और एमएसएमई के नकदी प्रवाह के स्वरूप के अनुरूप हों। सीईए ने कहा, ‘‘हमें वैश्विक स्तर पर एक समान व्यवस्था अपनाने के बजाय ऐसे मानदंड विकसित करने होंगे, जो हमारी कारोबारी गतिविधियों और नकदी प्रवाह के स्वरूप के अनुरूप हों। एमएसएमई क्षेत्र के लिए हमें ऐसे ही कुछ कदम उठाने होंगे, क्योंकि यह बड़े पैमाने पर रोजगार देता है।’’
कारोबार सुगमता के बारे में नागेश्वरन ने कहा कि इसका असर बड़े कारोबारों के मुकाबले एमएसएमई पर अधिक पड़ता है।

उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार मंत्रिमंडल सचिव के नेतृत्व में पिछले करीब दो वर्षों से एमएसएमई के लिए जमीनी स्तर पर नियमों में ढील देने की दिशा में भी काम कर रही है। छोटे कारोबारों पर नियमों के अनुपालन का असमान रूप से अधिक बोझ पड़ता है। यह बोझ धन और समय, दोनों के रूप में होता है।

इसे कम करने से वे अपने सीमित संसाधनों और समय का इस्तेमाल कारोबार चलाने तथा अधिक लोगों को रोजगार देने में कर सकेंगे। इससे जमीनी स्तर पर रोजगार पैदा होगा और ठोस लाभ मिलेंगे। नागेश्वरन ने सुझाव दिया कि एमएसएमई की वृद्धि की व्यापक रणनीति में नियमों में ढील देने, कौशल विकास, व्यापार समझौतों का अधिक उपयोग करने और विभिन्न राज्यों की विशिष्ट जरूरतों तथा परिस्थितियों के अनुरूप विकास के अलग-अलग मॉडल अपनाने पर ध्यान दिया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा, ‘‘हमें उन व्यापार समझौतों का पूरा लाभ उठाना होगा, जिन पर हम हस्ताक्षर कर रहे हैं। अच्छी खबर यह है कि ब्रिटेन के साथ समझौते और यूरोपीय संघ के साथ समझौते, जो दो महीने में लागू होने वाला है, दोनों से भारतीय वस्तुओं और सेवाओं के लिए इन बाजारों तक पहुंचने की व्यापक संभावनाएं बनती हैं। हमें इसका लाभ उठाने के लिए हर संभव प्रयास करना होगा।’’
छोटी राशि के कर्ज देने वाले संस्थानों के बारे में नागेश्वरन ने कहा कि उन्हें खासकर कृत्रिम मेधा (एआई) प्रौद्योगिकी के बढ़ते इस्तेमाल और डिजिटल माध्यमों से बिक्री के दौर में जरूरत से ज्यादा कर्ज देने से बचना चाहिए।

उन्होंने कहा, ‘‘मेरे विचार से वित्त के नजरिये से प्राथमिकता बचत, बीमा और उसके बाद ऋण को दी जानी चाहिए। इस क्षेत्र में आम तौर पर इसका उलटा क्रम अपनाया गया है, जो सही नहीं है। इसके बाद जरूरत से ज्यादा कर्ज देने और गलत तरीके से उत्पाद बेचने के मामले भी बार-बार सामने आए हैं।

इससे बचना चाहिए।’’
मुख्य आर्थिक सलाहकार ने कृत्रिम मेधा (एआई) के बढ़ते उपयोग के साथ कामगारों के कौशल को बेहतर बनाने की जरूरत पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा, ‘‘एआई शायद हमें यह एहसास करा दे कि इस देश में श्रम की उपलब्धता और अनुकूल जनसांख्यिकीय स्थिति को देखते हुए हमारी कुशलता और ताकत श्रम-प्रधान विकास में है।

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