Cancer Drugs के दाम घटे, Jan Swasthya Abhiyan ने मुनाफे पर सीमा तय करने को कहा

Cancer Drugs के दाम घटे, Jan Swasthya Abhiyan ने मुनाफे पर सीमा तय करने को कहा

कैंसर का इलाज कराने वाले मरीजों के लिए राहत की खबर है। भारत में कई कैंसर की दवाओं की कीमतें 9 नवंबर से काफी कम होने जा रही हैं। कुछ दवाओं के दाम में 90% से ज्यादा की कटौती की गई है। हालांकि, जन स्वास्थ्य अभियान भारत का कहना है कि केवल दवाओं की अधिकतम कीमत घटाने से कैंसर का इलाज हर मरीज की पहुंच में नहीं आ सकता। इसके लिए दवाओं की कीमतों पर लंबे समय तक निगरानी और मुनाफे की सीमा तय करना भी जरूरी है।

राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) ने 28 अक्टूबर को कैंसर की 543 दवा ब्रांडों की अधिकतम खुदरा कीमतों की नई सूची जारी की है। यह कदम 137 ऐसी कैंसर दवाओं पर लागू व्यापार मार्जिन को नियंत्रित करने की नीति के तहत उठाया गया है, जिनकी कीमतें पहले तय सरकारी सीमा के दायरे में नहीं थीं। सरकार का कहना है कि इस फैसले का मकसद दवाओं की बिक्री के दौरान होने वाले अधिक मुनाफे पर रोक लगाना और मरीजों को इलाज सस्ते में उपलब्ध कराना है।

नई सूची में कुछ दवाओं की कीमतों में बड़ी गिरावट देखने को मिली है। मौजूद जानकारी के अनुसार, स्तन कैंसर के कुछ प्रकारों के इलाज में इस्तेमाल होने वाली पाल्बोसिक्लिब दवा के एक ब्रांड के 21 कैप्सूल वाले पैक की कीमत 40,421.33 रुपये से घटाकर 2,720 रुपये कर दी गई है। इसी तरह, थायोटेपा दवा की 100 मिलीग्राम वाली एक शीशी की कीमत 80,071.86 रुपये से कम होकर 7,150.33 रुपये रह गई है। नई कीमतें 9 नवंबर से लागू होंगी।

गौरतलब है कि कैंसर के इलाज में मरीजों को अक्सर लंबे समय तक दवाएं लेनी पड़ती हैं। ऐसे में दवाओं की कीमत में थोड़ी सी कमी भी परिवार के कुल खर्च पर असर डाल सकती है। लेकिन जेएसए इंडिया ने सवाल उठाया है कि क्या एक बार कीमत घटाने से मरीजों को लगातार राहत मिल पाएगी।

संगठन के मुताबिक, अगर दवाओं पर मुनाफे की सीमा स्थायी रूप से तय नहीं की जाती और नियमों का नियमित पालन नहीं कराया जाता, तो आने वाले समय में कीमतें फिर बढ़ सकती हैं। संगठन ने यह भी कहा कि नई नीति के तहत दवा वितरकों को मिलने वाली कीमत यानी स्टॉकिस्ट को बिक्री मूल्य के ऊपर 42.8% तक अतिरिक्त मार्जिन की अनुमति देना सही नहीं है। उसका तर्क है कि दवाओं की आपूर्ति में कई बार केवल 1 या 2 बिचौलिये होते हैं या कंपनियां सीधे अस्पतालों को दवाएं बेचती हैं। ऐसे में इतना अधिक मार्जिन मरीजों पर अनावश्यक आर्थिक बोझ डाल सकता है।

जेएसए इंडिया ने सुझाव दिया है कि निर्धारित दवाओं पर लागू दवा मूल्य नियंत्रण आदेश के तहत मिलने वाले 16% मार्जिन के करीब की सीमा तय की जाती, तो मरीजों को ज्यादा बचत हो सकती थी।

संगठन ने यह भी ध्यान दिलाया है कि कुछ महंगी पेटेंट वाली कैंसर दवाओं की कीमतों में इस सूची के तहत राहत नहीं मिली है। इससे पता चलता है कि केवल बिक्री के दौरान मिलने वाले मुनाफे को सीमित करना पर्याप्त नहीं है। दवा की मूल कीमत पर भी ध्यान देना जरूरी है। इसके अलावा, मरीज सहायता कार्यक्रमों के तहत मुफ्त दी जाने वाली दवाओं को कीमत तय करने की गणना से बाहर रखने पर भी संगठन ने आपत्ति जताई है।

जेएसए इंडिया ने मांग की है कि दवा कंपनियों की ओर से बताई गई नई कीमतों की स्वतंत्र जांच हो और मरीज सहायता योजनाओं, मुफ्त दवाओं तथा छूट की नियमित समीक्षा की जाए। संगठन का कहना है कि जीवन बचाने वाली दवाओं की कीमत मरीज की आर्थिक स्थिति के बजाय उसकी चिकित्सा जरूरत के आधार पर तय होनी चाहिए और इसके लिए मजबूत नियम जरूरी हैं।

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