‘स्टील फ्रेम’ का आह्वान, आदर्शों की तरफ लौटें

‘स्टील फ्रेम’ का आह्वान, आदर्शों की तरफ लौटें

डॉ. आलोक त्रिपाठी कुलगुरु, सरदार पटेल पुलिस विश्वविद्यालय – 21 अप्रेल केवल तिथि नहीं, बल्कि भारतीय प्रशासनिक चेतना का दर्पण है। इस दिन को हम ‘सिविल सेवा दिवस’ के रूप में मनाते है तथा उस संकल्प का स्मरण करते हैं, जिसने स्वतंत्र भारत के निर्माण में अदृश्य किन्तु अटूट रीढ़ का कार्य किया। सरदार पटेल ने 21 अप्रेल 1947 को आइएएस के पहले बैच को संबोधित कर भारतीय प्रशासनिक सेवा को ‘स्टील फ्रेम’ (इस्पाती ढांचा) कहा था। उन्होंने इसे देश की प्रशासनिक एकता, स्थिरता और अखंडता को बनाए रखने वाली एक मजबूत रीढ़ माना था, जो राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्र सेवा करे। पटेल का मानना था कि सरकारें बदल सकती हैं, लेकिन प्रशासन को देश की सेवा में अटल रहना चाहिए, जैसे कोई ‘स्टील फ्रेम’।

स्वतंत्रता के उन प्रारंभिक क्षणों में, जब विभाजन की पीड़ा, विस्थापन की वेदना और सैकड़ों रियासतों के विखंडित स्वार्थ भारत की एकता को चुनौती दे रहे थे, तब सरदार पटेल ने केवल राजनीतिक दूरदर्शिता ही नहीं दिखाई, बल्कि प्रशासनिक आत्मा का भी सृजन किया। सरदार पटेल की दृष्टि में लोक सेवक वह था, जो सत्ता का उपभोग नहीं करता, बल्कि उसे जनकल्याण की साधना में रूपांतरित करता है। वह शासक नहीं, सेवक है। आज जब हम इस दिवस के दर्पण में स्वयं को देखते हैं, तो क्या वही तेज, वही तप, वही निष्ठा दृष्टिगोचर होती है? यह प्रश्न असहज कर सकता है, किन्तु अनिवार्य भी है। समय के प्रवाह में, जैसे किसी स्वच्छ सरिता में अवांछित तत्व घुलने लगते हैं, वैसे ही हमारे प्रशासनिक तंत्र में भी कुछ विकृतियां प्रवेश कर गई हैं। पिछले कुछ वर्षों में अनेक ऐसे प्रसंग सामने आए हैं जहां लोक सेवकों की निष्पक्षता, उनकी ईमानदारी और उनकी प्रतिबद्धता पर प्रश्नचिह्न लगा है। कुछ अधिकारी, जो जनसेवा के व्रतधारी होने चाहिए थे, वे निजी लाभ, सत्ता के दबाव या प्रलोभनों के जाल में उलझते हुए दिखाई दिए। यह उस आदर्श का क्षरण है, जिसे कभी राष्ट्र की आत्मा माना गया था। इसलिए, ‘सिविल सेवा दिवस’ केवल उत्सव का न होकर आत्ममंथन का दिवस होना चाहिए। यह वह समय है जब प्रत्येक लोक सेवक को स्वयं से प्रश्न करना चाहिए कि क्या मैं उस आदर्श के अनुरूप हूं जिसकी अपेक्षा मुझसे की गई थी? क्या मेरे निर्णयों में जनहित सर्वोपरि है? क्या मैं सत्ता के निर्देशों को केवल यंत्रवत पालना के रूप में देखता हूं या जनकल्याण के साधन के रूप में?

जनता का जीवन केवल नीतियों और योजनाओं से नहीं बदलता। वह बदलता है नीतियों के क्रियान्वयन से। क्रियान्वयन का दायित्व उन्हीं कंधों पर है, जिन्हें हमने प्रशासनिक सेवा कहा है। यदि कोई योजना कागज पर ही सीमित रह जाती है, यदि किसी गरीब की पीड़ा केवल फाइलों में दर्ज होकर रह जाती है, तो यह केवल प्रणाली की विफलता नहीं, बल्कि संवेदनहीनता का प्रमाण है। आज आवश्यकता है कि लोक सेवक अपने भीतर उस संवेदना को पुन: जागृत करें, जो उन्हें समाज का प्रहरी बनाती है। उन्हें यह स्मरण रखना होगा कि उनके प्रत्येक निर्णय का प्रभाव किसी न किसी के जीवन पर पड़ता है। चाहे वह किसी किसान की आशा हो, किसी पीडि़त को न्याय हो, किसी मजदूर का जीवन निर्वाह हो या किसी छात्र का भविष्य।
इस दिवस का अर्थ केवल संकल्प लेना नहीं, बल्कि अपने कार्य के स्वरूप को पुन: समझना है। क्या हम वास्तव में वहां उपस्थित हैं जहां हमारी आवश्यकता है? क्या हमारी उपस्थिति केवल आभासी है या वह उन गलियों, उन खेतों, उन दूरस्थ बस्तियों तक भी पहुंचती है जहां शासन का स्पर्श सबसे अधिक अपेक्षित है? ‘सिविल सेवा दिवस’ हमें अतीत के गौरव की याद दिलाता है, परंतु उससे भी अधिक यह वर्तमान की दिशा पूछता है। यदि इस प्रश्न का उत्तर ईमानदारी से खोज लिया जाए, तो भविष्य का पथ स्वयं स्पष्ट हो जाएगा।

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