काशी हिंदू विश्वविद्यालय और ऑस्ट्रेलिया की ग्रिफिथ यूनिवर्सिटी मिलकर मानव विकास और उसकी उत्पत्ति से जुड़े रहस्यों पर शोध करेंगे। इसके लिए दोनों विश्वविद्यालयों के बीच औपचारिक समझौते पर हस्ताक्षर हो गए हैं। 22 अक्टूबर को पूरी हुई हस्ताक्षर प्रक्रिया के साथ ही समझौता लागू हो गया है। इस अंतरराष्ट्रीय शोध परियोजना के तहत जनवरी 2027 से काम शुरू होने की तैयारी है। समझौते पर बीएचयू की ओर से कुलसचिव राजन श्रीवास्तव और ग्रिफिथ यूनिवर्सिटी की ओर से रिसर्च सर्विसेज की डिप्टी डायरेक्टर लिनेट फरकुहर ने ई-हस्ताक्षर किए। इसके बाद इस परियोजना में बीएचयू की भागीदारी का रास्ता साफ हो गया है। मानव विकास के इतिहास को समझने पर होगा काम यह शोध परियोजना ग्रिफिथ यूनिवर्सिटी के प्रो. माइकल पेट्राग्लिया के नेतृत्व में चल रहे ‘एआरसी सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर ट्रांसफॉर्मिंग ह्यूमन ओरिजिन्स रिसर्च’ के तहत संचालित होगी। बीएचयू के जंतु विज्ञान विभाग के प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे को इसमें पार्टनर इन्वेस्टिगेटर बनाया गया है। प्रो. चौबे की अगुवाई में ग्लोबल साउथ यानी एशिया, अफ्रीका और दूसरे विकासशील क्षेत्रों से जुड़े आंकड़ों को जुटाने, उनका विश्लेषण करने और वैज्ञानिक तरीके से समझने पर काम होगा। इसका उद्देश्य मानव विकास से जुड़े अध्ययन में मौजूद कमियों और पुराने पूर्वाग्रहों को दूर करना तथा शोध की नई पद्धतियां विकसित करना है। सात साल में खर्च होंगे 85 मिलियन डॉलर इस शोध केंद्र को ऑस्ट्रेलियन रिसर्च काउंसिल की ओर से सात वर्षों के लिए 85 मिलियन डॉलर का अनुदान मिला है। इस परियोजना में ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी, मोनाश यूनिवर्सिटी, यूनिवर्सिटी ऑफ क्वींसलैंड और यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया सहित कई प्रमुख संस्थान भी शामिल हैं। जंतु विज्ञान और पुरातत्व विभाग के शोधकर्ता जुड़ेंगे प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे ने बताया कि शुरुआत में बीएचयू के जंतु विज्ञान विभाग और प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व (एआईएचसी एंड आर्कियोलॉजी) से जुड़े शोधकर्ता इस परियोजना में शामिल होंगे। आगे दूसरे विभागों को भी जोड़ने की योजना है। शोध के निष्कर्ष अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित किए जाएंगे। डेटा और शोध के अधिकारों का भी होगा ध्यान परियोजना के तहत मानव उत्पत्ति से जुड़े आंकड़ों को सुरक्षित रखने और शोध में इस्तेमाल करने के लिए एक विशेष डेटाबेस बनाया जाएगा। इसके लिए अलग से समझौता तैयार किया जाएगा। शोध के दौरान जुटाए गए स्वदेशी डेटा के प्रबंधन और स्वामित्व का अधिकार संबंधित मूल समुदायों के पास रहेगा।

