पीएम मोदी को लेकर कांग्रेस ने अब लगता है मानो अपनी स्ट्रैटर्जी को छोड़ा बदल दिया है। पहले तक राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी के नेताओं की ओर से पीएम मोदी पर डायरेक्ट अटैक किया जाता रहा था। लेकिन ये स्ट्र्टर्जी कांग्रेस को बैकफायर कर रही थी। चाहे वो चौकीदार चोर है से लेकर मौत के सौदागर तक के स्लोगन रहे हो। इन सभी का कांग्रेस को चुनाव में खामियाजा ही उठाना पड़ा था। हर चुनाव से पहले कांग्रेस इस तरह के कोई बयान दे देती थी और सहानुभूति बीजेपी और पीएम मोदी को मिल जाती थी। आम लोगों के मन में धारणा बनी कि प्रधानमंत्री के कोई बाल बच्चे नहीं हैं, परिवार से इतर वो देश सेवा में लगे हैं। ऐसे में भ्रष्टाचार के आरोप चुनावी एजेंडा हैं। इस बात को लेकर देश में एक राय है कि यह चोरी नहीं करेंगे। ऐसे में अब कांग्रेस ने स्ट्रेटजी या या फिर कहें कि गोल पोस्ट राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की ओर शिफ्ट कर दिया है। कांग्रेस पार्टी की तरफ से या कह ले राहुल गांधी ने बीते दिनों एनएसए डोभाल पर खूब निशाना साधा है। बीते दिनों की बात है महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता पृथ्वीराज चौहान ने विदेश मंत्री एस जयशंकर और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल की भूमिका पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा है कि विदेश मंत्री संसद के प्रति जवाबदेह होते हैं जबकि NSA एक गैर-निर्वाचित अधिकारी हैं और मोदी सरकार ने डोभाल को कैबिनेट रैंक देकर उनकी शक्तियां बढ़ा दी हैं।
इसे भी पढ़ें: SC/ST Act में कानूनी रोक का हवाला, Delhi High Court ने Ajit Bharti की अग्रिम जमानत याचिका खारिज की
आखिर कांग्रेस अजीत डोभाल के पीछे क्यों पड़ी है
चव्हाण ने सवाल उठाया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश की विदेश नीति किसके नियंत्रण में है, विदेश मंत्री डॉ एस जयशंकर या NSA अजीत डोभाल के? मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री कार्यकाल के दौरान NSA का पद हमेशा जूनियर स्तर का होता था। उस समय NSA आंतरिक सुरक्षा और रणनीतिक मामलों पर विदेश मंत्री और गृह मंत्री को रिपोर्ट करते थे। लेकिन मोदी सरकार ने अजित डोभाल को कैबिनेट रैंक दे दिया है। पृथ्वीराज चव्हाण ने कहा कि अब गृह मंत्री अमित शाह, विदेश मंत्री एस जयशंकर और NSA अजीत डोभाल सभी कैबिनेट रैंक रखते हैं और तीनों सीधे प्रधानमंत्री को रिपोर्ट करते हैं, एक-दूसरे को नहीं। उन्होंने कहा कि ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से पहले अजित डोभाल ने चीन का दौरा किया, जबकि एस जयशंकर ने रूस गए थे। ऐसे में सरकार देश को बताए कि क्या विदेश मंत्रालय से संबंधित कामकाज का कोई आंतरिक बंटवारा हुआ है।
इसे भी पढ़ें: Ajit Agarkar का Chief Selector कार्यकाल नहीं बढ़ेगा, BCCI ने दिए संकेत
क्यों अजीत डोभाल पर हमला करना कांग्रेस को सूट करता है?
भारतीय राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप का दौर नया नहीं है, लेकिन हाल के महीनों में सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में एक खास पैटर्न देखने को मिला है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि पर निशाना साधने में विफल रहने के बाद, अब रणनीति के तहत उनके मंत्रिमंडल के प्रमुख मंत्रियों और महत्वपूर्ण सलाहकारों को एक-एक कर घेरा जा रहा है। इस सिलसिले की शुरुआत केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी से जुड़े मामलों से हुई। कुछ महीने पहले गडकरी के बेटों के व्यावसायिक उपक्रमों और कंपनियों को लेकर सोशल मीडिया पर अचानक विवाद खड़ा किया गया। जांच और रिपोर्टों में यह दावा भी सामने आया कि इस नैरेटिव को आगे बढ़ाने के लिए सीमा पार से विदेशी बॉट्स और सोशल मीडिया हैंडल्स का सहारा लिया गया था। इसके तुरंत बाद पेट्रोल में इथेनॉल ब्लेंडिंग को लेकर सोशल मीडिया पर शिकायतों की बाढ़ आ गई। गाड़ियों के माइलेज गिरने, इंजन खराब होने और यहां तक कि कारों में चींटियां लगने तक के दावे किए गए। दिलचस्प बात यह है कि जितनी तेजी से यह अभियान शुरू हुआ, उतनी ही तेजी से शांत भी हो गया। आज वही गाड़ियां सड़कों पर सामान्य रूप से दौड़ रही हैं और सोशल मीडिया से यह पूरा मुद्दा अचानक नदारद हो चुका है। राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, यह तरीका काफी हद तक आम आदमी पार्टी के शुरुआती दौर की उस राजनीति से मेल खाता है, जब अरविंद केजरीवाल ने नितिन गडकरी और अरुण जेटली जैसे वरिष्ठ नेताओं पर तीखे आरोप लगाए थे। हालांकि, मानहानि के मुकदमों के बाद केजरीवाल को अदालत में लिखित माफी मांगनी पड़ी थी।
मोदी सरकार के प्रमुख चेहरों को घेरने की सियासत
मंत्रियों के बाद अब विपक्ष और सोशल मीडिया अभियानों का रुख मोदी सरकार के सबसे मजबूत रणनीतिक स्तंभों विदेश मंत्री एस जयशंकर और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल की ओर मुड़ गया है। अजीत डोभाल, जिन्हें आज सरकार का रणनीतिक आधार माना जाता है, उनका करियर किसी एक दल तक सीमित नहीं रहा है। डोभाल के प्रशासनिक इतिहास पर नजर डालें तो वे पार्टी लाइन से ऊपर उठकर राष्ट्र सेवा के लिए जाने जाते रहे हैं। 1972 के दौर में जब केरल के मलप्पुरम में सांप्रदायिक तनाव बढ़ा, तब तेजतर्रार आईपीएस अधिकारी अजीत डोभाल को स्थिति नियंत्रण में करने की जिम्मेदारी दी गई थी। सिक्किम के भारत में शांतिपूर्ण एकीकरण के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कार्यकाल में डोभाल ने बेहद संवेदनशील और अहम भूमिका निभाई थी। वहां विदेशी खुफिया एजेंसियों के प्रभाव को निष्प्रभावी करने और सिक्किम को मुख्यधारा से जोड़ने में उनके काम ने उन्हें देश के शीर्ष खुफिया अधिकारियों की कतार में ला खड़ा किया था। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इंदिरा गांधी से लेकर मोदी सरकार तक देश की सुरक्षा धुरी रहे अजीत डोभाल और अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की सशक्त आवाज बने एस. जयशंकर पर उठते सवाल यह स्पष्ट करते हैं कि राजनीति अब केवल नीतिगत विरोध तक सीमित नहीं है, बल्कि सरकार के मुख्य रणनीतिक तंत्र को दबाव में लाने का सुनियोजित प्रयास बन चुकी है।

