दरभंगा के सदर प्रखंड के भालपट्टी में कन्या प्राइमरी स्कूल की स्थापना साल 1952 में हुई थी। करीब 74 साल पुराने इस स्कूल में आज भी बच्चे बुनियादी सुविधाओं के अभाव में पढ़ाई करने को मजबूर हैं। इस स्कूल का संचालन महज दो कमरों में हो रहा है। कक्षा एक से पांचवीं तक के बच्चों की पढ़ाई के लिए पर्याप्त कमरे नहीं हैं। ऐसे में बच्चों को स्कूल कैंपस के बाहर पेड़ के नीचे बैठाकर पढ़ाना पड़ता है। पेड़ के नीचे पढ़ने वाले बच्चों के आसपास झाड़ियां और जंगलनुमा स्थिति बनी हुई है। यहां सांप और अन्य जहरीले जीव-जंतुओं का खतरा बना रहता है। विद्यालय के बगल में बंदरों का झुंड भी घूमता दिखाई देता है। वहीं, स्कूल की बिल्डिंग की जर्जर स्थिति के कारण शिक्षकों और बच्चों को हमेशा किसी अनहोनी का डर सताता रहता है। बारिश में बच्चों को पढ़ाई छोड़कर सुरक्षित जगह की तलाश करनी पड़ती है, जबकि गर्मी में कड़ी धूप के बीच बैठकर पढ़ना उनकी मजबूरी बन जाती है। बारिश, ठंड और धूप में पेड़ के नीचे होती है पढ़ाई विद्यालय की शिक्षिका रुचि कुमारी ने बताया कि स्कूल में केवल दो कमरे हैं। पहली से पांचवीं तक की कक्षाओं का संचालन करना काफी मुश्किल होता है। जगह की कमी के कारण बच्चों को पेड़ के नीचे पढ़ाना पड़ता है। बारिश, ठंड और तेज धूप में बच्चों को काफी परेशानी होती है। दो कमरों में किसी तरह बच्चों को समायोजित कर पढ़ाई कराई जाती है। पांचवीं कक्षा की छात्रा रोशनी कुमारी ने भावुक अपील करते हुए कहा, “मुख्यमंत्री जी, मेरे विद्यालय में भवन बनवा दीजिए। हम लोगों को पढ़ाई में काफी परेशानी होती है। छोटे बच्चों को आज भी पेड़ के नीचे बैठकर पढ़ना पड़ता है। वहां कभी सांप तो कभी कीड़े निकल आते हैं। बारिश होने पर भागना पड़ता है और धूप में पसीने से तरबतर होकर पढ़ाई करनी पड़ती है। जब शिक्षा व्यवस्था में बदलाव हो रहा है तो हमारे विद्यालय को भी भवन मिलना चाहिए।” खुले आसमान के नीचे बनता है मध्याह्न भोजन विद्यालय में सिर्फ पढ़ाई ही नहीं, बल्कि बच्चों के भोजन की व्यवस्था भी बदहाल है। मध्याह्न भोजन बनाने के लिए अलग से रसोईघर उपलब्ध नहीं है। पन्नी टांगकर और खुले आसमान के नीचे किसी तरह खाना तैयार किया जाता है। इससे भोजन में धूल-मिट्टी और कीड़े-मकोड़े गिरने की आशंका बनी रहती है। बारिश होने पर भोजन बनाने और बच्चों को बैठाकर खिलाने में भी परेशानी होती है। शिक्षिका नेहा कुमारी ने बताया कि विद्यालय की सबसे बड़ी समस्या भवन की कमी है। गर्मी, ठंड और बारिश, हर मौसम में बच्चों को परेशानी उठानी पड़ती है। बच्चों को बैठने और पढ़ने के लिए बेहतर व्यवस्था होनी चाहिए। भवन निर्माण के लिए कई बार विभाग को चिट्ठी लिखी, कोई पहल नहीं हुई नेहा कुमारी बताया कि भवन निर्माण के लिए कई बार विभाग को पत्र लिखा गया है, लेकिन अब तक कोई पहल नहीं हुई। अधिकारियों की ओर से जमीन की कमी का हवाला दिया जाता है। उन्होंने यह भी बताया कि विद्यालय के करीब 50 प्रतिशत बच्चों को ही पुस्तकें मिल पाई हैं, जबकि शेष बच्चे किताबों का इंतजार कर रहे हैं। बड़ा पेड़ गिरने का डर, मजबूरी में चला रहे स्कूल हेडमास्टर बसंत कुमार कामती ने बताया कि विद्यालय में बच्चों की संख्या के हिसाब से कमरे नहीं हैं। जमीन की कमी के कारण नए भवन का निर्माण भी अटका हुआ है। विभाग को कई बार पत्र लिखकर और प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी को जानकारी देकर समस्या से अवगत कराया गया है। इंजीनियर भी विद्यालय का भौतिक सत्यापन कर चुके हैं, लेकिन जमीन कम होने के कारण भवन निर्माण को मुश्किल बताया गया है। उन्होंने कहा कि एक वर्ष पहले ही उन्होंने प्रधान शिक्षक के रूप में यहां योगदान दिया है। उनसे पहले के शिक्षक भी वर्षों से भवन निर्माण के लिए प्रयास कर रहे हैं, लेकिन समस्या का समाधान नहीं हुआ। उन्होंने बताया कि मध्याह्न भोजन भी खुले आसमान के नीचे तैयार किया जाता है। बारिश होने पर चारों तरफ पानी भर जाता है। बच्चों को भोजन कराने के लिए भी पर्याप्त जगह नहीं है। इस कारण कई बार सरकारी मानकों के अनुरूप पूरक पोषाहार उपलब्ध कराने में कठिनाई होती है। पेड़ के नीचे बच्चों को पढ़ाने के दौरान सांप और कीड़ों का खतरा तो रहता ही है, साथ ही यह डर भी बना रहता है कि कहीं कोई बड़ी डाल टूटकर शिक्षक या बच्चों पर न गिर जाए। मजबूरी में इसी व्यवस्था के बीच विद्यालय का संचालन किया जा रहा है। पांच महीने से रसोइया को नहीं मिला मानदेय स्कूल में मध्याह्न भोजन बनाने का काम कर रहीं रसोइया पवित्री देवी ने बताया कि खुले आसमान के नीचे खाना बनाना पड़ता है। हमेशा डर लगा रहता है कि भोजन में कोई कीड़ा-मकोड़ा न गिर जाए। यदि ऐसा हुआ और बच्चे बीमार पड़े तो इसकी जिम्मेदारी रसोइया पर ही आएगी। उन्होंने सरकार से विद्यालय भवन के साथ-साथ रसोईघर बनवाने की मांग की, ताकि बच्चों को स्वच्छ और सुरक्षित भोजन दिया जा सके। उन्होंने यह भी बताया कि पिछले पांच महीने से उन्हें मानदेय नहीं मिला है। दरभंगा के सदर प्रखंड के भालपट्टी में कन्या प्राइमरी स्कूल की स्थापना साल 1952 में हुई थी। करीब 74 साल पुराने इस स्कूल में आज भी बच्चे बुनियादी सुविधाओं के अभाव में पढ़ाई करने को मजबूर हैं। इस स्कूल का संचालन महज दो कमरों में हो रहा है। कक्षा एक से पांचवीं तक के बच्चों की पढ़ाई के लिए पर्याप्त कमरे नहीं हैं। ऐसे में बच्चों को स्कूल कैंपस के बाहर पेड़ के नीचे बैठाकर पढ़ाना पड़ता है। पेड़ के नीचे पढ़ने वाले बच्चों के आसपास झाड़ियां और जंगलनुमा स्थिति बनी हुई है। यहां सांप और अन्य जहरीले जीव-जंतुओं का खतरा बना रहता है। विद्यालय के बगल में बंदरों का झुंड भी घूमता दिखाई देता है। वहीं, स्कूल की बिल्डिंग की जर्जर स्थिति के कारण शिक्षकों और बच्चों को हमेशा किसी अनहोनी का डर सताता रहता है। बारिश में बच्चों को पढ़ाई छोड़कर सुरक्षित जगह की तलाश करनी पड़ती है, जबकि गर्मी में कड़ी धूप के बीच बैठकर पढ़ना उनकी मजबूरी बन जाती है। बारिश, ठंड और धूप में पेड़ के नीचे होती है पढ़ाई विद्यालय की शिक्षिका रुचि कुमारी ने बताया कि स्कूल में केवल दो कमरे हैं। पहली से पांचवीं तक की कक्षाओं का संचालन करना काफी मुश्किल होता है। जगह की कमी के कारण बच्चों को पेड़ के नीचे पढ़ाना पड़ता है। बारिश, ठंड और तेज धूप में बच्चों को काफी परेशानी होती है। दो कमरों में किसी तरह बच्चों को समायोजित कर पढ़ाई कराई जाती है। पांचवीं कक्षा की छात्रा रोशनी कुमारी ने भावुक अपील करते हुए कहा, “मुख्यमंत्री जी, मेरे विद्यालय में भवन बनवा दीजिए। हम लोगों को पढ़ाई में काफी परेशानी होती है। छोटे बच्चों को आज भी पेड़ के नीचे बैठकर पढ़ना पड़ता है। वहां कभी सांप तो कभी कीड़े निकल आते हैं। बारिश होने पर भागना पड़ता है और धूप में पसीने से तरबतर होकर पढ़ाई करनी पड़ती है। जब शिक्षा व्यवस्था में बदलाव हो रहा है तो हमारे विद्यालय को भी भवन मिलना चाहिए।” खुले आसमान के नीचे बनता है मध्याह्न भोजन विद्यालय में सिर्फ पढ़ाई ही नहीं, बल्कि बच्चों के भोजन की व्यवस्था भी बदहाल है। मध्याह्न भोजन बनाने के लिए अलग से रसोईघर उपलब्ध नहीं है। पन्नी टांगकर और खुले आसमान के नीचे किसी तरह खाना तैयार किया जाता है। इससे भोजन में धूल-मिट्टी और कीड़े-मकोड़े गिरने की आशंका बनी रहती है। बारिश होने पर भोजन बनाने और बच्चों को बैठाकर खिलाने में भी परेशानी होती है। शिक्षिका नेहा कुमारी ने बताया कि विद्यालय की सबसे बड़ी समस्या भवन की कमी है। गर्मी, ठंड और बारिश, हर मौसम में बच्चों को परेशानी उठानी पड़ती है। बच्चों को बैठने और पढ़ने के लिए बेहतर व्यवस्था होनी चाहिए। भवन निर्माण के लिए कई बार विभाग को चिट्ठी लिखी, कोई पहल नहीं हुई नेहा कुमारी बताया कि भवन निर्माण के लिए कई बार विभाग को पत्र लिखा गया है, लेकिन अब तक कोई पहल नहीं हुई। अधिकारियों की ओर से जमीन की कमी का हवाला दिया जाता है। उन्होंने यह भी बताया कि विद्यालय के करीब 50 प्रतिशत बच्चों को ही पुस्तकें मिल पाई हैं, जबकि शेष बच्चे किताबों का इंतजार कर रहे हैं। बड़ा पेड़ गिरने का डर, मजबूरी में चला रहे स्कूल हेडमास्टर बसंत कुमार कामती ने बताया कि विद्यालय में बच्चों की संख्या के हिसाब से कमरे नहीं हैं। जमीन की कमी के कारण नए भवन का निर्माण भी अटका हुआ है। विभाग को कई बार पत्र लिखकर और प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी को जानकारी देकर समस्या से अवगत कराया गया है। इंजीनियर भी विद्यालय का भौतिक सत्यापन कर चुके हैं, लेकिन जमीन कम होने के कारण भवन निर्माण को मुश्किल बताया गया है। उन्होंने कहा कि एक वर्ष पहले ही उन्होंने प्रधान शिक्षक के रूप में यहां योगदान दिया है। उनसे पहले के शिक्षक भी वर्षों से भवन निर्माण के लिए प्रयास कर रहे हैं, लेकिन समस्या का समाधान नहीं हुआ। उन्होंने बताया कि मध्याह्न भोजन भी खुले आसमान के नीचे तैयार किया जाता है। बारिश होने पर चारों तरफ पानी भर जाता है। बच्चों को भोजन कराने के लिए भी पर्याप्त जगह नहीं है। इस कारण कई बार सरकारी मानकों के अनुरूप पूरक पोषाहार उपलब्ध कराने में कठिनाई होती है। पेड़ के नीचे बच्चों को पढ़ाने के दौरान सांप और कीड़ों का खतरा तो रहता ही है, साथ ही यह डर भी बना रहता है कि कहीं कोई बड़ी डाल टूटकर शिक्षक या बच्चों पर न गिर जाए। मजबूरी में इसी व्यवस्था के बीच विद्यालय का संचालन किया जा रहा है। पांच महीने से रसोइया को नहीं मिला मानदेय स्कूल में मध्याह्न भोजन बनाने का काम कर रहीं रसोइया पवित्री देवी ने बताया कि खुले आसमान के नीचे खाना बनाना पड़ता है। हमेशा डर लगा रहता है कि भोजन में कोई कीड़ा-मकोड़ा न गिर जाए। यदि ऐसा हुआ और बच्चे बीमार पड़े तो इसकी जिम्मेदारी रसोइया पर ही आएगी। उन्होंने सरकार से विद्यालय भवन के साथ-साथ रसोईघर बनवाने की मांग की, ताकि बच्चों को स्वच्छ और सुरक्षित भोजन दिया जा सके। उन्होंने यह भी बताया कि पिछले पांच महीने से उन्हें मानदेय नहीं मिला है।

