भागलपुर के कलाकार छठ पूजा में इस्तेमाल होने वाले सूपों पर मंजूषा कला उकेरेंगे। इस काम के लिए उन्हें अमेरिका से ऑर्डर मिला है। मंजूषा गुरु मनोज पंडित और उनकी टीम सूपों को सजाने में जुटी है। इन पर बनी कला अंग क्षेत्र की पहचान को अमेरिका तक पहुंचाएगी। छठ पर भगवान सूर्य को अर्घ्य देने के लिए पारंपरिक सूप का इस्तेमाल किया जाता है। अब इन सूपों पर भागलपुर की मंजूषा कला भी नजर आएगी। छठ में सूप का विशेष महत्व है छठ में सूप का अपना विशेष महत्व है। व्रती इसी सूप में पूजन सामग्री, फल और अन्य प्रसाद सजाकर भगवान सूर्य को अर्घ्य अर्पित करते हैं। पीढ़ियों से चली आ रही यह परंपरा बिहार की सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न हिस्सा है। अब इसी परंपरा में भागलपुर की मंजूषा कला के रंग भरने की कोशिश की जा रही है। सूप पर जब मंजूषा के पारंपरिक चित्र और आकर्षक आकृतियां उभरेंगी, तो उसमें छठ की आस्था के साथ अंग प्रदेश की लोक संस्कृति भी दिखाई देगी। यह पहल परंपरा को नया रूप देने के साथ-साथ नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का माध्यम भी बन सकती है।
सबसे खास बात यह है कि इस बार इन सूपों की कहानी भागलपुर तक सीमित नहीं रहेगी। अमेरिका में रहने वाले छठ श्रद्धालुओं तक पहुंचने वाले ये सूप अपने साथ उस धरती की पहचान भी लेकर जाएंगे, जहां मंजूषा कला की परंपरा सदियों से जीवित है।
नोज पंडित बोले—ऑर्डर बहुत हैं, लेकिन हर सूप को मंजिल तक पहुंचाना भी जरूरी
मंजूषा गुरु मनोज पंडित के मुताबिक, मंजूषा कला से सजे सूपों की मांग लगातार बढ़ रही है। देश के अलग-अलग हिस्सों के साथ विदेशों से भी ऑर्डर मिल रहे हैं। अमेरिका के अलावा बजाना संस्था और इनपावर टू अर्न जैसी संस्थाओं के माध्यम से भी मांग सामने आ रही है।
मनोज पंडित बताते हैं कि फिलहाल करीब 100 से 200 सूपों के ऑर्डर मिले हैं। मांग बढ़ने से कलाकारों में उत्साह है, लेकिन उनके सामने उत्पादन और समय पर आपूर्ति की चुनौती भी है।
कलाकार अपनी क्षमता के अनुसार काम कर रहे मनोज का कहना है कि ऑर्डर मिलना महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है कि जितने ऑर्डर लिए जाएं, उन्हें तैयार करके सही समय पर संबंधित लोगों तक पहुंचाया जा सके। कलाकार अपनी क्षमता के अनुसार काम कर रहे हैं, ताकि गुणवत्ता से समझौता किए बिना मंजूषा कला को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाया जा सके। उनके लिए अमेरिका से ऑर्डर मिलना गर्व का विषय है। यह इस बात का संकेत है कि भागलपुर की पारंपरिक कला अब अपने परिचित दायरे से बाहर निकल रही है और दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी लोगों का ध्यान आकर्षित कर रही है। छठ से जुड़ेगी मंजूषा, फिर दुनिया तक पहुंचेगी अंग की पहचान
मंजूषा कलाकार गौतम कुमार इस पहल को केवल सूप सजाने का काम नहीं मानते। उनके अनुसार, सबसे पहले मंजूषा कला को लोगों की सांस्कृतिक और धार्मिक भावनाओं से जोड़ने की जरूरत है।
गौतम कुमार बताते हैं कि जिस तरह छठ पूजा बिहार की सांस्कृतिक पहचान है, उसी तरह मंजूषा कला का संबंध अंग क्षेत्र की ऐतिहासिक लोक परंपराओं से है। बिहुला-विषहरी की लोकगाथा और उससे जुड़ी सांस्कृतिक परंपराएं मंजूषा कला की पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। उनका प्रयास है कि मंजूषा कला को बिहार के हर हिस्से तक पहुंचाया जाए और फिर वहां से पूरी दुनिया में इसकी पहचान बने। जिस तरह आज बिहार से बाहर रहने वाले लोग विदेशों में भी छठ महापर्व मनाते हैं, उसी तरह मंजूषा कला भी उन आयोजनों और घरों तक पहुंचे, जहां बिहार की संस्कृति के प्रति प्रेम और सम्मान मौजूद है।
गौतम कुमार कहते हैं कि अमेरिका से ऑर्डर मिलने से उन्हें बहुत अच्छा लग रहा है। इच्छा है कि आगे भी दूसरे देशों से ऑर्डर मिलें।
चित्र शैली और लोकगाथाओं से जुड़ाव
मंजूषा कला की सबसे बड़ी विशेषता इसकी विशिष्ट चित्र शैली और लोकगाथाओं से जुड़ाव है। इसमें प्रयुक्त पारंपरिक आकृतियां, रेखाएं और रंग अंग क्षेत्र की सांस्कृतिक स्मृतियों को सामने लाते हैं। बिहुला-विषहरी की कथा से जुड़ी यह कला भागलपुर की पहचान मानी जाती है।
जब इसी कला को छठ के सूप पर उकेरा जाएगा, तो दो महत्वपूर्ण सांस्कृतिक परंपराएं एक-दूसरे से जुड़ेंगी। एक ओर भगवान सूर्य और छठी मैया के प्रति श्रद्धा होगी, तो दूसरी ओर अंग प्रदेश की लोककला का सौंदर्य। भागलपुर के कलाकार छठ पूजा में इस्तेमाल होने वाले सूपों पर मंजूषा कला उकेरेंगे। इस काम के लिए उन्हें अमेरिका से ऑर्डर मिला है। मंजूषा गुरु मनोज पंडित और उनकी टीम सूपों को सजाने में जुटी है। इन पर बनी कला अंग क्षेत्र की पहचान को अमेरिका तक पहुंचाएगी। छठ पर भगवान सूर्य को अर्घ्य देने के लिए पारंपरिक सूप का इस्तेमाल किया जाता है। अब इन सूपों पर भागलपुर की मंजूषा कला भी नजर आएगी। छठ में सूप का विशेष महत्व है छठ में सूप का अपना विशेष महत्व है। व्रती इसी सूप में पूजन सामग्री, फल और अन्य प्रसाद सजाकर भगवान सूर्य को अर्घ्य अर्पित करते हैं। पीढ़ियों से चली आ रही यह परंपरा बिहार की सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न हिस्सा है। अब इसी परंपरा में भागलपुर की मंजूषा कला के रंग भरने की कोशिश की जा रही है। सूप पर जब मंजूषा के पारंपरिक चित्र और आकर्षक आकृतियां उभरेंगी, तो उसमें छठ की आस्था के साथ अंग प्रदेश की लोक संस्कृति भी दिखाई देगी। यह पहल परंपरा को नया रूप देने के साथ-साथ नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का माध्यम भी बन सकती है।
सबसे खास बात यह है कि इस बार इन सूपों की कहानी भागलपुर तक सीमित नहीं रहेगी। अमेरिका में रहने वाले छठ श्रद्धालुओं तक पहुंचने वाले ये सूप अपने साथ उस धरती की पहचान भी लेकर जाएंगे, जहां मंजूषा कला की परंपरा सदियों से जीवित है।
नोज पंडित बोले—ऑर्डर बहुत हैं, लेकिन हर सूप को मंजिल तक पहुंचाना भी जरूरी
मंजूषा गुरु मनोज पंडित के मुताबिक, मंजूषा कला से सजे सूपों की मांग लगातार बढ़ रही है। देश के अलग-अलग हिस्सों के साथ विदेशों से भी ऑर्डर मिल रहे हैं। अमेरिका के अलावा बजाना संस्था और इनपावर टू अर्न जैसी संस्थाओं के माध्यम से भी मांग सामने आ रही है।
मनोज पंडित बताते हैं कि फिलहाल करीब 100 से 200 सूपों के ऑर्डर मिले हैं। मांग बढ़ने से कलाकारों में उत्साह है, लेकिन उनके सामने उत्पादन और समय पर आपूर्ति की चुनौती भी है।
कलाकार अपनी क्षमता के अनुसार काम कर रहे मनोज का कहना है कि ऑर्डर मिलना महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है कि जितने ऑर्डर लिए जाएं, उन्हें तैयार करके सही समय पर संबंधित लोगों तक पहुंचाया जा सके। कलाकार अपनी क्षमता के अनुसार काम कर रहे हैं, ताकि गुणवत्ता से समझौता किए बिना मंजूषा कला को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाया जा सके। उनके लिए अमेरिका से ऑर्डर मिलना गर्व का विषय है। यह इस बात का संकेत है कि भागलपुर की पारंपरिक कला अब अपने परिचित दायरे से बाहर निकल रही है और दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी लोगों का ध्यान आकर्षित कर रही है। छठ से जुड़ेगी मंजूषा, फिर दुनिया तक पहुंचेगी अंग की पहचान
मंजूषा कलाकार गौतम कुमार इस पहल को केवल सूप सजाने का काम नहीं मानते। उनके अनुसार, सबसे पहले मंजूषा कला को लोगों की सांस्कृतिक और धार्मिक भावनाओं से जोड़ने की जरूरत है।
गौतम कुमार बताते हैं कि जिस तरह छठ पूजा बिहार की सांस्कृतिक पहचान है, उसी तरह मंजूषा कला का संबंध अंग क्षेत्र की ऐतिहासिक लोक परंपराओं से है। बिहुला-विषहरी की लोकगाथा और उससे जुड़ी सांस्कृतिक परंपराएं मंजूषा कला की पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। उनका प्रयास है कि मंजूषा कला को बिहार के हर हिस्से तक पहुंचाया जाए और फिर वहां से पूरी दुनिया में इसकी पहचान बने। जिस तरह आज बिहार से बाहर रहने वाले लोग विदेशों में भी छठ महापर्व मनाते हैं, उसी तरह मंजूषा कला भी उन आयोजनों और घरों तक पहुंचे, जहां बिहार की संस्कृति के प्रति प्रेम और सम्मान मौजूद है।
गौतम कुमार कहते हैं कि अमेरिका से ऑर्डर मिलने से उन्हें बहुत अच्छा लग रहा है। इच्छा है कि आगे भी दूसरे देशों से ऑर्डर मिलें।
चित्र शैली और लोकगाथाओं से जुड़ाव
मंजूषा कला की सबसे बड़ी विशेषता इसकी विशिष्ट चित्र शैली और लोकगाथाओं से जुड़ाव है। इसमें प्रयुक्त पारंपरिक आकृतियां, रेखाएं और रंग अंग क्षेत्र की सांस्कृतिक स्मृतियों को सामने लाते हैं। बिहुला-विषहरी की कथा से जुड़ी यह कला भागलपुर की पहचान मानी जाती है।
जब इसी कला को छठ के सूप पर उकेरा जाएगा, तो दो महत्वपूर्ण सांस्कृतिक परंपराएं एक-दूसरे से जुड़ेंगी। एक ओर भगवान सूर्य और छठी मैया के प्रति श्रद्धा होगी, तो दूसरी ओर अंग प्रदेश की लोककला का सौंदर्य।

