कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने हरिद्वार जिले की खानपुर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने की मंगलवार को इच्छा जताई। हालांकि, उन्होंने कहा कि इस संबंध में फैसला पार्टी नेतृत्व ही लेगा। नैनीताल जिले के काठगोदाम में संवाददाताओं से बातचीत में रावत ने कहा कि मन तो चंचल होता है, लेकिन मन की डोर पार्टी नेतृत्व के हाथ में है।
उन्होंने कहा, “पार्टी नेतृत्व कहेगा लड़ो तो चुनाव लड़ेंगे, कहेगा लड़ाओ तो लड़ाएंगे, कहेगा बैठो तो बाहर बैठकर ताली बजाएंगे। पार्टी नेतृत्व जो काम सौपेंगा, वह करेंगे।”
रावत ने कहा कि हरिद्वार के लोग विपरीत परिस्थितियों में भी उनके साथ खड़े रहे और एक बार फिर वे पूरी शिद्दत के साथ उनके साथ खड़े होना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि खानपुर के लोगों का आग्रह है कि वह क्षेत्र से चुनाव लड़ें।
रावत ने अपनी तुलना निवेश से करते हुए कहा, “एक समय के बाद आप पार्टी का निवेश हो जाते हैं। फिर निवेश की मर्जी नहीं चलती कि उसका इस्तेमाल कैसे किया जाए, बल्कि जिसने निवेश किया है, उसकी इच्छा चलती है। जो पार्टी चाहेगी, हम वही करेंगे।”
यह पूछे जाने पर कि चुनावों में जीत के साथ कई बार हार का भी स्वाद चखने के बाद क्या उन्हें अब हारने का डर नहीं लगता, रावत ने कहा कि वह मछली के बच्चे की तरह हैं, जिसे समुद्र से डर नहीं लगता।
उन्होंने कहा, “विपरीत लहरें भी आती हैं और अनुकूल लहरें भी आती हैं। दोनों में तैरना पड़ता है, कभी पार निकल जाते हैं और कभी पार नहीं कर पाते। यह तो लहरों यानी जनता की मर्जी पर निर्भर करता है।”
एक अन्य सवाल के जवाब में कांग्रेस नेता ने कहा कि सार्वजनिक जीवन में चुनाव लड़ना आपका कर्तव्य होता है, लेकिन दूसरे लोगों को आगे लाने के लिए उन्होंने चुनाव लड़ने की अपनी इच्छा का दमन कर रखा है।
हालांकि, उन्होंने कहा कि जब लोग चाहते हैं कि आप चुनाव लड़ें, तो उनकी चाहत को भी मानना पड़ता है और इसीलिए उन्होंने फैसला पार्टी नेतृत्व पर छोड़ दिया है। रावत से पूछा गया था कि राज्य में सबसे वरिष्ठ होने के नाते उनके चुनाव लड़ने से क्या वह अपनी ही पार्टी के उन नेताओं के लिए खतरा नहीं बन जाएंगे, जो मुख्यमंत्री बनने की इच्छा रखते हैं। यह पूछे जाने पर कि उनकी विधायक बेटी अनुपमा रावत और बेटे आनंद के साथ ही अगर वह भी टिकट चाहते हैं तो एक ही परिवार से कितने व्यक्ति चुनाव लड़ेंगे, रावत ने कहा कि अगर कोई व्यक्ति राजनीतिक और सामाजिक जीवन में सक्रिय है, तो उसे हरीश रावत से जोड़कर देखने के बजाय एक अलग व्यक्तित्व के तौर पर देखा जाना चाहिए।
उन्होंने पूछा, “क्या आनंद रावत राजनीतिक व्यक्ति नहीं है? वह 25—30 साल से राजनीति के क्षेत्र में सक्रिय हैं और समाज के लिए काम कर रहे हैं। अनुपमा रावत ने भी उस सीट को चुना, जहां से कांग्रेस 40 साल से नहीं जीती थी।
अब वह जीत गईं, तो यह उनका अपना व्यक्तित्व और अपनी ही शक्ति तो है।”
हालांकि, रावत ने कहा कि कांग्रेस को चुनाव जीतने के लिए जिताऊ प्रत्याशियों को ही मैदान में उतारना चाहिए। पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि उनका मानना है कि अगर उनके बेटे-बेटी से भी अधिक उपयुक्त कोई उम्मीदवार मिले, जिसके जीतने की संभावना अधिक हो, तो उसे ही टिकट दिया जाना चाहिए।

