Delhi Race Course Mosque को लेकर जबरदस्त घमासान, Waqf Board पर उठते सवालों के बीच सियासी बयानबाजी के चलते मामला गर्माया

Delhi Race Course Mosque को लेकर जबरदस्त घमासान, Waqf Board पर उठते सवालों के बीच सियासी बयानबाजी के चलते मामला गर्माया

दिल्ली की रेस कोर्स मस्जिद को लेकर विवाद गरमा गया है। मुस्लिम नेता इसे धार्मिक अधिकारों पर हमला बता रहे हैं, लेकिन इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल सरकारी जमीन पर कब्जे का है। हम आपको बता दें कि मस्जिद के प्रतिनिधि 1977 के दिल्ली गजट में वक्फ संपत्ति के रूप में दर्ज होने और विरासत स्थल की मान्यता का हवाला दे रहे हैं, जबकि सरकारी विभाग जमीन पर कब्जे को अनधिकृत बता रहा है। ऐसे में सवाल है कि क्या वक्फ में दर्ज होने या ऐतिहासिक इमारत होने भर से सरकारी जमीन पर कब्जे का अधिकार मिल जाता है? अगर मस्जिद के पास वैध दस्तावेज हैं, तो उन्हें अदालत में पेश कर कानूनी लड़ाई क्यों नहीं लड़ी गई? इस विवाद में सरकार की कार्रवाई के साथ-साथ वक्फ बोर्ड की भूमिका और राजनीतिक नेताओं की बयानबाजी भी सवालों के घेरे में है।

छह दिन का नोटिस

हम आपको बता दें कि 19 अक्टूबर को भूमि एवं विकास कार्यालय (एलएंडडीओ) ने मस्जिद के प्रतिनिधियों को परिसर खाली करने के लिए छह दिन का नोटिस जारी किया। विभाग का पक्ष है कि जमीन सरकारी है और वहां मौजूद ढांचा अनधिकृत है। दूसरी ओर, मस्जिद के प्रतिनिधि 1977 के दिल्ली गजट में वक्फ संपत्ति के रूप में दर्ज होने और एनडीएमसी की विरासत सूची में शामिल होने का हवाला दे रहे हैं।

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लेकिन इस मामले में एक महत्वपूर्ण विरोधाभास भी सामने आया है। 15 अक्टूबर को दिल्ली हाईकोर्ट ने मस्जिद का बिजली और पानी का कनेक्शन बहाल करने से इंकार कर दिया था। ये कनेक्शन 7 अक्टूबर को काटे गए थे। वहीं, 22 अक्टूबर को सरकारी सूत्रों के हवाले से यह भी कहा गया कि मस्जिद को कोई बेदखली नोटिस नहीं भेजा गया। ऐसे में सवाल है कि आखिर वास्तविक स्थिति क्या है? क्या नोटिस जारी किया गया था, किसे दिया गया था और सरकार की अलग-अलग स्तरों पर सामने आ रही जानकारी में अंतर क्यों है?

वक्फ का दर्जा जमीन के मालिकाना हक का प्रमाण नहीं

देखा जाये तो मस्जिद के समर्थन में सबसे प्रमुख दलील उसका वक्फ संपत्ति के रूप में दर्ज होना और ऐतिहासिक महत्व है। लेकिन किसी संपत्ति का वक्फ रिकॉर्ड में दर्ज होना और संबंधित जमीन पर वैध मालिकाना हक या कब्जे का अधिकार होना दो अलग-अलग कानूनी प्रश्न हैं।

यदि मस्जिद के पास जमीन के मालिकाना हक, वैध आवंटन, लीज या किसी अन्य कानूनी संरक्षण से जुड़े दस्तावेज हैं, तो उन्हें संबंधित प्राधिकरण और अदालत के सामने पेश किया जाना चाहिए। केवल दशकों पुराने धार्मिक ढांचे का हवाला देकर जमीन के स्वामित्व का विवाद अपने आप खत्म नहीं हो जाता। इसी तरह, सरकारी विभाग के नोटिस को भी अंतिम न्यायिक फैसला नहीं माना जा सकता। असली कसौटी जमीन के रिकॉर्ड और लागू कानून होंगे।

साथ ही विरासत का दर्जा भी अपने आप मालिकाना हक नहीं देता। यह दर्जा किसी इमारत के संरक्षण और उसमें बदलाव या तोड़फोड़ की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है, लेकिन इससे जमीन पर अनधिकृत कब्जा स्वतः वैध नहीं हो जाता। सवाल यह है कि क्या मस्जिद के प्रतिनिधियों ने अपने दावों को कानूनी रूप से स्थापित करने के लिए प्रभावी न्यायिक कार्रवाई की?

वक्फ बोर्ड कहां था, जब संपत्ति पर संकट आया?

देखा जाये तो इस विवाद का सबसे गंभीर पहलू दिल्ली वक्फ बोर्ड की भूमिका है। मस्जिद के इमाम मौलाना मोहम्मद हारून के मुताबिक, उन्होंने महीनों तक बोर्ड से मदद मांगी, लेकिन न तो प्रभावी कानूनी कार्रवाई हुई और न ही उन्हें अदालत जाने की अनुमति दी गई।

इस बीच, एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने भी सोशल मीडिया पर बोर्ड द्वारा आदेश को चुनौती नहीं दिए जाने और 2023 से उसके पूर्ण रूप से गठित नहीं होने का मुद्दा उठाया। यदि ये आरोप सही हैं, तो सवाल केवल सरकार से नहीं, उस संस्था से भी होना चाहिए जिसकी जिम्मेदारी वक्फ संपत्तियों के हितों की रक्षा करना है। सवाल उठता है कि बोर्ड ने समय रहते कानूनी रास्ता क्यों नहीं अपनाया? जमीन से जुड़े दस्तावेज सामने क्यों नहीं रखे गए? साथ ही विवाद बढ़ने के बाद जवाबदेही तय करने की मांग इतनी कमजोर क्यों दिखाई दी?

धार्मिक भावनाएं बनाम राजनीतिक बयानबाजी

उधर, यह मामला अब राजनीतिक रंग भी ले चुका है। एआईएमआईएम प्रमुख ओवैसी ने केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्री से हस्तक्षेप की मांग की। जमीयत उलेमा-ए-हिंद के प्रतिनिधिमंडल ने भी केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्री किरेन रिजिजू से मुलाकात कर ज्ञापन सौंपा है। इसके साथ ही आम आदमी पार्टी के विधायक अमानतुल्लाह खान ने मस्जिद का दौरा करने की घोषणा की है। वहीं कश्मीर के मीरवाइज उमर फारूक ने इसे मुस्लिम धार्मिक स्थलों की सुरक्षा से जोड़ते हुए वक्फ संशोधनों और सरकारी नियंत्रण पर सवाल उठाए हैं। जम्मू-कश्मीर के ग्रैंड मुफ्ती नासिर-उल-इस्लाम ने भी इस घटनाक्रम पर चिंता जताई है।

लेकिन क्या बयान जारी करना, मंत्रियों से हस्तक्षेप की मांग करना और समुदाय की भावनाओं का हवाला देना जमीन के मालिकाना हक का प्रमाण बन सकता है? यदि मस्जिद के पक्ष में ठोस कानूनी दस्तावेज हैं, तो उन्हें अदालत में निर्णायक रूप से सामने लाने की जरूरत है। और यदि वक्फ बोर्ड ने अपने दायित्वों का निर्वहन नहीं किया, तो उसकी जवाबदेही भी उतनी ही जरूरी है।

कार्रवाई सिर्फ मस्जिद पर नहीं, पूरे इलाके पर

हम आपको यह भी बता दें कि मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, रेस कोर्स रोड के पास लगभग 100 एकड़ क्षेत्र में सुरक्षा कारणों से कार्रवाई की जा रही है। रिपोर्ट में दो मंदिरों, एक अनधिकृत मस्जिद और हिंदू-मुस्लिम दोनों समुदायों के आवासों पर कार्रवाई का उल्लेख है। एक स्थानीय महिला के अनुसार, प्रभावित लोगों को सरकार की ओर से फ्लैट मिले हैं और वे इससे संतुष्ट हैं। उल्लेखनीय है कि यह क्षेत्र लोक कल्याण मार्ग स्थित प्रधानमंत्री आवास से सटा हुआ है।

बहरहाल, मामला किसी ढांचे के धार्मिक नाम का नहीं, बल्कि सरकारी जमीन पर वैध अधिकार और कानून के पालन का है। यदि जमीन पर कब्जा अनधिकृत है, तो केवल धार्मिक पहचान, ऐतिहासिक महत्व या राजनीतिक दबाव के आधार पर कार्रवाई को अनिश्चितकाल तक नहीं रोका जा सकता। सरकारी जमीन की सुरक्षा करना प्रशासन की जिम्मेदारी है और नियमों का उल्लंघन साबित होने पर नियमानुसार बेदखली की कार्रवाई होनी ही चाहिए। आखिर सरकारी संपत्ति पर अवैध कब्जे को कब तक बर्दाश्त किया जाए?

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