पूर्व लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार को 1976 में अधिग्रहित जमीन का मुआवजा मिलेगा, Patna High Court का फैसला

पूर्व लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार को 1976 में अधिग्रहित जमीन का मुआवजा मिलेगा, Patna High Court का फैसला

पटना उच्च न्यायालय ने लोकसभा की पूर्व अध्यक्ष मीरा कुमार को बिहार सरकार द्वारा अधिग्रहित जमीन के लिए मुआवजा पाने का हकदार ठहराया और जमीन से संबंधित राजस्व रिकॉर्ड रद्द करने के जिला कलेक्टर के आदेश को निरस्त कर दिया। मामले में संबंधित जमीन पटना के फुलवारी राजस्व क्षेत्र के अंतर्गत मैनपुरा इलाके में स्थित 0.56 एकड़ का भूखंड है। राज्य सरकार ने 1976 में नाले के निर्माण के लिए इस जमीन का अधिग्रहण किया था।

न्यायमूर्ति खातिम रजा ने छह अक्टूबर को दिए आदेश में वर्ष 2023 में जमीन की जमाबंदी (राजस्व रिकॉर्ड) रद्द करने के कलेक्टर के आदेश को भी रद्द कर दिया। अदालत ने इस रिकॉर्ड को मीरा कुमार की मां इंद्राणी देवी के नाम पर बहाल करने का निर्देश दिया। अदालत के आदेश के अनुसार, तत्कालीन जमींदार ने 1941 में यह जमीन गौरी चरण सिंह को दी थी और बाद में उनके वंशजों ने पंजीकृत बिक्री विलेखों के माध्यम से इसे सौंप दिया।

मीरा कुमार की मां इंद्राणी देवी ने 1965 में यह जमीन खरीदी थी, जिसके बाद राजस्व रिकॉर्ड में उनका नाम दर्ज किया गया। इंद्राणी देवी के निधन के बाद पंजीकृत वसीयत के आधार पर मीरा कुमार का नाम भी राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज किया गया। न्यायमूर्ति रजा ने कहा कि बिहार भूमि सुधार अधिनियम की धारा 4(एच) के तहत कार्यवाही तभी की जा सकती है, जब अधिनियम के प्रावधानों के तहत संबंधित संपदा राज्य सरकार में निहित हो गई हो।

अदालत ने आदेश में कहा, “वर्तमान कार्यवाही और इससे पहले की कार्यवाही में राज्य सरकार की ओर से धारा 3 या 3ए के तहत कोई अधिसूचना प्रस्तुत नहीं की गई है, जिससे यह साबित हो सके कि विवादित जमीन राज्य सरकार में निहित हो गई थी।”
अदालत ने कहा कि संबंधित संपदा के राज्य सरकार में निहित होने की पुष्टि किए बिना कलेक्टर को धारा 4(एच) के तहत कार्यवाही शुरू करने का अधिकार नहीं था। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस धारा के प्रावधान सहायक प्रकृति के हैं और राज्य में संपदा के निहित होने से संबंधित मुख्य प्रावधानों से स्वतंत्र होकर इनका इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। अदालत ने याचिकाकर्ता के 60 वर्ष से अधिक समय से जमीन पर कब्जे का उल्लेख करते हुए कहा कि अगर राज्य सरकार 1946 से पहले के किसी स्वामित्व या भूमि बंदोबस्ती को चुनौती देना चाहती है, तो उसे राजस्व कार्यवाही के जरिए संक्षिप्त रूप से रद्द करने के बजाय सक्षम दीवानी अदालत का रुख करना चाहिए।

उच्च न्यायालय ने कलेक्टर के आदेश को ‘अवैध और अधिकार क्षेत्र से बाहर’ करार देते हुए कहा कि इस तरह की राजस्व कार्यवाही के माध्यम से जमीन के रिकॉर्ड रद्द नहीं किए जा सकते। मीरा कुमार ने याचिका में कहा था कि उनकी मां का 2002 में निधन हो गया था और उन्हें स्वयं अधिग्रहित जमीन के लिए कोई मुआवजा नहीं मिला। पटना उच्च न्यायालय ने इंदौर विकास प्राधिकरण बनाम मनोहरलाल मामले में उच्चतम न्यायालय के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि मीरा कुमार भूमि अर्जन, पुनर्वासन और पुनर्व्यवस्थापन में उचित प्रतिकर एवं पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 के तहत मुआवजा पाने की हकदार हैं।

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