मुरादाबाद में लाइनपार स्थित रामलीला मैदान में इस बार 95 फीट ऊंचा रावण का पुतला तैयार हो गया है। इसे जिले का सबसे ऊंचा पुतला बताया जा रहा है। इसकी खासियत सिर्फ इसका आकार नहीं, बल्कि इसे बनाने वाला परिवार भी है। मेरठ के रहने वाले आलम और सुलेमान का परिवार पिछले 70 साल से रामलीलाओं के लिए रावण के पुतले बना रहा है। तीन पीढ़ियों से चली आ रही यह परंपरा आपसी भाईचारे और सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल पेश कर रही है। आलम ने बताया कि लाइनपार रामलीला में हर साल रावण का पुतला बनाने की जिम्मेदारी उनके परिवार को मिलती है। इसके अलावा अगवानपुर, पाकबड़ा और आसपास के कई इलाकों की रामलीलाओं के लिए भी वे पुतले तैयार करते हैं। पुतला बनाने का काम करीब एक महीने पहले शुरू कर दिया जाता है। सबसे पहले उसकी ऊंचाई और आकार के हिसाब से ढांचा तैयार किया जाता है। इसके बाद कई चरणों में उसे अंतिम रूप दिया जाता है। इस काम में परिवार के सदस्यों के साथ पांच अन्य लोग भी सहयोग करते हैं। इतने बड़े पुतले को तैयार करने में मेहनत के साथ सावधानी भी जरूरी होती है। पिता के साथ सीखा पुतला बनाने का हुनर आलम के लिए यह काम सिर्फ कमाई का जरिया नहीं, बल्कि परिवार की विरासत है। उन्होंने बताया कि बचपन में पिता के साथ पुतले बनाने का काम सीखना शुरू किया था। शुरुआत में एक-दो बार दिक्कतें आईं, लेकिन धीरे-धीरे काम की बारीकियां समझ में आने लगीं। इसके बाद उन्होंने खुद भी पुतले तैयार करने शुरू कर दिए। आज वह इसी हुनर के सहारे परिवार की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। करीब सात दशक से उनका परिवार रामलीला के आयोजन में योगदान दे रहा है। धर्म अलग, लेकिन काम में कभी नहीं आई रुकावट आलम बताते हैं कि मुस्लिम होने के बावजूद उन्हें रामलीला के लिए रावण का पुतला बनाने में कभी परेशानी नहीं हुई। वह इसे खुशी से करते हैं। उनके लिए यह काम धर्म से ज्यादा आपसी मेलजोल और भाईचारे से जुड़ा है। तीन पीढ़ियों से परिवार के लोग इस परंपरा को निभा रहे हैं। उनका कहना है कि अलग-अलग धर्मों के लोग मिलकर काम करें, तो समाज में आपसी विश्वास और सद्भाव मजबूत होता है। अगली पीढ़ी को लेकर सता रही चिंता आलम को चिंता है कि आने वाली पीढ़ी शायद इस काम को आगे न बढ़ाए। उन्हें आशंका है कि उनके परिवार की तीसरी पीढ़ी के बाद रावण के पुतले बनाने की यह परंपरा खत्म हो सकती है। ऐसे में 70 साल से चली आ रही कला को बचाए रखना उनके लिए चुनौती बन सकता है। रावण के पुतले बनाने के अलावा आलम और उनके परिवार के सदस्य शादियों और दूसरे सामाजिक कार्यक्रमों में सजावट का काम भी करते हैं। इसी से परिवार की आजीविका चलती है। लाइनपार रामलीला मैदान में तैयार 95 फीट का रावण उनके हुनर, मेहनत और उस परंपरा का प्रतीक है, जो धर्म की सीमाओं से आगे बढ़कर भाईचारे का संदेश देती है।

