jaisalmer: पंचायत चुनाव में युवा मतदाता गांव की राजनीति के पुराने समीकरण बदलने को तैयार

jaisalmer: पंचायत चुनाव में युवा मतदाता गांव की राजनीति के पुराने समीकरण बदलने को तैयार

जैसलमेर. गांव की राजनीति में अब चर्चा केवल जातिगत समीकरण, पारिवारिक प्रभाव और परंपरागत राजनीतिक निष्ठा तक सीमित नहीं रह गई है। पंचायत चुनाव की तैयारियों के बीच युवा मतदाताओं की प्राथमिकताएं ग्रामीण राजनीति के एजेंडे को नए सिरे से देखने का संकेत दे रही हैं। रोजगार के अवसर, खेल मैदान, बेहतर इंटरनेट सुविधा, शिक्षा और गांव में ही आगे बढ़ने की संभावनाएं युवाओं की अपेक्षाओं का हिस्सा हैं। ऐसे में चुनावी बहस में यह सवाल भी महत्वपूर्ण हो रहा है कि उम्मीदवार गांव के विकास को लेकर क्या सोचते हैं और स्थानीय समस्याओं के समाधान के लिए उनके पास क्या दृष्टिकोण है।

वोट के साथ विकास की कसौटी भी

ग्रामीण क्षेत्रों में युवाओं की भूमिका अब केवल चुनाव के दिन मतदान करने तक सीमित नहीं मानी जा सकती। मोबाइल इंटरनेट और सोशल मीडिया ने उन्हें सरकारी योजनाओं, रोजगार के अवसरों तथा दूसरे गांवों में हो रहे विकास कार्यों से जुड़ी जानकारियों तक पहुंच दी है। इससे स्थानीय समस्याओं को देखने और उनके समाधान की अपेक्षा करने का तरीका भी बदल रहा है। युवाओं के लिए पंचायत का मतलब अब सड़क, नाली और पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं के साथ रोजगारपरक माहौल तैयार करना भी है। खेल मैदानों की उपलब्धता, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए संसाधन, डिजिटल सेवाओं तक पहुंच और गांव में सुरक्षित सार्वजनिक स्थान जैसे मुद्दे भी उनकी अपेक्षाओं में शामिल हैं।

युवाओं के एजेंडे में प्रमुख मुद्दे

– रोजगार और कौशल: स्थानीय आजीविका, प्रशिक्षण और रोजगार योजनाओं तक पहुंच।

– खेल सुविधाएं: खेल मैदान, उपकरण और युवाओं के लिए सुरक्षित सार्वजनिक स्थान।

– डिजिटल पहुंच: बेहतर इंटरनेट, ऑनलाइन शिक्षा और सरकारी सेवाओं की सुविधा।

– जवाबदेही: विकास कार्यों की प्राथमिकताएं, पारदर्शिता और जनसमस्याओं पर नियमित सुनवाई।

एक्सपर्ट व्यू: जवाबदेही बने चुनावी चर्चा का केंद्र

ग्रामीण विकास के जानकारों के अनुसार, पंचायत चुनाव में युवाओं की भागीदारी तभी सार्थक होगी, जब उनकी अपेक्षाएं ठोस स्थानीय मुद्दों में बदलें। उम्मीदवारों से गांव की जरूरतों, उपलब्ध संसाधनों और विकास कार्यों की प्राथमिकताओं पर स्पष्ट चर्चा होनी चाहिए। युवाओं को भी केवल घोषणाओं के बजाय यह देखना होगा कि प्रस्ताव व्यावहारिक हैं या नहीं और निर्वाचित प्रतिनिधि अपने काम का हिसाब देने के लिए तैयार हैं या नहीं।

-शैलेष जोशी, राजनीतिक विश्लेषक

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