कोडरमा जिले के झुमरीतिलैया स्थित गुमो गांव में मां दुर्गा की पूजा करीब 400 साल पुरानी परंपरा के अनुसार की जाती है। यहां शारदीय नवरात्र के दौरान कलश स्थापना से लेकर नवमी तक बकरे की बलि दी जाती है। इस अनोखी परंपरा के कारण गुमो का दुर्गा मंदिर आसपास के क्षेत्रों में खास पहचान रखता है। यहां पूजा के लिए स्थानीय लोगों के साथ दूर-दराज से भी श्रद्धालु पहुंचते हैं। शारदीय दुर्गा पूजा समिति गुमो में पदमा राजा के समय से पूजा होने की परंपरा बताई जाती है। मान्यता के अनुसार, रतन साईं और मर्दन साईं नाम के जमींदार भाइयों ने गढ़ पर मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित कर पूजा की शुरुआत की थी। बाद में अंग्रेजों के दबाव के कारण उन्हें रियासत छोड़नी पड़ी। इसके बाद उन्होंने अपने कुल पुरोहित जियाराम पांडेय, रामसेवक पांडेय और अभय राम पांडेय के परिवारों को पूजा की जिम्मेदारी सौंप दी। समय के साथ गढ़ से अलग दुर्गा मंदिर का निर्माण हुआ। कलश स्थापना पर 50 से अधिक, नवमी पर करीब 2,000 बकरों की बलि मंदिर के वर्तमान पुजारी पंडित दसरथ पांडेय के अनुसार, यहां की बलि प्रथा पूजा की सबसे खास विशेषता है। कलश स्थापना के दिन 50 से अधिक बकरों की बलि दी जाती है। इसके बाद अष्टमी तक प्रतिदिन बलि की परंपरा निभाई जाती है। नवमी के दिन बलि की शुरुआत पहले गढ़ पर होती है। इसके बाद दुर्गा मंदिर में यह परंपरा पूरी की जाती है। पुजारी के मुताबिक, नवमी पर गांव के लोगों की ओर से करीब 2,000 बकरों की बलि दी जाती है। उनके अनुसार, गढ़ पर लगभग डेढ़ सौ साल तक पूजा होती रही। बाद में मंदिर बनने के बाद पूजा की जिम्मेदारी सतघरवा परिवार को मिली। मंदिर की देखरेख और विकास में तीन घरवा तथा चार घरवा परिवार भी सहयोग करते हैं। गांव की बेटियों के बच्चों का पहला मुंडन भी यहीं गुमो देवी मंदिर से जुड़ी एक और पुरानी परंपरा गांव की बेटियों के परिवारों से संबंधित है। पंडित दसरथ पांडेय के अनुसार, गांव की बेटी की शादी के बाद जब उसे संतान होती है, तो बच्चे का पहला मुंडन इसी मंदिर में कराया जाता है। यही परंपरा अगली पीढ़ी यानी पोते-पोतियों के पहले मुंडन के लिए भी निभाई जाती है। इस वजह से गांव की बेटियां दुनिया के किसी भी कोने में रहें, इस संस्कार को पूरा करने के लिए गुमो पहुंचती हैं। सादगी से होती है पूजा, दूर-दराज से आते हैं श्रद्धालु मंदिर में दुर्गा पूजा के दौरान भव्य सजावट के बजाय सादगी पर जोर रहता है। पूजा में गांव और झुमरीतिलैया के लोगों का सहयोग रहता है। पुजारी के अनुसार, इसे जिले का सबसे पुराना देवी मंदिर माना जाता है। जहां पारंपरिक पद्धति से पूजा की जाती है। मंदिर से जुड़ी मान्यताओं के कारण स्थानीय श्रद्धालुओं के अलावा दूसरे जिलों से भी लोग मां दुर्गा के दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं। कोडरमा जिले के झुमरीतिलैया स्थित गुमो गांव में मां दुर्गा की पूजा करीब 400 साल पुरानी परंपरा के अनुसार की जाती है। यहां शारदीय नवरात्र के दौरान कलश स्थापना से लेकर नवमी तक बकरे की बलि दी जाती है। इस अनोखी परंपरा के कारण गुमो का दुर्गा मंदिर आसपास के क्षेत्रों में खास पहचान रखता है। यहां पूजा के लिए स्थानीय लोगों के साथ दूर-दराज से भी श्रद्धालु पहुंचते हैं। शारदीय दुर्गा पूजा समिति गुमो में पदमा राजा के समय से पूजा होने की परंपरा बताई जाती है। मान्यता के अनुसार, रतन साईं और मर्दन साईं नाम के जमींदार भाइयों ने गढ़ पर मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित कर पूजा की शुरुआत की थी। बाद में अंग्रेजों के दबाव के कारण उन्हें रियासत छोड़नी पड़ी। इसके बाद उन्होंने अपने कुल पुरोहित जियाराम पांडेय, रामसेवक पांडेय और अभय राम पांडेय के परिवारों को पूजा की जिम्मेदारी सौंप दी। समय के साथ गढ़ से अलग दुर्गा मंदिर का निर्माण हुआ। कलश स्थापना पर 50 से अधिक, नवमी पर करीब 2,000 बकरों की बलि मंदिर के वर्तमान पुजारी पंडित दसरथ पांडेय के अनुसार, यहां की बलि प्रथा पूजा की सबसे खास विशेषता है। कलश स्थापना के दिन 50 से अधिक बकरों की बलि दी जाती है। इसके बाद अष्टमी तक प्रतिदिन बलि की परंपरा निभाई जाती है। नवमी के दिन बलि की शुरुआत पहले गढ़ पर होती है। इसके बाद दुर्गा मंदिर में यह परंपरा पूरी की जाती है। पुजारी के मुताबिक, नवमी पर गांव के लोगों की ओर से करीब 2,000 बकरों की बलि दी जाती है। उनके अनुसार, गढ़ पर लगभग डेढ़ सौ साल तक पूजा होती रही। बाद में मंदिर बनने के बाद पूजा की जिम्मेदारी सतघरवा परिवार को मिली। मंदिर की देखरेख और विकास में तीन घरवा तथा चार घरवा परिवार भी सहयोग करते हैं। गांव की बेटियों के बच्चों का पहला मुंडन भी यहीं गुमो देवी मंदिर से जुड़ी एक और पुरानी परंपरा गांव की बेटियों के परिवारों से संबंधित है। पंडित दसरथ पांडेय के अनुसार, गांव की बेटी की शादी के बाद जब उसे संतान होती है, तो बच्चे का पहला मुंडन इसी मंदिर में कराया जाता है। यही परंपरा अगली पीढ़ी यानी पोते-पोतियों के पहले मुंडन के लिए भी निभाई जाती है। इस वजह से गांव की बेटियां दुनिया के किसी भी कोने में रहें, इस संस्कार को पूरा करने के लिए गुमो पहुंचती हैं। सादगी से होती है पूजा, दूर-दराज से आते हैं श्रद्धालु मंदिर में दुर्गा पूजा के दौरान भव्य सजावट के बजाय सादगी पर जोर रहता है। पूजा में गांव और झुमरीतिलैया के लोगों का सहयोग रहता है। पुजारी के अनुसार, इसे जिले का सबसे पुराना देवी मंदिर माना जाता है। जहां पारंपरिक पद्धति से पूजा की जाती है। मंदिर से जुड़ी मान्यताओं के कारण स्थानीय श्रद्धालुओं के अलावा दूसरे जिलों से भी लोग मां दुर्गा के दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं।

