योगमाया मंदिर में 100 साल से जल रही अखंड ज्योत:यहां हर साल आते हैं लाखों श्रद्धालु, 1916 में शुरू हुआ था निर्माण, 1925 में बनकर तैयार

योगमाया मंदिर में 100 साल से जल रही अखंड ज्योत:यहां हर साल आते हैं लाखों श्रद्धालु, 1916 में शुरू हुआ था निर्माण, 1925 में बनकर तैयार

बड़वानी शहर में योगमाया माता मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। यहां पिछले 100 साल से भी ज्यादा समय से एक अखंड ज्योत लगातार जल रही है। भक्त इसे माता जगदंबा के आशीर्वाद का प्रतीक मानते हैं। मंदिर का निर्माण 1916 में शुरू हुआ और 1925 में पूरा हुआ। इसकी स्थापना में सिरवी समाज और राजस्थान के बिलाड़ा से आए दीवान साहब का बड़ा योगदान रहा। पुजारी पंडित नवीन दास शर्मा के अनुसार, यहां रोज पूजा-पाठ होता है। दीवान साहब के कहने पर माता की गादी लगाई गई। सिरवी समाज के लोग राजस्थान से पैदल ज्योत लाए थे। पहले सिर्फ गादी और ज्योत पूजी जाती थी। करीब 45 साल बाद (1970 के आसपास) माता की मूर्ति भी स्थापित हुई। मंदिर बनाने में 34,181 रुपये लगे। दीवान साहब हरिसिंह जी ने 18,100 रुपये दिए, बाकी सिरवी समाज ने जुटाए। उस दौर में समाज के लोगों ने एकजुट होकर मंदिर निर्माण में योगदान दिया।मंदिर निर्माण कार्य की देखरेख हुकमा बाचा जी ने की थी, जबकि मंदिर में कारीगरी का कार्य राजस्थान के बिलाड़ा निवासी बाबा हाथा जी ने किया था। मंदिर के प्रथम पुजारी केशा बाबा जी रहे। समाज के सहयोग, श्रद्धालुओं की आस्था और धार्मिक परंपराओं के चलते यह मंदिर समय के साथ अपनी विशिष्ट पहचान बनाता गया।
अखंड ज्योत को लेकर श्रद्धालुओं में विशेष आस्था…
योगमाया माता मंदिर की सबसे खास पहचान यहां प्रज्वलित अखंड ज्योत है। मंदिर के पुजारी पंडित नवीन दास शर्मा के अनुसार, यह ज्योत 100 वर्षों से अधिक समय से निरंतर जल रही है। श्रद्धालु इसे माता योगमाया की कृपा का प्रतीक मानते हैं। मंदिर में आने वाले भक्त ज्योत के दर्शन कर माता से परिवार की सुख-समृद्धि, खुशहाली और कल्याण की प्रार्थना करते हैं।इस ज्योत को लेकर एक विशेष मान्यता भी प्रचलित है। कहा जाता है कि सामान्य दीपक जलाने पर हाथों पर कार्बन की कालिख दिखाई देती है, जबकि मंदिर की अखंड ज्योत से जुड़ी कालिख में केसर जैसी छटा नजर आती है। भक्त इसे माता जगदंबा का आशीर्वाद और ज्योत की दिव्यता से जोड़कर देखते हैं। यह मान्यता श्रद्धालुओं की आस्था का हिस्सा है। गतिविधियों का प्रमुख केंद्र है मंदिर…
योगमाया माता मंदिर केवल पूजा-अर्चना का स्थान ही नहीं, बल्कि वर्षों पुरानी धार्मिक परंपरा और समाज की सहभागिता का प्रतीक भी है। मंदिर की स्थापना से लेकर निर्माण और पूजा व्यवस्था तक सिरवी समाज तथा श्रद्धालुओं का योगदान महत्वपूर्ण रहा है। समय के साथ मंदिर में धार्मिक गतिविधियां जारी हैं और माता के प्रति भक्तों की श्रद्धा बनी हुई है।बड़वानी का यह मंदिर अपने पुराने इतिहास, माता की गादी, अखंड ज्योत और श्रद्धालुओं की मान्यताओं के कारण विशेष महत्व रखता है। वर्ष 1916 में शुरू हुए निर्माण से लेकर आज तक मंदिर की धार्मिक परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ रही है। योगमाया माता मंदिर शहर की धार्मिक विरासत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जहां भक्त श्रद्धा और विश्वास के साथ माता के दर्शन करने पहुंचते हैं।

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