उग्रतारा सांस्कृतिक महोत्सव की तैयारियां तेज:नगर आयुक्त ने बैठक कर दिए निर्देश, 19 से 21 नवंबर तक होगा कार्यक्रम

उग्रतारा सांस्कृतिक महोत्सव की तैयारियां तेज:नगर आयुक्त ने बैठक कर दिए निर्देश, 19 से 21 नवंबर तक होगा कार्यक्रम

सहरसा में 19 से 21 नवंबर तक होने वाले ‘उग्रतारा सांस्कृतिक महोत्सव’ की तैयारियां तेज हो गई हैं। मंगलवार शाम नगर निगम कार्यालय में नगर आयुक्त प्रभात कुमार झा की अध्यक्षता में एक बैठक हुई। इसमें महोत्सव के आयोजन पर चर्चा हुई। नगर आयुक्त ने महोत्सव को आकर्षक बनाने के निर्देश दिए। बैठक में स्थानीय और राष्ट्रीय कलाकारों को शामिल करने पर जोर दिया गया। नगर आयुक्त प्रभात कुमार झा ने कहा कि इसका शुभारंभ प्रभात परिक्रमा उग्रतारा मां के मंदिर प्रांगण से किया जायेगा। इस बैठक में जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी स्नेहा झा, प्रो. विनय कुमार चौधरी, डॉ. नन्द किशोर चौधरी, अमित आनंद, डॉ. आनंद दत्त झा और डॉ. अक्षय कुमार चौधरी सहित कई अधिकारी और नागरिक शामिल थे। यह महोत्सव बिहार सरकार और जिला प्रशासन की देखरेख में 2012 से हर साल आयोजित होता है। इसका मकसद कोसी और मिथिलांचल की लोककला को देशभर में पहचान दिलाना है। पौराणिक एवं धार्मिक मान्यताएं: सिद्ध शक्तिपीठ धार्मिक मान्यता व शक्ति पीठ परंपरा के अनुसार, जब भगवान शिव माता सती के पार्थिव शरीर को लेकर ब्रह्मांड में भ्रमण कर रहे थे, तब भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र से खंडित होकर माता सती का बायां नेत्र महिषी में गिरा था। इसी कारण यह स्थल एक जाग्रत सिद्धपीठ माना जाता है। महर्षि वशिष्ठ की साधना एवं ‘उग्रतारा’ नामकरण मान्यता है कि महामुनि वशिष्ठ ने भगवती तारा को प्रसन्न करने के लिए यहां घोर ‘उग्र तप’ किया था। वशिष्ठ जी की कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर माता प्रकट हुईं, इसलिए इन्हें ‘वशिष्ठ आराधिता उग्रतारा’ कहा गया। एक अन्य मान्यता यह भी है कि देवी अपने भक्तों के जीवन से उग्र से उग्र व्याधियों और संकटों का तत्काल नाश करती हैं, इसलिए उन्हें उग्रतारा कहा जाता है। तीन देवियों का स्वरूप दस महाविद्याओं में मां तारा को ‘द्वितीय महाविद्या’ का स्थान प्राप्त है। महिषी मंदिर के गर्भगृह में मुख्य प्रतिमा मां तारा की है, जिनके अगल-बगल ‘एकजटा’ और ‘नील सरस्वती’ की प्रतिमाएं स्थापित हैं। यह संगम तंत्र और ज्ञान दोनों दृष्टियों से अत्यंत दुर्लभ माना जाता है। तंत्र साधना का सिद्ध केंद्र असम के कामाख्या और बंगाल के तारापीठ की भांति महिषी स्थित उग्रतारा स्थान को तंत्र साधकों की तपोभूमि माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि शारदीय नवरात्र के दौरान यहां की गई तांत्रिक या सात्विक साधना शीघ्र फलदायी होती है। ऐतिहासिक और बौद्धिक गौरव (मंडन मिश्र और शंकराचार्य का शास्त्रार्थ) महिषी केवल देवी का धाम ही नहीं, बल्कि 8वीं शताब्दी के प्रकांड मीमांसक पंडित मंडन मिश्र की जन्मभूमि व कर्मभूमि है। इसी ऐतिहासिक धरती पर अद्वैत वेदांत के प्रवर्तक आदि शंकराचार्य और पंडित मंडन मिश्र के बीच वह प्रसिद्ध दार्शनिक शास्त्रार्थ हुआ था, जिसकी निर्णायक मंडन मिश्र की धर्मपत्नी विदुषी भारती बनी थीं। ज्ञान और नारी विद्वत्ता की यह ऐतिहासिक घटना इस स्थल को पूरे विश्व में एक अद्वितीय दार्शनिक पहचान दिलाती है। यही कारण है कि महिषी का ‘उग्रतारा सांस्कृतिक महोत्सव’ केवल एक मेला नहीं, बल्कि आस्था, दर्शन और संस्कृति का एक भव्य महाकुंभ माना जाता है। सहरसा में 19 से 21 नवंबर तक होने वाले ‘उग्रतारा सांस्कृतिक महोत्सव’ की तैयारियां तेज हो गई हैं। मंगलवार शाम नगर निगम कार्यालय में नगर आयुक्त प्रभात कुमार झा की अध्यक्षता में एक बैठक हुई। इसमें महोत्सव के आयोजन पर चर्चा हुई। नगर आयुक्त ने महोत्सव को आकर्षक बनाने के निर्देश दिए। बैठक में स्थानीय और राष्ट्रीय कलाकारों को शामिल करने पर जोर दिया गया। नगर आयुक्त प्रभात कुमार झा ने कहा कि इसका शुभारंभ प्रभात परिक्रमा उग्रतारा मां के मंदिर प्रांगण से किया जायेगा। इस बैठक में जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी स्नेहा झा, प्रो. विनय कुमार चौधरी, डॉ. नन्द किशोर चौधरी, अमित आनंद, डॉ. आनंद दत्त झा और डॉ. अक्षय कुमार चौधरी सहित कई अधिकारी और नागरिक शामिल थे। यह महोत्सव बिहार सरकार और जिला प्रशासन की देखरेख में 2012 से हर साल आयोजित होता है। इसका मकसद कोसी और मिथिलांचल की लोककला को देशभर में पहचान दिलाना है। पौराणिक एवं धार्मिक मान्यताएं: सिद्ध शक्तिपीठ धार्मिक मान्यता व शक्ति पीठ परंपरा के अनुसार, जब भगवान शिव माता सती के पार्थिव शरीर को लेकर ब्रह्मांड में भ्रमण कर रहे थे, तब भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र से खंडित होकर माता सती का बायां नेत्र महिषी में गिरा था। इसी कारण यह स्थल एक जाग्रत सिद्धपीठ माना जाता है। महर्षि वशिष्ठ की साधना एवं ‘उग्रतारा’ नामकरण मान्यता है कि महामुनि वशिष्ठ ने भगवती तारा को प्रसन्न करने के लिए यहां घोर ‘उग्र तप’ किया था। वशिष्ठ जी की कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर माता प्रकट हुईं, इसलिए इन्हें ‘वशिष्ठ आराधिता उग्रतारा’ कहा गया। एक अन्य मान्यता यह भी है कि देवी अपने भक्तों के जीवन से उग्र से उग्र व्याधियों और संकटों का तत्काल नाश करती हैं, इसलिए उन्हें उग्रतारा कहा जाता है। तीन देवियों का स्वरूप दस महाविद्याओं में मां तारा को ‘द्वितीय महाविद्या’ का स्थान प्राप्त है। महिषी मंदिर के गर्भगृह में मुख्य प्रतिमा मां तारा की है, जिनके अगल-बगल ‘एकजटा’ और ‘नील सरस्वती’ की प्रतिमाएं स्थापित हैं। यह संगम तंत्र और ज्ञान दोनों दृष्टियों से अत्यंत दुर्लभ माना जाता है। तंत्र साधना का सिद्ध केंद्र असम के कामाख्या और बंगाल के तारापीठ की भांति महिषी स्थित उग्रतारा स्थान को तंत्र साधकों की तपोभूमि माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि शारदीय नवरात्र के दौरान यहां की गई तांत्रिक या सात्विक साधना शीघ्र फलदायी होती है। ऐतिहासिक और बौद्धिक गौरव (मंडन मिश्र और शंकराचार्य का शास्त्रार्थ) महिषी केवल देवी का धाम ही नहीं, बल्कि 8वीं शताब्दी के प्रकांड मीमांसक पंडित मंडन मिश्र की जन्मभूमि व कर्मभूमि है। इसी ऐतिहासिक धरती पर अद्वैत वेदांत के प्रवर्तक आदि शंकराचार्य और पंडित मंडन मिश्र के बीच वह प्रसिद्ध दार्शनिक शास्त्रार्थ हुआ था, जिसकी निर्णायक मंडन मिश्र की धर्मपत्नी विदुषी भारती बनी थीं। ज्ञान और नारी विद्वत्ता की यह ऐतिहासिक घटना इस स्थल को पूरे विश्व में एक अद्वितीय दार्शनिक पहचान दिलाती है। यही कारण है कि महिषी का ‘उग्रतारा सांस्कृतिक महोत्सव’ केवल एक मेला नहीं, बल्कि आस्था, दर्शन और संस्कृति का एक भव्य महाकुंभ माना जाता है।  

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