मस्कुलर डिस्ट्रॉफी और अन्य दुर्लभ बीमारियों से पीड़ित मरीजों की समस्याओं को लेकर राजस्थान हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। हाईकोर्ट की जोधपुर पीठ ने केंद्र और राज्य सरकार को महत्वपूर्ण निर्देश देते हुए दुर्लभ बीमारियों से जुड़े पांच प्रमुख मुद्दों पर जवाब मांगा है। केंद्र सरकार को तीन सप्ताह के भीतर शपथ-पत्र पेश करने के निर्देश दिए गए हैं, जबकि राज्य सरकार को मरीजों के लिए 1 अक्टूबर 2022 को प्रस्तुत कार्ययोजना पर हुई प्रगति का विवरण देने को कहा गया है। मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति संजय के. अग्रवाल एवं न्यायमूर्ति बलजिंदर सिंह संधू की खंडपीठ ने 12 अक्टूबर 2026 को पारित आदेश में कहा कि 21 नवंबर 2025 को निर्धारित पांच बिंदुओं पर सरकारों की ओर से अपेक्षित बिंदुवार जवाब प्रस्तुत नहीं किया गया है। यह सुनवाई स्वावलंबन फाउंडेशन की ओर से दायर जनहित याचिका पर हुई। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. सचिन आचार्य, अधिवक्ता चयन बोथरा एवं सार्थक आसोपा ने पक्ष रखा। आनुवंशिक जांच के लिए निजी लैब पर निर्भर मरीज
याचिका में बताया गया कि राजस्थान में एम्स जोधपुर स्थित सेंटर ऑफ एक्सीलेंस में आनुवंशिक जांच की सुविधा उपलब्ध नहीं होने के कारण मरीजों को निजी लैब का रुख करना पड़ता है। इससे जांच पर अधिक खर्च आता है और रिपोर्ट मिलने में देरी होती है। जांच में देरी का असर बीमारी की पहचान और उपचार की प्रक्रिया पर भी पड़ता है। उपचार केंद्रों की कमी से दूरदराज के मरीज परेशान
याचिका में एम्स जोधपुर को राजस्थान का एकमात्र सेंटर ऑफ एक्सीलेंस बताते हुए कहा गया कि दूरदराज के क्षेत्रों में रहने वाले मरीजों को उपचार के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। जेके लोन अस्पताल में दुर्लभ बीमारियों के उपचार के बजाय विभागीय एवं प्रशासनिक कार्य किए जाने का मुद्दा भी उठाया गया।
इसके अलावा, मुख्यमंत्री आयुष्मान बाल संबल योजना के तहत केवल 63 सूचीबद्ध दुर्लभ बीमारियों के उपचार का प्रावधान होने की बात कही गई।
याचिका में GNE मायोपैथी, बेकर मस्कुलर डिस्ट्रॉफी और लिम्ब गर्डल मस्कुलर डिस्ट्रॉफी जैसी बीमारियों के उपचार के लिए प्रावधानों की कमी पर भी सवाल उठाए गए। व्यस्क मरीजों के लिए सरकारी सहायता का अभाव
याचिका में कहा गया कि मुख्यमंत्री आयुष्मान बाल संबल योजना के तहत 18 वर्ष से कम आयु के मरीजों को ही उपचार की सुविधा मिलने से वयस्क मरीजों के सामने आर्थिक और चिकित्सकीय चुनौतियां खड़ी होती हैं। इसके साथ ही पुनर्वास, डे-केयर और दीर्घकालिक देखभाल की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होने का मुद्दा भी न्यायालय के समक्ष रखा गया। जिला स्तर पर डे-केयर केंद्र बनाने का सुझाव
मस्कुलर डिस्ट्रॉफी से पीड़ित कई मरीज बीमारी बढ़ने के साथ बिस्तर पर निर्भर हो जाते हैं। ऐसे मरीजों की नियमित देखभाल के लिए याचिका में जिला स्तर पर डे-केयर केंद्र स्थापित करने और प्रशिक्षित सहायक कर्मचारियों के माध्यम से 24 घंटे देखभाल उपलब्ध कराने की आवश्यकता बताई गई।
इन केंद्रों की निगरानी के लिए जिला कलेक्टर को नोडल अधिकारी बनाने का सुझाव भी दिया गया, ताकि मरीजों को स्थानीय स्तर पर बेहतर सुविधाएं मिल सकें। दूसरे राज्यों की योजनाओं का भी दिया हवाला
याचिकाकर्ता की ओर से केरल, तमिलनाडु और हरियाणा जैसे राज्यों में दुर्लभ बीमारियों से पीड़ित मरीजों के लिए आर्थिक सहायता और सहायक उपचार से जुड़ी व्यवस्थाओं का हवाला दिया गया। साथ ही राजस्थान में ऐसी सुविधाओं की कमी की ओर न्यायालय का ध्यान आकर्षित किया गया। तीन सप्ताह बाद होगी अगली सुनवाई
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पांचों मुद्दों पर जवाब दाखिल करने के लिए तीन सप्ताह का समय मांगा गया, जिसे न्यायालय ने स्वीकार कर लिया। राज्य सरकार को भी 1 अक्टूबर 2022 को प्रस्तुत कार्ययोजना पर हुई प्रगति का विवरण शपथ-पत्र के माध्यम से पेश करने के निर्देश दिए गए हैं।
न्यायालय ने मामले को तीन सप्ताह बाद सूचीबद्ध करने का आदेश दिया है। अब अगली सुनवाई में सरकारों के जवाब से यह स्पष्ट होने की उम्मीद है कि दुर्लभ बीमारियों से पीड़ित मरीजों के उपचार, आर्थिक सहायता, पुनर्वास और दीर्घकालिक देखभाल के लिए क्या कदम उठाए गए हैं। यह मामला राजस्थान में दुर्लभ बीमारियों से जूझ रहे मरीजों के लिए समय पर जांच, सुलभ उपचार, वयस्कों को सरकारी सहायता और बेहतर देखभाल व्यवस्था सुनिश्चित करने की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

