प्रदेश के 4 मेडिकल कॉलेजों (कन्नौज, अंबेडकरनगर, जालौन, सहारनपुर) में आरक्षण की निर्धारित सीमा से अधिक अनुसूचित जाति के अभ्यर्थियों को प्रवेश दिए जाने के मामले में हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने राज्य सरकार के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई है। न्यायालय ने समाज कल्याण विभाग के अपर मुख्य सचिव को संबंधित अभिलेखों के साथ मंगलवार को तलब किया है। न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने यह आदेश राज्य सरकार की विशेष अपील पर सुनवाई के दौरान दिया। कोर्ट ने कहा कि सरकार ने पिछले वर्ष आश्वासन दिया था कि शैक्षिक सत्र 2026-27 से प्रदेश के शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश के दौरान उत्तर प्रदेश लोक सेवा (अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण) अधिनियम, 2006 के प्रावधानों का पालन किया जाएगा। इसके बावजूद मौजूदा सत्र में निर्धारित सीमा से अधिक आरक्षण दिए जाने का मामला सामने आया है। अधिनियम के तहत अनुसूचित जाति के लिए 21 प्रतिशत, अनुसूचित जनजाति के लिए दो प्रतिशत और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण निर्धारित है। इस तरह कुल आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत है। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि समाज कल्याण विभाग कोर्ट में दिए गए आश्वासन से सहमत नहीं था। इस पर खंडपीठ ने सवाल उठाया कि यदि सरकार के विभिन्न विभागों के बीच इस मुद्दे पर मतभेद था तो न्यायालय को इसकी जानकारी पहले क्यों नहीं दी गई। साथ ही, सरकार ने पिछले शैक्षिक सत्र में न्यायालय के आदेश का लाभ क्यों लिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार एक इकाई है और उसके अलग-अलग विभागों के मतभेद न्यायालय के आदेशों के पालन में बाधा नहीं बन सकते। खंडपीठ ने मामले से जुड़े पुराने अभिलेख भी पेश करने का निर्देश दिया है।

