पाकुड़ जिले में दुर्गा पूजा की तैयारियां जोरों पर हैं। शहर के राजापाड़ा स्थित दुर्गा पूजा समिति ने इस साल पर्यावरण संरक्षण और पारंपरिक शिल्पकला को बढ़ावा देने के उद्देश्य से बांस से इको-फ्रेंडली पूजा पंडाल तैयार करवाया है। बंबू क्राफ्ट की खासियत को सामने लाने के लिए पंडाल का निर्माण पश्चिम बंगाल के कुशल कारीगरों से कराया जा रहा है। बांस की कामाची से तैयार हो रहा यह पंडाल अपनी बनावट और पारंपरिक कारीगरी के कारण लोगों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। पूजा के दौरान पर्यावरण के अनुकूल सजावट का संदेश देने के साथ स्थानीय लोगों को भारतीय हस्तशिल्प की खूबसूरती से परिचित कराना भी समिति का उद्देश्य है। तैयार हो रहे पंडाल को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंच रहे हैं। वहीं, प्रतिमा को अंतिम रूप देने में स्थानीय कलाकार जुटे हुए हैं। बंगाल के चार क्षेत्रों से बुलाए गए कारीगर राजापाड़ा के पूजा पंडाल को खास रूप देने के लिए पश्चिम बंगाल के उत्तर दिनाजपुर जिले के रायगंज और मालदा जिले के मालदा व फरक्का क्षेत्र के कुशल कारीगरों को बुलाया गया है। ये कारीगर बांस की कामाची का इस्तेमाल कर पंडाल को आकर्षक आकार दे रहे हैं। बांस जैसी प्राकृतिक सामग्री से तैयार हो रही संरचना इस आयोजन की प्रमुख विशेषता है। समिति हर साल अलग-अलग थीम पर दुर्गा पूजा का आयोजन करती है। इस बार बंबू क्राफ्ट को केंद्र में रखकर पारंपरिक कारीगरी को मंच देने का प्रयास किया गया है। पंडाल में आकर्षक लाइटिंग भी की जाएगी, जिससे रात में पूरा परिसर रोशनी से जगमगाएगा। बंगाल की संस्कृति की झलक के साथ तैयार हो रहा यह पंडाल पूजा के दौरान श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण रहने की उम्मीद है। 1992 में हुई थी पूजा की शुरुआत पूजा समिति के अध्यक्ष पप्पू दुबे ने बताया कि राजापाड़ा में वर्ष 1992 में बुजुर्गों के मार्गदर्शन में नवयुवकों ने दुर्गा पूजा की शुरुआत की थी। इसके बाद से पिछले 34 वर्षों से स्थानीय लोगों के सहयोग से मां दुर्गा की पूजा की जा रही है। इस वर्ष आयोजन का बजट 8 से 10 लाख रुपए निर्धारित किया गया है। इस राशि से पूजा की तैयारियां, पंडाल निर्माण, सजावट और अन्य व्यवस्थाएं की जा रही हैं। समिति का प्रयास हर साल आयोजन को नया स्वरूप देने का रहता है, ताकि श्रद्धालुओं को कुछ अलग देखने को मिले। इस बार पर्यावरण अनुकूल पंडाल के जरिए पारंपरिक शिल्पकला को प्रोत्साहित करने पर जोर दिया गया है। लंबे समय से चली आ रही पूजा परंपरा के कारण राजापाड़ा का यह आयोजन स्थानीय लोगों के लिए धार्मिक आस्था और सामुदायिक एकजुटता का प्रतीक बन गया है। षष्ठी से दर्शन, सुरक्षा के लिए सीसीटीवी और स्वयंसेवक समिति के अनुसार, षष्ठी के दिन मां दुर्गा की प्रतिमा पंडाल में स्थापित की जाएगी। इसी दिन से श्रद्धालु मां के दर्शन कर सकेंगे। एकादशी को प्रतिमा का विसर्जन किया जाएगा। पूजा के दौरान भीड़ को नियंत्रित करने के लिए दर्जनों स्वयंसेवकों की तैनाती होगी और परिसर में सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएंगे। महिला और पुरुष श्रद्धालुओं के लिए अलग-अलग प्रवेश द्वार बनाए गए हैं। प्रतिदिन प्रसाद वितरण की व्यवस्था भी रहेगी। पूजा के दौरान राजापाड़ा में बंगाली संस्कृति की विशेष छटा देखने को मिलेगी। यहां बड़ी संख्या में रहने वाले बंगाली समुदाय के लोगों की भागीदारी से ढोल, ढाक और शंख की ध्वनि से पूरा मोहल्ला भक्तिमय होगा। बांस से बने पंडाल, आकर्षक रोशनी और पारंपरिक पूजा पद्धति के मेल से इस वर्ष का आयोजन खास बनने की तैयारी में है। पाकुड़ जिले में दुर्गा पूजा की तैयारियां जोरों पर हैं। शहर के राजापाड़ा स्थित दुर्गा पूजा समिति ने इस साल पर्यावरण संरक्षण और पारंपरिक शिल्पकला को बढ़ावा देने के उद्देश्य से बांस से इको-फ्रेंडली पूजा पंडाल तैयार करवाया है। बंबू क्राफ्ट की खासियत को सामने लाने के लिए पंडाल का निर्माण पश्चिम बंगाल के कुशल कारीगरों से कराया जा रहा है। बांस की कामाची से तैयार हो रहा यह पंडाल अपनी बनावट और पारंपरिक कारीगरी के कारण लोगों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। पूजा के दौरान पर्यावरण के अनुकूल सजावट का संदेश देने के साथ स्थानीय लोगों को भारतीय हस्तशिल्प की खूबसूरती से परिचित कराना भी समिति का उद्देश्य है। तैयार हो रहे पंडाल को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंच रहे हैं। वहीं, प्रतिमा को अंतिम रूप देने में स्थानीय कलाकार जुटे हुए हैं। बंगाल के चार क्षेत्रों से बुलाए गए कारीगर राजापाड़ा के पूजा पंडाल को खास रूप देने के लिए पश्चिम बंगाल के उत्तर दिनाजपुर जिले के रायगंज और मालदा जिले के मालदा व फरक्का क्षेत्र के कुशल कारीगरों को बुलाया गया है। ये कारीगर बांस की कामाची का इस्तेमाल कर पंडाल को आकर्षक आकार दे रहे हैं। बांस जैसी प्राकृतिक सामग्री से तैयार हो रही संरचना इस आयोजन की प्रमुख विशेषता है। समिति हर साल अलग-अलग थीम पर दुर्गा पूजा का आयोजन करती है। इस बार बंबू क्राफ्ट को केंद्र में रखकर पारंपरिक कारीगरी को मंच देने का प्रयास किया गया है। पंडाल में आकर्षक लाइटिंग भी की जाएगी, जिससे रात में पूरा परिसर रोशनी से जगमगाएगा। बंगाल की संस्कृति की झलक के साथ तैयार हो रहा यह पंडाल पूजा के दौरान श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण रहने की उम्मीद है। 1992 में हुई थी पूजा की शुरुआत पूजा समिति के अध्यक्ष पप्पू दुबे ने बताया कि राजापाड़ा में वर्ष 1992 में बुजुर्गों के मार्गदर्शन में नवयुवकों ने दुर्गा पूजा की शुरुआत की थी। इसके बाद से पिछले 34 वर्षों से स्थानीय लोगों के सहयोग से मां दुर्गा की पूजा की जा रही है। इस वर्ष आयोजन का बजट 8 से 10 लाख रुपए निर्धारित किया गया है। इस राशि से पूजा की तैयारियां, पंडाल निर्माण, सजावट और अन्य व्यवस्थाएं की जा रही हैं। समिति का प्रयास हर साल आयोजन को नया स्वरूप देने का रहता है, ताकि श्रद्धालुओं को कुछ अलग देखने को मिले। इस बार पर्यावरण अनुकूल पंडाल के जरिए पारंपरिक शिल्पकला को प्रोत्साहित करने पर जोर दिया गया है। लंबे समय से चली आ रही पूजा परंपरा के कारण राजापाड़ा का यह आयोजन स्थानीय लोगों के लिए धार्मिक आस्था और सामुदायिक एकजुटता का प्रतीक बन गया है। षष्ठी से दर्शन, सुरक्षा के लिए सीसीटीवी और स्वयंसेवक समिति के अनुसार, षष्ठी के दिन मां दुर्गा की प्रतिमा पंडाल में स्थापित की जाएगी। इसी दिन से श्रद्धालु मां के दर्शन कर सकेंगे। एकादशी को प्रतिमा का विसर्जन किया जाएगा। पूजा के दौरान भीड़ को नियंत्रित करने के लिए दर्जनों स्वयंसेवकों की तैनाती होगी और परिसर में सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएंगे। महिला और पुरुष श्रद्धालुओं के लिए अलग-अलग प्रवेश द्वार बनाए गए हैं। प्रतिदिन प्रसाद वितरण की व्यवस्था भी रहेगी। पूजा के दौरान राजापाड़ा में बंगाली संस्कृति की विशेष छटा देखने को मिलेगी। यहां बड़ी संख्या में रहने वाले बंगाली समुदाय के लोगों की भागीदारी से ढोल, ढाक और शंख की ध्वनि से पूरा मोहल्ला भक्तिमय होगा। बांस से बने पंडाल, आकर्षक रोशनी और पारंपरिक पूजा पद्धति के मेल से इस वर्ष का आयोजन खास बनने की तैयारी में है।

